मांडर: मांडर में मंगलवार को ऐतिहासिक दो दिवसीय ‘मुड़मा जतरा’ का विधिवत और भव्य शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने कहा कि मुड़मा जतरा आदिवासी समाज की प्राचीन संस्कृति और उसकी गौरवशाली परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है। यह केवल एक धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की एकता, उनकी विशिष्ट पहचान और ऐतिहासिक विरासत को दर्शाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। जतरा के उद्घाटन समारोह के दौरान राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने भी शक्ति स्थल की परिक्रमा कर अपनी गहरी श्रद्धा व्यक्त की और समाज के उत्थान की कामना की।
उरांव और मुंडा समाज का ऐतिहासिक मिलन स्थल है मुड़मा
धर्मगुरु बंधन तिग्गा ने अपने संबोधन में आगे कहा कि मुड़मा जतरा मुख्य रूप से उरांव और मुंडा समाज के एक ऐतिहासिक मिलन स्थल के रूप में देश-दुनिया में प्रसिद्ध है। यहाँ झारखंड के विभिन्न जिलों के अलावा देश के अन्य राज्यों से तथा पड़ोसी देशों नेपाल और बांग्लादेश से भी भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं।
यह जतरा समाज की अटूट आस्था, आपसी भाईचारे और सांस्कृतिक एकजुटता को गहराई से मजबूत करता है। अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने में इस तरह के आयोजनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
विधि-विधान और पारंपरिक रीति-रिवाजों से हुई शक्ति खूंटा की पूजा-अर्चना
मुड़मा जतरा के शुरू होने से ठीक पहले पारंपरिक और सांस्कृतिक अनुष्ठानों का दौर चला। 40 पड़ाहा के पाहन, पुजारी, महतो और कोतवार ने पूरी निष्ठा के साथ पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार ‘शक्ति खूंटा’ की पूजा-अर्चना की। धार्मिक अनुष्ठान के संपन्न होने के बाद ही दो दिवसीय मुड़मा जतरा की विधिवत शुरुआत की गई।
इसके बाद श्रद्धालुओं ने उत्साह के साथ शक्ति स्थल की परिक्रमा की और अपनी गहरी आस्था प्रकट की। इस दौरान पूरे जतरा परिसर में पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों और समृद्ध आदिवासी संस्कृति की अनूठी झलक देखने को मिली, जिसने उपस्थित सभी लोगों का मन मोह लिया।
भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष सन्नी टोप्पो के विचार
कार्यक्रम के दौरान भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष सन्नी टोप्पो ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि मुड़मा जतरा आदिवासी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और एकता का सबसे बड़ा प्रतीक है। इसकी ऐतिहासिक परंपरा को अछुण्ण और सुरक्षित बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। आदिवासी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाजों और परंपराओं में ही निहित होती है।
मुड़मा जतरा जैसे बड़े आयोजन समाज को एकजुट करने का बेहतरीन अवसर प्रदान करते हैं और लोगों को अपनी प्राचीन विरासत पर गर्व करने का मौका देते हैं। जतरा परिसर में चारों तरफ फैली आदिवासी संस्कृति और परंपरा की झलक इस बात का प्रमाण है कि समाज अपनी जड़ों से कितनी मजबूती से जुड़ा हुआ है।
यातायात व्यवस्था को सुचारू रखने के लिए ट्रैफिक रूट में किया गया बदलाव
मेले में उमड़ने वाली भारी भीड़ और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए जिला प्रशासन और ट्रैफिक विभाग ने मुख्य मार्ग पर वाहनों के परिचालन में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं:
- मेदिनीनगर से राँची आने वाले वाहन: मेदिनीनगर की ओर से राँची आने वाले वाहनों को ब्राम्बे चौक से ठाकुरगांव की ओर मोड़ दिया गया।
- मांडर से राँची जाने वाले वाहन: मांडर से राँची की तरफ जाने वाले वाहनों को केसा मोड़ के रास्ते भेजा गया।
- इस रूट डायवर्जन का मुख्य उद्देश्य मुख्य मार्ग पर वाहनों का दबाव कम करना और श्रद्धालुओं की आवाजाही को पूरी तरह सुचारू बनाए रखना था। बुधवार को भी मेले के दौरान यही विशेष ट्रैफिक व्यवस्था लागू रहेगी, ताकि किसी भी प्रकार की असुविधा से बचा जा सके।
जतरा में सुरक्षा के किए गए पुख्ता और कड़े इंतजाम
मुड़मा जतरा के सफल, शांतिपूर्ण और सुरक्षित संचालन के लिए जतरा संचालन समिति और जिला प्रशासन की ओर से व्यापक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की गई है:
- स्वयंसेवकों की तैनाती: समिति के अनुसार, मेले में बेहतर व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखने के लिए 2000 से अधिक प्रशिक्षित स्वयंसेवकों को मैदान में तैनात किया गया है।
- पुलिस बल की मौजूदगी: कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन की ओर से लगभग 500 पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई है।
- वाच टावर से निगरानी: पूरे मेला क्षेत्र की गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए छह अलग-अलग स्थानों पर ऊंचे वाच टावर बनाए गए हैं, जहाँ से सुरक्षाकर्मी लगातार निगरानी रख रहे हैं ताकि किसी भी अप्रिय घटना को समय रहते रोका जा सके।
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