बहुधा भंडारे की पूड़ियों में घर की गोलमटोल पूड़ियों सरीखे पुड़ नहीं होते, वे अद्वैत-भाव से ही आपकी पत्तल में सिधारती हैं। यों पूड़ी शब्द की उत्पत्ति ही पुड़ से हुई है- जैसे सतपुड़ा यानी सात तहों वाला पर्वत। पूड़ियाँ बेलते समय तो आटे की लोई एक ही पुड़ की, समतल भासती हैं, पर तले जाने पर उसमें दो पुड़े फूल आते हैं। पहला, बाहरी पुड़ा महीन और कोमल, जो जिह्वा को लालायित करता है, और दूसरा, आभ्यान्तर का, अन्न के सत्त्व को अपने में सँजोए, जिससे क्षुधा का उन्मूलन होगा!

किसी धर्मशाला के कक्ष में रसोई करने वाली स्त्रियों द्वारा तारतम्य के संगीत से बेली और तली जाने वाली पूड़ियों का मन को स्निग्ध कर देने वाला दृश्य कभी निहारिए! और फिर पूड़ियों की मियाद चुक जाने पर जूठे हाथ लिए बैठे उसकी बाट जोहते भंडारा-साधकों को देखिए। महाअष्टमी-महानवमी में तो यह पूड़ी-प्रसंग भारत-भूमि में यत्र-तत्र-सर्वत्र सजीव हो उठता है। भंडारों की रामभाजी और पूड़ी पर समस्त संसार का अन्नकूट निछावर है!

मैदा की पूड़ी लचुई या लूची कहलाई है। यह विशेषकर बंगभूमि में प्रचलित है। अवध में यही सोहारी कहलाई है। पूड़ियों का एक रूप बेड़ई या कचौड़ी है, वह उत्तर-मध्य भारत में बनने वाली मूँगदाल की कचौड़ी से भिन्न है। कुछ पूड़ियाँ तो पुरइन के पत्ते जैसी लम्बी-चौड़ी भी होती हैं। भोजपुर-अंचल में वह हाथीकान पूड़ी कहलाई है। यह बड़ी मुलायम होती है और एक पखवाड़े तक ख़राब नहीं होती।

मैं कहूँगा, भारत के निर्धनजन की राम-रसोई में पहली इकाई है- रोटियाँ। सेंक के भूरे-कत्थई ताप-बिंदुओं से सज्जित, किंतु बहुधा बिना घृत-लेपित। उन पर प्रगतिशील कवि-लोग बहुत काव्य रचते हैं। जिस दिन निर्धन का मन इठलाता है, उस दिन वो रोटियों के वर्तुल को त्रिभुज से बदलकर सेंक लेता है पराँठे। किंतु पूड़ियाँ? वे तो पर्वों-उत्सवों का मंगलगान हैं। भारतभूमि में पूड़ियाँ पर्व का पर्याय हैं। पूड़ियाँ नहीं तो पर्व नहीं। पूड़ियाँ तली जा रही हैं तो पर्व ही होगा, कुछ वैसा ही वह संयोग है। वे हिंदू-पर्वों की स्नान-ध्यान वाली सत्त्व-भावना को व्यंजित करती हैं- हल्दी और अजवाइन की पीताम्बरा पूड़ियाँ तो सबसे अधिक!

पूड़ियों की जो सबसे मधुर स्मृति मेरे मन में है, वह इस प्रकार है- अगस्त का महीना! नागदा-दाहोद लाइन पर बारिश की सुरंग के भीतर दौड़ती रेलगाड़ी! फिर मेघनगर में किकोरों के सावन के मध्य उतरना। वहाँ से बस पकड़कर झाबुआ जाना, जहाँ दाहोद से मेरी बुआ राखी मनाने आई होती थी। बुआ हाथ में मेहंदी लगाती थी। मेहंदी रचे हाथ से पूड़ियाँ मुझे खिलाती थी।

संसार में कोमलता का इससे सुंदर चित्र कोई दूसरा नहीं हो सकता कि कोई स्त्री मेहंदी लगे हाथों से आपको पूड़ियाँ खिलाए!

तब इसका क्या करें कि राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त को गर्म नहीं ठंडी पूड़ियाँ ही भाती थीं। कवि अज्ञेय ने स्मृतिलेखा में बताया है कि चिरगाँव में जब भी पूड़ियाँ बनतीं, वे बैठक से ही आवाज़ देते कि चार-छह पूड़ियाँ अलग रखवा देना। इन्हें वे अगली सुबह खाते। कहते कि बासी पूड़ी के बराबर कोई स्वाद नहीं जान पड़ता है!

ऐन यहीं पर मुझको एक पुरानी हिंदी फ़िल्म का संवाद याद आ रहा है, जिसे गुज़रे ज़माने के अभिनेता गोप ने अपनी अदायगी से तब ख़ूब मशहूर बना दिया था। संवाद कुछ यों था-

“बड़े घरों की औरतें सुबह-सवेरे क्या करती हैं? अजी कुछ नहीं, बस आम के अचार से बासी पूड़ियाँ खाती हैं!”

यह तो हुई बड़े घरों की बात। और छोटे घरों-संकुचित हृदयों की अंतर्कथा? वह प्रेमचंद ने बतलाई है। बूढ़ी काकी- जो पूड़ियों के प्रति अपनी तृष्णा से भरकर जूठी पत्तलों से उनकी खुरचन बटोरकर खाने लगी थीं, जिसे देखकर सन्न रह गई थी गृहस्वामिनी।

ये सब लोक में, आख्यान में, सामूहिक-स्मृति में प्रतिष्ठित पूड़ी-प्रसंग हैं। जनमानस से एकाकार। गृहणियों के मन का प्रफुल्ल-उत्सव। पूड़ियाँ न होतीं तो पर्व नहीं हो सकते थे, पर्व मनाने वाले मन पु​लक से नहीं भर सकते थे- ​तिस पर कड़ाह में तलीं, झारियों पर सजीं भंडारे की पूड़ियों की तो बात ही क्या।

किसी न किसी सुकवि को अवश्य ही इन पर प्रबंध लिखना चाहिए!

सुशोभित

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