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रांची: झारखंड में सड़क दुर्घटनाओं और उससे होने वाली मौतों को कम करने के उद्देश्य से स्वीकृत 166.92 करोड़ रुपये की सड़क सुरक्षा योजनाओं के क्रियान्वयन में करीब 11 महीने बाद भी अपेक्षित प्रगति नहीं होने का मामला सामने आया है। सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए वित्तीय वर्ष 2025-26 में कई महत्वपूर्ण योजनाओं को मंजूरी दी गई थी, जिनमें ब्लैक स्पॉट और संवेदनशील स्थानों पर निगरानी कैमरे लगाने से लेकर ऑटोमेटेड टेस्टिंग ट्रैक, वाहन वजन प्रणाली, इंटरसेप्टर वैन, सड़क सुरक्षा जागरूकता और आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करने जैसी योजनाएं शामिल थीं।

मामले में परिवहन विभाग ने परिवहन आयुक्त-सह-सदस्य सचिव, राज्य सड़क सुरक्षा कोष प्रबंधन समिति से दोबारा स्पष्टीकरण मांगा है। विभाग की ओर से जारी पत्र में निर्धारित समय के भीतर जवाब नहीं देने को गंभीर विषय बताया गया है। इससे पहले भी 31 जुलाई 2026 को स्पष्टीकरण मांगा गया था, लेकिन निर्धारित अवधि में जवाब नहीं मिलने के बाद अब दोबारा नोटिस जारी किया गया है।

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10 अक्टूबर 2025 को मिली थी योजनाओं को मंजूरी

जानकारी के अनुसार, 10 अक्टूबर 2025 को मुख्य सचिव अविनाश कुमार की अध्यक्षता में राज्य सड़क सुरक्षा कोष प्रबंधन समिति की बैठक आयोजित की गई थी। बैठक में वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए सड़क दुर्घटनाओं को कम करने और सड़क सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से कुल 166.92 करोड़ रुपये की विभिन्न योजनाओं को मंजूरी दी गई थी।

इन योजनाओं का उद्देश्य केवल दुर्घटना होने के बाद राहत पहुंचाना नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं की आशंका वाले स्थानों की पहचान, तकनीकी निगरानी, यातायात नियमों का इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन, वाहनों की जांच, सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता और आपातकालीन सेवाओं को मजबूत करना था।

योजनाओं की मंजूरी के बाद उम्मीद थी कि संबंधित विभाग और एजेंसियां निर्धारित प्रक्रिया पूरी करते हुए इन्हें जमीन पर उतारेंगी। लेकिन करीब 11 महीने बीत जाने के बाद भी कई योजनाओं में अपेक्षित प्रगति नहीं होने की बात सामने आई है।


55 करोड़ रुपये से ब्लैक स्पॉट पर लगने थे कैमरे

स्वीकृत योजनाओं में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक ब्लैक स्पॉट और संवेदनशील स्थानों पर CCTV, SVD और ANPR कैमरों की व्यवस्था करना था।

इसके लिए करीब 55 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है।

ब्लैक स्पॉट ऐसे सड़क स्थान होते हैं जहां दुर्घटनाओं की संभावना अपेक्षाकृत अधिक रहती है या जहां बार-बार दुर्घटनाएं होने का रिकॉर्ड सामने आता है। ऐसे स्थानों पर कैमरों की मदद से यातायात की निगरानी, नियमों के उल्लंघन की पहचान और दुर्घटना से जुड़े मामलों की जांच में मदद मिल सकती है।

ANPR यानी Automatic Number Plate Recognition तकनीक के जरिए वाहनों की नंबर प्लेट को कैमरे से पढ़कर वाहन की पहचान की जा सकती है। वहीं SVD जैसे सिस्टम का इस्तेमाल यातायात और सड़क सुरक्षा से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन में किया जा सकता है।

केंद्र सरकार के स्तर पर भी सड़क सुरक्षा में इलेक्ट्रॉनिक मॉनिटरिंग और इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन को बढ़ावा देने की व्यवस्था की गई है। मोटर व्हीकल कानून के तहत स्पीड कैमरा, CCTV, ANPR और वजन मापने वाली प्रणालियों जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग सड़क सुरक्षा एवं नियमों के प्रवर्तन में किया जा सकता है।


पहाड़ी और हादसे वाले स्थानों पर यूनिपोल की योजना

सड़क सुरक्षा योजनाओं में पहाड़ी और हादसों वाले स्थानों पर यूनिपोल की स्थापना का भी प्रावधान किया गया था।

इसके लिए लगभग 15 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है।

यूनिपोल, संकेतक और सड़क सुरक्षा से जुड़े डिस्प्ले वाहन चालकों को आगे आने वाले संवेदनशील क्षेत्र, मोड़, गति सीमा और अन्य जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं।

