मातृभाषा के संरक्षण का महाअभियान अब 3 नवंबर कोमातृभाषा के संरक्षण का महाअभियान अब 3 नवंबर को

रांची: झारखंड की समृद्ध लोक-संस्कृति, भाषाई विविधता और जनजातीय अस्मिता को सहेजने के लिए शुरू होने जा रहा एक राष्ट्रीय स्तर का महाअभियान फिलहाल कुछ समय के लिए स्थगित कर दिया गया है। ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा’ द्वारा आगामी 9 अक्टूबर 2026 को आयोजित होने वाली बहुप्रतीक्षित और ऐतिहासिक “झारखंड की भाषा यात्रा” को राज्य के मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन जी की पूजनीय माताजी श्रीमती रूपी सोरेन जी के अकस्मात दुःखद निधन के कारण टाल दिया गया है।

राज्य सरकार द्वारा घोषित राजकीय शोक तथा संपूर्ण प्रदेश में उपजे शोकाकुल वातावरण का सम्मान करते हुए मोर्चा ने सर्वसम्मति से यह संवेदनशील निर्णय लिया है। अब इस महायात्रा का और भी अधिक दिव्य, भव्य एवं व्यापक आयोजन 3 नवम्बर 2026 को राजधानी रांची की धरा पर किया जाएगा।

संवेदनशीलता और सम्मान का निर्णय

झारखंड के मुख्यमंत्री श्री हेमंत सोरेन की माताजी श्रीमती रूपी सोरेन जी के निधन की खबर से पूरे राज्य में शोक की लहर दौड़ गई। इस कठिन और भावुक क्षण में दिवंगत आत्मा के प्रति सादर श्रद्धांजलि अर्पित करने तथा शोक-संतप्त सोरेन परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदनाएं व्यक्त करने हेतु जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा के पदाधिकारियों, शोधार्थियों और भाषा-प्रेमियों ने आपातकालीन सहमति बनाई।

मोर्चा के संयोजकों का स्पष्ट मानना है कि हमारी परंपराएं और संस्कृतियां हमें सबसे पहले मानवीय संवेदना, परस्पर आदर और दुख की घड़ी में एक-दूसरे के साथ खड़े होने का पाठ पढ़ाती हैं। इसीलिए राजकीय शोक की इस अवधि में किसी भी उत्सव या यात्रा का आयोजन स्थगित करना ही दिवंगत आत्मा के प्रति सच्चा सम्मान होगा।

भाषा संरक्षण का संकल्प: क्यों खास है यह ‘भाषा यात्रा‘?

झारखंड की नसों में बसी जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं केवल संवाद का माध्यम नहीं हैं; वे इस माटी की प्राचीन पहचान, मौखिक साहित्य, जीवन-दर्शन और सांस्कृतिक वजूद की रीढ़ हैं। तेजी से बदलते दौर में कुड़ुख, संथाली, मुंडारी, हो, खड़िया, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया और कुरमाली जैसी समृद्ध भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।

‘झारखंड की भाषा यात्रा’ केवल एक सांकेतिक जुलूस या पैदल मार्च नहीं है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक चेतना का उलगुलान है। इस आयोजन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  • भाषाई अस्मिता की रक्षा: लुप्तप्राय हो रही क्षेत्रीय बोलियों और मातृभाषाओं को नई पीढ़ी से जोड़ना।
  • शिक्षा में मातृभाषा का समावेश: प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक जनजातीय भाषाओं को मजबूत प्रशासनिक और शैक्षणिक आधार दिलाना।
  • शोध एवं मानकीकरण: भाषा के व्याकरण, लिपि और मौखिक परंपराओं के दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देना।

3 नवम्बर 2026: एक ऐतिहासिक स्वरूप की तैयारी

स्थगन के इस फैसले को मोर्चा ने एक अवसर के रूप में लिया है ताकि 3 नवम्बर को होने वाले आयोजन को और अधिक व्यापक, अनुशासित तथा दूरगामी प्रभाव वाला बनाया जा सके।

इस यात्रा के नए शेड्यूल के तहत राज्य के कोने-कोने—संथाल परगना के सुदूर गांवों से लेकर कोल्हान की पहाड़ियों और छोटानागपुर के पठारी क्षेत्रों—से लाखों की संख्या में लोग रांची पहुंचेंगे। इस भव्य महासंगम में:

  1. विभिन्न वर्गों की सहभागिता: विभिन्न विश्वविद्यालयों के भाषा शोधार्थी, प्राध्यापक, वरिष्ठ साहित्यकार, छात्र-छात्राएं, लोक कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता एक मंच पर नजर आएंगे।
  1. सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन: राज्य की नौ प्रमुख जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं की समृद्ध झांकियां, पारंपरिक परिधान, वाद्ययंत्र और लोकगीत इस यात्रा के आकर्षण का केंद्र होंगे।

भाषा नायकों और संरक्षकों की एकजुट अपील

जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा के मुख्य संरक्षक एवं झारखंड के पूर्व शिक्षा मंत्री श्री बंधु तिर्की, प्रसिद्ध भाषाविद डॉ. हरि उरांव, डॉ. खालिक अहमद, डॉ. शकुंतला मिश्रा, और डॉ. बृंदावन महतो ने संयुक्त रूप से राज्य की जनता से संवाद स्थापित किया है।

इसके साथ ही नौ भाषाओं के प्रमुख संयोजकों—पप्पू कुमार महतो, परशुराम मनकी, राजू महतो, संतोष तिड़वार, लीबियान मुंडू और महेंद्र शाखवार ने समस्त झारखंडवासियों, प्रबुद्ध नागरिकों, युवा शक्ति और भाषा-संस्कृति से जुड़े संगठनों से विशेष अपील की है:

“भाषाएं मरती हैं तो पूरी सभ्यता और उसकी स्मृतियां मिट जाती हैं। अपनी आने वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़े रखने के लिए इस अभियान को शक्ति देना हम सभी का नैतिक दायित्व है। आइए, 3 नवम्बर 2026 को अपनी-अपनी भाषाओं के ध्वज तले रांची की सड़कों पर एकजुट होकर झारखंड की अमर विरासत को मजबूत बनाएं।”

नव-निर्धारित तिथि 3 नवम्बर 2026 को होने जा रही यह ‘झारखंड की भाषा यात्रा’ निस्संदेह राज्य के भाषाई इतिहास में एक नया स्वर्णिम अध्याय जोड़ने का कार्य करेगी।

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