रांची । जिंदगी जिंदाबाद
@कनक राज पाठक
लद्दाख की कठोर और संवेदनशील वादियों से उठी Sonam Wangchuk की आवाज अब देश की मुख्यधारा की राजनीति और सत्ता के गलियारों में गूंज रही है। लद्दाख की जमीनी मांगों से इतर, दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहा उनका हालिया अनशन एक बिल्कुल नए और राष्ट्रव्यापी मुद्दे पर केंद्रित हो गया है। देश के विभिन्न हिस्सों से वांगचुक को मिल रहा भारी जन-समर्थन इस बात का गवाह है कि जब धरातल से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को उठाया जाता है, तो देश भर के लोग उससे खुद को जोड़ लेते हैं।
लेकिन इस पूरे परिदृश्य में कुछ बड़े और तीखे सवाल तैर रहे हैं, क्या यह आंदोलन देश को एक नया सियासी चेहरा देने जा रहा है? इस देशव्यापी हलचल और हालिया प्रशासनिक विवादों के बीच क्या सत्ता के शीर्ष पर बैठे नीति-निर्माता चैन की नींद सो पा रहे हैं? इस आंदोलन की परिणति में सोनम वांगचुक क्या अन्ना हजारे की भूमिका नजर आएंगे, क्या इस आंदोलन से किसी नए केजरीवाल का जन्म होगा?
अन्ना हजारे, केजरीवाल और सोनम वांगचुक: क्या इतिहास खुद को दोहराएगा?
जब भी देश में किसी गैर-राजनीतिक चेहरे के नेतृत्व में कोई बड़ा जन-आंदोलन खड़ा होता है, तो 2011 का इंडिया अगेंस्ट करप्शन अन्ना के आंदोलन की याद आना स्वाभाविक है। आज Sonam Wangchuk की तुलना सीधे अन्ना हजारे से की जा रही है।
अन्ना हजारे की तरह ही Sonam Wangchukकी छवि भी एक निष्पक्ष, त्यागी और ज़मीनी सुधारक की है, जिनका कोई व्यक्तिगत राजनीतिक एजेंडा नहीं दिखता। वे अनशन पर बैठते हैं, शांतिपूर्ण मार्च निकालते हैं और सीधे सत्ता के वादों पर सवाल उठाते हैं।
ऐसे में विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह आंदोलन लंबा खिंचता है, तो यह देश की राजनीति में एक नए ‘केजरीवाल’ यानी एक नए राजनीतिक विकल्प को जन्म दे सकता है। वांगचुक खुद शायद कभी सीधे चुनाव न लड़ें, अन्ना हजारे की भूमिका में रहें, लेकिन यह आंदोलन वैचारिक रूप से जागरूक युवाओं और नेताओं की एक नई पौध तैयार कर रहा है, जो आने वाले समय में दिल्ली की सत्ता को चुनौती दे सकती है।
सत्ता से सवाल और व्यवस्था की असहजता
इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है इसका उद्देश्य—युवाओं के भविष्य को बचाना और लोकतंत्र में जवाबदेही तय करना। लेकिन वर्तमान राजनीतिक संस्कृति में ‘सत्ता से सवाल’ करने की एक भारी कीमत चुकानी पड़ती है। वांगचुक और उनके समर्थकों को जिस तरह के प्रशासनिक अवरोधों और बंदिशों का सामना करना पड़ा है, उसने यह साफ कर दिया है कि व्यवस्था सवालों से असहज होती है।
“सत्ता से सवाल का यही हश्र होगा”—यह पंक्ति केवल एक तंज नहीं, बल्कि आज के दौर की हकीकत को बयां करती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जब आवाम के अधिकारों की बात आती है, तो प्रशासनिक बंदिशें आंदोलन की आग को बुझाने के बजाय उसे हवा देने का काम करती हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी और आंदोलन की मुख्य मांगें