विशेष रूप से पहाड़ी इलाकों में सड़क की संरचना, तीखे मोड़, ढलान और सीमित दृश्यता के कारण चालक को पहले से चेतावनी देना महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस तरह की व्यवस्थाओं का उद्देश्य वाहन चालक को सड़क की स्थिति के बारे में पहले से जानकारी उपलब्ध कराकर दुर्घटना की आशंका कम करना है।


Automated Testing Track के लिए 20 करोड़

सड़क सुरक्षा योजनाओं में Automated Testing Track भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके लिए 20 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था।

ऑटोमेटेड टेस्टिंग सिस्टम का उद्देश्य वाहनों की फिटनेस जांच को अधिक तकनीकी और मानकीकृत बनाना है। ऐसे सिस्टम में वाहन की विभिन्न तकनीकी स्थितियों की जांच निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार की जा सकती है।

इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि सड़क पर चलने वाले वाहनों की तकनीकी स्थिति सीधे सड़क सुरक्षा से जुड़ी होती है।

यदि किसी वाहन में ब्रेक, लाइट, उत्सर्जन या अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी कमी है तो उसकी पहचान फिटनेस जांच के दौरान की जानी जरूरी है।

केंद्र सरकार के स्तर पर भी Automated Testing Stations को बढ़ावा दिया जा रहा है। दिसंबर 2025 तक केंद्र सरकार के अनुसार 19 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में 160 Automated Testing Stations चालू थे और 99 अन्य सुविधाएं निर्माणाधीन थीं।


वाहन वजन प्रणाली पर भी खर्च का प्रावधान

स्वीकृत योजनाओं में वाहन वजन प्रणाली के लिए भी राशि रखी गई थी।

अखबार की रिपोर्ट के अनुसार इसके लिए लगभग 75 लाख रुपये का प्रावधान था।

ओवरलोड वाहन सड़क सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण विषय होते हैं। अत्यधिक भार से वाहन की नियंत्रण क्षमता प्रभावित हो सकती है और सड़क पर दुर्घटना का जोखिम बढ़ सकता है। साथ ही सड़क की गुणवत्ता पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

इसलिए वजन जांच प्रणाली सड़क सुरक्षा के साथ-साथ परिवहन नियमों के पालन में भी उपयोगी हो सकती है।


24 इंटरसेप्टर वैन की व्यवस्था

सड़क सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 24 इंटरसेप्टर वैन की व्यवस्था की योजना भी बनाई गई थी।

इसके लिए लगभग 5.76 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है।

इंटरसेप्टर वाहन सामान्यत: सड़क पर नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहनों की पहचान और निगरानी के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनका इस्तेमाल विशेष रूप से तेज गति, खतरनाक ड्राइविंग और अन्य यातायात उल्लंघनों की जांच में किया जा सकता है।

यदि इन वाहनों को संवेदनशील और दुर्घटना संभावित मार्गों पर प्रभावी तरीके से लगाया जाए तो यातायात नियमों के पालन की निगरानी बढ़ाई जा सकती है।


Road Safety Call Center के लिए 7.01 करोड़

योजना में Road Safety Call Center की स्थापना के लिए लगभग 7.01 करोड़ रुपये का प्रावधान भी किया गया था।

सड़क दुर्घटना की स्थिति में समय पर सूचना पहुंचना राहत और बचाव के लिए महत्वपूर्ण होता है। कॉल सेंटर जैसी व्यवस्था के माध्यम से सड़क सुरक्षा से जुड़ी शिकायतें, दुर्घटना संबंधी सूचनाएं और अन्य आवश्यक जानकारी संबंधित सिस्टम तक पहुंचाई जा सकती है।

इस तरह की व्यवस्था को पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, एंबुलेंस और अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ समन्वय में उपयोग किया जा सकता है।


DRARMS, पुलिसकर्मी और एंबुलेंस ड्राइवरों की ट्रेनिंग

सड़क सुरक्षा केवल कैमरे और तकनीक लगाने से मजबूत नहीं होती। इसके लिए उन कर्मचारियों की ट्रेनिंग भी जरूरी है जो दुर्घटना के बाद मौके पर पहुंचते हैं।

इसी वजह से योजना में DRARMS, इंजीनियर, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिसकर्मी, एंबुलेंस ड्राइवर और डॉक्टरों के प्रशिक्षण के लिए भी राशि रखी गई थी।

अखबार की कटिंग में इस मद के लिए करीब 0.25 करोड़ रुपये यानी 25 लाख रुपये का प्रावधान दिखाई देता है।

