*यूनिसेफ और आईएचडी ने किया पलामू और पश्चिमी सिंहभूम में बच्चों के पूरक आहार सम्बंधित अध्ययन*

*रांची के होटल कोर्टयार्ड में राज्य स्तरीय बैठक का आयोजन*

*बैठक में बच्चों के पूरक आहार पर व्यवहार संबंधी अध्ययन के निष्कर्ष साझा किए*

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राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, झारखण्ड, यूनिसेफ और इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट (आईएचडी) के सहयोग से रांची के होटल कोर्टयार्ड में आयोजित एक राज्य स्तरीय बैठक में पश्चिमी सिंहभूम और पलामू जिलों में पूरक आहार (कम्प्लीमेंट्री फीडिंग) प्रथाओं पर किए गए ‘व्यवहार अंतर्दृष्टि’ (बेहवीयरल इनसाइट्स) अध्ययन के निष्कर्षों को साझा किया गया। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से दिए जाने वाले परामर्श और उससे माताओं के व्यवहार में आने वाले बदलावों का मूल्यांकन करना था।

अध्ययन के अनुसार, पश्चिमी सिंहभूम और पलामू में किए गए इस कार्य के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। आंकड़ों से पता चलता है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण से उनके आत्मविश्वास और परामर्श देने की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप, माताओं ने बच्चों के भोजन की विविधता, मात्रा और गुणवत्ता में सुधार किया है। विशेष रूप से सब्जियों, दालों और अन्य पोषणयुक्त खाद्य पदार्थों के सेवन में बढ़ोतरी देखी गई है, जबकि कम पोषक तत्वों वाले पैकेट बंद खाद्य पदार्थों के उपयोग में कमी आई है।

अध्ययन के दौरान डिफरेंस-इन-डिफरेंस मेथड का उपयोग किया गया, जिसमें सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

पलामू में 6-8 महीने के बच्चों की माताओं में विविधतापूर्ण आहार की समझ 38.9% से बढ़कर 90.5% हो गई है जबकि पश्चिमी सिंहभूम में यह 100% तक पहुंच गया है। अध्ययन में पाया गया कि बच्चों को जंक फूड देने की प्रथा में कमी आई है। पश्चिमी सिंहभूम में 3 से 6 महीने के बच्चों में बिस्किट जैसे जंक फूड के सेवन में भारी गिरावट आई, जो 63.2% से घटकर मात्र 14.4% रह गया। अध्ययन की प्रमुख बातों में यह सामने आया है कि बच्चों के भोजन में पोषक तत्वों को देने सम्बंधित मामलों में जागरूकता आई है। पलामू में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के बीच हरी पत्तेदार सब्जियों के प्रति जागरूकता 45.7% से बढ़कर 90.9% हो गई, जिसका सीधा लाभ माताओं और बच्चों को मिल रहा है। 

इस अवसर पर यूनिसेफ झारखंड की प्रमुख डॉ. कनिनिका मित्रा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, झारखण्ड आईईसी के राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ राहुल किशोर सिंह  डॉ विजय किशोर रजक सहित स्वास्थ्य विभाग के अन्य वरिष्ठ अधिकारी, सेंट्रल यूनिवर्सिटी, झारखण्ड के प्रोफेसर, शोधार्थीगण, सिन्नी, जेएसएलपीएस, समाज कल्याण विभाग सहित अन्य विभागों के प्रतिनिधि मौजूद थे। डॉ मित्रा ने कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी और निरंतर पर्यवेक्षण से ही झारखंड के पोषण सूचकांकों में स्थायी सुधार संभव है। डॉ राहुल किशोर सिंह ने बताया कि व्यवहार में बदलाव एक क्रमिक प्रक्रिया है। अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि अगर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सही उपकरण और प्रशिक्षण दिया जाए, तो वे झारखंड में कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में गेम-चेंजर साबित हो सकती हैं।

अध्ययन की प्रमुख सिफारिशें

बैठक में विशेषज्ञों ने बच्चों के पोषण स्तर को और बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। इसके तहत आईसीडीएस प्रणाली के भीतर आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए नियमित और व्यावहारिक इन्फेंट एंड यंग चाइल्ड फीडिंग प्रशिक्षण को अनिवार्य बनाना आवश्यक बताया।  परामर्श की गुणवत्ता सुधारने के लिए मानकीकृत विजुअल एड्स, चेकलिस्ट और काउंसलिंग कार्ड्स का उपयोग को बढ़ाने पर बल दिया गया है। 6 से 24 महीने के बच्चों वाले घरों में गृह भ्रमण की अवधि और गुणवत्ता में सुधार करना का भी सुझाव दिया गया है। सामाजिक सांस्कृतिक बाधाओं को दूर करने के लिए सामुदायिक स्तर पर समूह परामर्श और पीयर-लर्निंग प्लेटफॉर्म को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया है।   

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