यह आंदोलन किसी परंपरागत राजनीतिक दल के बैनर तले नहीं, बल्कि कॉकरोच जनता पार्टी के मंच से युवाओं की आवाज़ बुलंद कर रहा है। दिल्ली के दिल जंतर-मंतर पर चल रहे इस सत्याग्रह की मुख्य मांगें पूरी तरह से देश के करोड़ों छात्रों के भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी सुधार से जुड़ी हैं:
- केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा: देश में लगातार हुए पेपर लीक और परीक्षाओं में हुई धांधली (विशेषकर NEET-UG) की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान तुरंत अपने पद से इस्तीफा दें।
- परीक्षा प्रणाली में कड़े सुधार: देश की राष्ट्रीय परीक्षा प्रणालियों (जैसे NTA) के पूरे ढांचे में बड़े बदलाव और कड़े सुधार किए जाएं ताकि भविष्य में किसी भी छात्र की मेहनत के साथ ऐसा खिलवाड़ न हो सके।
- निष्पक्ष जांच और जवाबदेही: हालिया पेपर लीक मामलों की उच्च स्तरीय व पारदर्शी जांच हो और दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए।
विवाद, गंभीर आरोप और ‘एंटी-नेशनल’ छवि का ठप्पा
Sonam Wangchuk के इस सफर में केवल जन-समर्थन ही नहीं रहा, बल्कि वे गंभीर विवादों और संगीन कानूनी आरोपों के घेरे में भी आ चुके हैं। कभी देश के गौरव और पोस्टर बॉय माने जाने वाले वांगचुक की छवि को व्यवस्था और आलोचकों द्वारा एंटी-नेशनल देशविरोधी और व्यवस्था के लिए खतरा बताने का प्रयास भी किया गया है:
- राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और देशद्रोह के आरोप: लद्दाख में राज्यहुड और छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों के दौरान जब हिंसा भड़की और भाजपा कार्यालय को आग लगाई गई, तो प्रशासन ने वांगचुक पर हिंसा भड़काने और सरकार को अस्थिर करने की साजिश का आरोप लगाया। उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जैसी सख्त धारा लगाई गई, जिसके तहत उन्हें महीनों जेल में भी बिताना पड़ा।
Sonam Wangchuk
- विदेशी ताकतों और पाकिस्तान से संबंध के आरोप: जांच एजेंसियों और सुरक्षा बलों की तरफ से यह इनपुट भी सामने रखा गया कि वांगचुक के प्रदर्शनों के वीडियो पाकिस्तानी खुफिया तंत्रों द्वारा प्रचारित किए जा रहे थे। इसके अलावा, उनकी अतीत की पाकिस्तान यात्राओं को लेकर भी व्यवस्था ने उन पर विदेशी ताकतों के इशारे पर काम करने और देश की सुरक्षा को दांव पर लगाने जैसे संगीन आरोप लगे।
Sonam Wangchuk
- सेना के मनोबल पर बयान का विवाद: उन पर आरोप लगे कि उन्होंने ऐसे बयान दिए जिससे लद्दाख में भारतीय सेना की मदद न करने का संदेश जाता है, हालांकि वांगचुक के पक्ष और वकीलों ने इसे अदालत में पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उनके बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है।
समर्थकों का मानना है कि ये आरोप सिर्फ एक शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी की आवाज को दबाने और उन्हें बदनाम करने के लिए लगाए गए हैं, जबकि आलोचक इसे देश की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता से खिलवाड़ मानते हैं। इस कानूनी साये और ‘एंटी-नेशनल’ के ठप्पे ने उनके आंदोलन को एक जटिल मोड़ दे दिया है।
वैचारिक ध्रुवीकरण: क्या मूल मुद्दे से भटक रहा है आंदोलन?