ऐसी ट्रेनिंग का उद्देश्य दुर्घटना के बाद शुरुआती प्रतिक्रिया को बेहतर करना, घायल लोगों को प्राथमिक सहायता उपलब्ध कराना और राहत कार्य में विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत करना हो सकता है।


जीवन रक्षक आपातकालीन सेवा योजना

स्वीकृत योजनाओं में जीवन रक्षक आपातकालीन सेवा योजना भी शामिल थी।

अखबार की रिपोर्ट में इसके लिए करीब 7.01 करोड़ रुपये का प्रावधान बताया गया है।

सड़क दुर्घटना में शुरुआती कुछ समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। दुर्घटना स्थल से घायल व्यक्ति को अस्पताल तक पहुंचाने में जितनी तेजी होगी, उपचार शुरू होने की संभावना उतनी जल्दी होगी।

इसी कारण सड़क सुरक्षा नीति में केवल दुर्घटना रोकने पर ही नहीं बल्कि दुर्घटना के बाद की आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर भी जोर दिया जाता है।


सड़क सुरक्षा जागरूकता के लिए 2.50 करोड़ रुपये

योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा सड़क सुरक्षा जागरूकता अभियान भी है।

इसके लिए 2.50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था।

सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए लोगों को यातायात नियमों की जानकारी देना जरूरी है। हेलमेट, सीट बेल्ट, निर्धारित गति सीमा, गलत दिशा में वाहन नहीं चलाना, वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं करना और शराब पीकर वाहन नहीं चलाना जैसे नियम सड़क सुरक्षा के मूल हिस्से हैं।

केंद्र सरकार की सड़क सुरक्षा पहल भी हेलमेट और सीट बेल्ट, ओवरस्पीडिंग, शराब पीकर ड्राइविंग और ड्राइविंग के दौरान मोबाइल फोन के इस्तेमाल जैसे जोखिमों को कम करने पर जोर देती है।


आखिर 11 महीने से योजनाएं क्यों अटकी हैं?

मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अक्टूबर 2025 में योजनाओं को मंजूरी मिलने के बाद भी करीब 11 महीने में अपेक्षित प्रगति क्यों नहीं हो सकी।

परिवहन विभाग ने इसी विषय पर परिवहन आयुक्त से जवाब मांगा है।

विभाग ने केवल योजनाओं की वर्तमान स्थिति पूछने तक मामला सीमित नहीं रखा है। यह भी पूछा गया है कि योजनाएं लंबित रहने के वास्तविक कारण क्या हैं और इनके क्रियान्वयन के लिए संबंधित स्तर से अब तक क्या कार्रवाई की गई।

साथ ही संबंधित विभागों और कार्यान्वयन एजेंसियों के साथ हुए पत्राचार और समन्वय का विवरण भी मांगा गया है।

इससे स्पष्ट है कि विभाग अब योजनाओं की फाइल-स्तरीय स्थिति के साथ-साथ उनके क्रियान्वयन की प्रक्रिया का भी विवरण चाहता है।


31 जुलाई को भी मांगा गया था स्पष्टीकरण

रिपोर्ट के मुताबिक, परिवहन विभाग की ओर से 31 जुलाई 2026 को भी परिवहन आयुक्त से स्पष्टीकरण मांगा गया था।

उस समय निर्धारित अवधि के भीतर जवाब देने को कहा गया था। लेकिन विभाग के अनुसार जवाब नहीं मिला।

इसके बाद अब दोबारा शो-कॉज नोटिस जारी किया गया है।

नए पत्र में सिर्फ योजनाओं की देरी पर जवाब नहीं मांगा गया है, बल्कि पहले मांगे गए स्पष्टीकरण का उत्तर समय पर नहीं देने का कारण भी पूछा गया है।


छह बिंदुओं पर मांगा गया जवाब

नए शो-कॉज में मुख्य रूप से छह बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई है।

1. योजनाओं की वर्तमान स्थिति

10 अक्टूबर 2025 को मंजूर की गई सभी योजनाओं की वर्तमान स्थिति और अब तक हुई प्रगति बतानी होगी।

2. देरी का कारण

योजनाओं को निर्धारित समय में लागू नहीं किए जाने के कारण की जानकारी देनी होगी।

3. प्रशासनिक कार्रवाई

योजनाओं के क्रियान्वयन, निगरानी और समन्वय के लिए परिवहन आयुक्त के स्तर से अब तक क्या कार्रवाई की गई, इसका विवरण देना होगा।

4. संबंधित एजेंसियों से पत्राचार

योजनाओं को लागू करने वाली संबंधित एजेंसियों और विभागों के साथ किए गए पत्राचार की जानकारी देनी होगी।

