जमशेदपुर / कोल्हान, झारखंड।
झारखंड की धरती केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अद्भुत सांस्कृतिक एवं भाषाई विविधता के लिए भी पूरे देश में पहचानी जाती है। इस सांस्कृतिक धरोहर को अक्षुण्ण रखने और युवाओं में अपनी माटी की भाषाओं के प्रति स्वाभिमान जगाने के उद्देश्य से ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा’ ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। मोर्चा के नौ प्रमुख भाषाओं के संयोजकों के एक साझा प्रतिनिधिमंडल ने हाल ही में कोल्हान विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों का व्यापक शैक्षणिक और संगठनात्मक दौरा किया।
इस शैक्षणिक अभियान के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने सिंहभूम कॉलेज (चांडिल), जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज और लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल (एलबीएसएम) कॉलेज (करनडीह) के परिसरों में जाकर विद्यार्थियों, प्राध्यापकों और शिक्षाविदों के साथ गंभीर विचार-विमर्श किया। इस संवाद का केंद्रीय बिंदु झारखंड की जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के अस्तित्व, संरक्षण, उच्च शिक्षा में उनकी भूमिका और रोजगार के अवसरों से उनके जुड़ाव को सुनिश्चित करना था।
भाषाएँ केवल संवाद नहीं, सांस्कृतिक अस्मिता की आत्मा हैं
दौरे के दौरान आयोजित सत्रों को संबोधित करते हुए मोर्चा के प्रतिनिधियों ने इस बात पर गहरा बल दिया कि झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएँ केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम मात्र नहीं हैं। ये भाषाएँ राज्य के सदियों पुराने इतिहास, लोकपरंपराओं, पाषाणकालीन रीति-रिवाजों, मधुर लोकगीतों, पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं और हमारे पूर्वजों के पारंपरिक सामुदायिक ज्ञान का सजीव दस्तावेज हैं।
मोर्चा का स्पष्ट मानना है कि यदि अपनी भाषाएँ लुप्त होंगी, तो उनके साथ-साथ झारखंड की अनूठी सांस्कृतिक पहचान भी मिट जाएगी। आने वाली पीढ़ियों तक अपनी जड़ों और गौरवशाली इतिहास को हस्तांतरित करने के लिए इन भाषाओं को अकादमिक और व्यावहारिक जीवन में जीवित रखना अत्यंत आवश्यक है।
नौ भाषाओं का समृद्ध गुलदस्ता और सामूहिक प्रयास की आवश्यकता
झारखंड का भाषाई ढांचा बेहद समृद्ध है। मोर्चा के संयोजकों ने राज्य की नौ प्रमुख जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित किया:
| श्रेणी | भाषाएँ |
| क्षेत्रीय भाषा समूह | कुड़माली, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया |
| जनजातीय भाषा समूह | कुड़ुख, हो, मुंडारी, खड़िया, संताली |
प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि इन सभी नौ भाषाओं की अपनी लिपि, व्याकरण, समृद्ध लोक साहित्य और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। इनके सर्वांगीण विकास के लिए केवल सरकारी नीतियों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है; बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन, भाषा विशेषज्ञों, शोधार्थियों, छात्र-छात्राओं और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर एक सजग पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) तैयार करना होगा।
उच्च शिक्षा और सामाजिक जीवन में सम्मानजनक स्थान की मांग
महाविद्यालयों के भ्रमण के दौरान मोर्चा ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को केवल प्राथमिक स्तर या बोलचाल तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इन्हें उच्च शिक्षा, गंभीर अकादमिक शोध, साहित्यिक सृजन, जनसंचार और रोजगार के क्षेत्रों में मुख्यधारा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

मोर्चा द्वारा प्रस्तावित प्रमुख शैक्षणिक रणनीतियाँ:
- अकादमिक गतिविधियों का विस्तार: महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय स्तर पर जनजातीय भाषा विभागों को मजबूत किया जाए। नियमित रूप से राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय संगोष्ठियों (Seminars), कार्यशालाओं (Workshops) और भाषाई सम्मेलनों का आयोजन हो।
- मातृभाषा में शोध एवं सृजन: विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा में कविताएँ, कहानियाँ, नाटक और शोध पत्र लिखने के लिए प्रेरित किया जाए।
- साहित्य संरक्षण एवं प्रकाशन: विलुप्त हो रहे मौखिक लोक साहित्य, लोकगीतों और ज्ञान परंपराओं का दस्तावेजीकरण कर उनका वृहद स्तर पर प्रकाशन किया जाए।
- युवाओं की सक्रिय भागीदारी: परिसरों में भाषाई क्लब और सांस्कृतिक अभियान चलाकर नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा बोलने, पढ़ने और लिखने में गर्व महसूस कराया जाए।
‘भाषा बचाओ आंदोलन‘ को समर्पित संवाहक
इस दूरदर्शी और संगठनात्मक दौरे में मोर्चा के अग्रणी संयोजकों की सक्रिय और गरिमामयी मौजूदगी रही। प्रतिनिधिमंडल में शामिल प्रमुख सदस्यों में पप्पू कुमार महतो, परशुराम मानकी, लेबेयान, कृष्णा हेंब्रोम, जगदीश उरांव, महेंद्र उरांव एवं प्रदीप उरांव शामिल थे।
सभी संयोजकों ने एक स्वर में झारखंड की भाषाओं के अधिकार, स्वाभिमान, सामाजिक सम्मान और शैक्षणिक विकास के लिए अपने संकल्प को दोहराया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह दौरा केवल एक शुरुआत है, और आने वाले दिनों में राज्य के अन्य शैक्षणिक संस्थानों तक इस भाषाई चेतना को पहुँचाया जाएगा।
एक नए भाषाई पुनर्जागरण की उम्मीद
जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा की इस पहल को कॉलेजों के प्राध्यापकों और छात्रों द्वारा बेहद सकारात्मक प्रतिसाद मिला है। यह दौरा झारखंड में अपनी मातृभाषाओं के प्रति एक नया अनुरागी माहौल बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकता है। यदि युवा पीढ़ी अपनी भाषाई जड़ों से जुड़कर उसके संवर्धन में आगे आती है, तो न केवल झारखंड का सांस्कृतिक वैभव सुरक्षित रहेगा, बल्कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी राज्य की एक विशिष्ट पहचान स्थापित होगी।
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