किसी भी बड़े जन-आंदोलन की एक सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि जैसे-जैसे उसका दायरा बढ़ता है, वैसे-वैसे उसमें अलग-अलग राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे वाले तत्व प्रवेश करने लगते हैं। विश्लेषकों और जमीन से जुड़े जागरूक नागरिकों का एक बड़ा वर्ग यह मान रहा है कि सोनम वांगचुक का यह आंदोलन भी अब अपने मूल रास्ते से भटकने लगा है।
NEET परीक्षा में सुधार और छात्रों के भविष्य जैसी वास्तविक व निष्पक्ष मांगों के बीच कुछ ऐसे तत्वों और ताकतों की एंट्री हो गई है, जिनका उद्देश्य छात्रों का कल्याण नहीं, बल्कि अपना पुराना राजनीतिक और सनातन विरोधी एजेंडा साधना है। जब शिक्षा और छात्र-हित जैसे मुद्दे में वैचारिक ध्रुवीकरण और धर्म-विरोधी नैरेटिव हावी होने लगता है, तो आंदोलन की साख कमजोर होती है।
आम जनता, जो छात्रों के दर्द को देखकर इस आंदोलन से भावनात्मक रूप से जुड़ी थी, वह अब इस राजनीतिक भटकाव और एजेंडा-प्रथा को देखकर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। मूल मुद्दा पीछे छूट गया है और मंच का इस्तेमाल व्यवस्था पर व्यक्तिगत और वैचारिक भड़ास निकालने के लिए होने लगा है।
ताजा घटनाक्रम: अनशन स्थल पर पुलिसिया कार्रवाई और अस्पताल स्थानांतरण
आंदोलन की इस तपिश के बीच आज एक बड़ा नाटकीय मोड़ आया। भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य या कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए पुलिस बल ने उन्हें अनशन स्थल से जबरन उठा लिया। पुलिस द्वारा उन्हें हिरासत में लेकर सीधे अस्पताल पहुंचाया गया है।
प्रशासन का कहना है कि यह कदम वांगचुक के जीवन की रक्षा के लिए चिकित्सकीय आधार पर उठाया गया है, लेकिन समर्थकों और प्रदर्शनकारी छात्रों ने इसे आंदोलन को कुचलने की सरकारी साजिश करार दिया है। अनशन स्थल से वांगचुक को जबरन हटाए जाने के बाद जंतर-मंतर पर तनाव और आक्रोश का माहौल है। यह पुलिसिया कार्रवाई दिखाती है कि आंदोलन अब उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां सरकार के लिए इसे नजरअंदाज करना नामुमकिन हो गया है।
नीट का साया और केंद्रीय नेतृत्व की बेचैनी
इधर जंतर-मंतर पर Sonam Wangchuk को अस्पताल भेजे जाने के बाद उपजा यह आक्रोश है, तो उधर एनईईटी NEET परीक्षा के परिणामों और पेपर लीक विवाद ने देश के करोड़ों छात्रों और अभिभावकों को सड़कों पर बने रहने के लिए मजबूर कर दिया है। ऐसे में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के सामने यह एक बेहद चुनौतीपूर्ण और अग्निपरीक्षा का समय है।
भले ही आंदोलन में राजनीतिक मिलावट और वांगचुक को अनशन स्थल से हटाए जाने के कारण सरकार को तात्कालिक राहत मिलती दिखे, लेकिन देश का वास्तविक युवा वर्ग अभी भी नीट जैसी व्यवस्थागत कमियों से आक्रोशित है। जब तक करोड़ों छात्रों को परीक्षाओं की पारदर्शिता पर ठोस भरोसा नहीं मिलता, तब तक केंद्रीय नेतृत्व के लिए यह समय गहरी चिंता और आत्ममंथन का ही रहेगा। जन-असंतोष की यह अंतर्धारा नीति-निर्माताओं की रातों की नींद उड़ाने के लिए काफी है, क्योंकि वे जानते हैं कि वास्तविक छात्र आक्रोश को लंबे समय तक पुलिसिया बल से दबाया नहीं जा सकता।
आंदोलन का भविष्य
Sonam Wangchuk का यह कदम देश के लोकतांत्रिक ढांचे और शिक्षा व्यवस्था की साख की परीक्षा बन चुका है। लेकिन वर्तमान में यह आंदोलन एक दोराहे पर खड़ा है—एक तरफ छात्रों का वास्तविक दर्द है, तो दूसरी तरफ आंदोलन की आड़ में चलने वाले वैचारिक एजेंडे, वांगचुक पर लगे देशद्रोह के संगीन कानूनी आरोप और अब पुलिस द्वारा उन्हें अस्पताल पहुंचाया जाना।
क्या यह आंदोलन इन बाहरी भटकावों, कानूनी विवादों और पुलिसिया धरपकड़ से उबरकर देश को कोई वास्तविक सुधार या नया विकल्प दे पाएगा, या फिर यह भी अतीत के अन्य आंदोलनों की तरह राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ जाएगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है—आज की इस कार्रवाई ने दिल्ली के सियासी तापमान को चरम पर पहुंचा दिया है।
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