5. आगे की कार्ययोजना

सभी योजनाओं को जल्द लागू करने के लिए समय-सीमा के साथ Action Plan देना होगा।

6. पहले जवाब नहीं देने का कारण

31 जुलाई 2026 को मांगे गए पहले स्पष्टीकरण का जवाब निर्धारित समय में क्यों नहीं दिया गया, इसका भी स्पष्ट कारण बताना होगा।


सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी हवाला

परिवहन विभाग ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के सड़क सुरक्षा से जुड़े निर्देशों का भी उल्लेख किया है।

विशेष रूप से Intelligent Traffic Management System यानी ITMS और Electronic Enforcement जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने पर जोर दिए जाने का उल्लेख रिपोर्ट में है।

ITMS का उद्देश्य यातायात व्यवस्था में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना है। इसमें कैमरा, सेंसर, ट्रैफिक मॉनिटरिंग और इलेक्ट्रॉनिक चालान जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं।

ऐसी तकनीक के जरिए यातायात नियमों के उल्लंघन को रिकॉर्ड किया जा सकता है और आवश्यक कार्रवाई की प्रक्रिया को अधिक तकनीकी बनाया जा सकता है।


Electronic Enforcement क्यों महत्वपूर्ण है?

सड़क पर हर समय पुलिसकर्मी की मौजूदगी संभव नहीं होती। ऐसे में तकनीक के माध्यम से निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।

ANPR कैमरे वाहनों की नंबर प्लेट पहचान सकते हैं। CCTV से सड़क की स्थिति की निगरानी हो सकती है। स्पीड कैमरे निर्धारित सीमा से अधिक गति की पहचान कर सकते हैं।

केंद्र सरकार की जानकारी के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन उपकरणों में स्पीड कैमरा, CCTV, स्पीड गन, बॉडी-वॉर्न कैमरा, डैशबोर्ड कैमरा, ANPR और Weight-in-Motion जैसी तकनीकें शामिल हो सकती हैं।

झारखंड की प्रस्तावित सड़क सुरक्षा योजनाओं में भी कई ऐसी तकनीकों को शामिल किया गया है।


योजना लागू होने पर क्या बदल सकता है?

यदि स्वीकृत योजनाएं पूरी तरह लागू होती हैं तो सड़क सुरक्षा व्यवस्था में कई स्तरों पर बदलाव की संभावना है।

सबसे पहले दुर्घटना संभावित स्थानों की निगरानी बढ़ सकती है। ब्लैक स्पॉट पर कैमरे और अन्य उपकरण लगाए जाने से इन क्षेत्रों पर प्रशासन की नजर मजबूत हो सकती है।

दूसरा, यातायात नियमों का इलेक्ट्रॉनिक प्रवर्तन बढ़ सकता है।

तीसरा, वाहन फिटनेस और वजन जांच की व्यवस्था तकनीकी रूप से मजबूत हो सकती है।

चौथा, इंटरसेप्टर वैन और रोड सेफ्टी इंफोर्समेंट पॉइंट से सड़क पर निगरानी बढ़ाई जा सकती है।

पांचवां, जागरूकता अभियान के माध्यम से आम लोगों तक सड़क सुरक्षा का संदेश पहुंचाया जा सकता है।

छठा, आपातकालीन सेवाओं और संबंधित कर्मचारियों की ट्रेनिंग से दुर्घटना के बाद की प्रतिक्रिया को बेहतर करने का प्रयास किया जा सकता है।


सिर्फ बजट मंजूरी काफी नहीं, जमीन पर क्रियान्वयन जरूरी

सड़क सुरक्षा जैसी योजनाओं में केवल बजट स्वीकृत होना पर्याप्त नहीं होता। कैमरे कहां लगेंगे, कौन सी एजेंसी लगाएगी, उपकरणों की खरीद कैसे होगी, डेटा का संचालन कौन करेगा, चालान व्यवस्था से सिस्टम कैसे जुड़ेगा और रखरखाव कैसे होगा—इन सभी चरणों का समय पर पूरा होना जरूरी है।

इसी तरह Automated Testing Track की स्थापना के लिए जमीन, तकनीकी उपकरण, ऑपरेटर, मानक प्रक्रिया और प्रमाणन जैसे कई पहलुओं पर काम करना होता है।

इंटरसेप्टर वैन के लिए वाहन उपलब्ध कराने के साथ प्रशिक्षित कर्मचारी भी जरूरी हैं।

Road Safety Call Center के लिए तकनीकी सिस्टम और प्रशिक्षित कर्मचारी चाहिए।

इसलिए सड़क सुरक्षा के लिए स्वीकृत राशि को वास्तविक परिणाम में बदलने के लिए विभागों और एजेंसियों के बीच लगातार समन्वय जरूरी है।


सड़क सुरक्षा में जागरूकता की भी बड़ी भूमिका

सड़क सुरक्षा व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा आम नागरिकों के व्यवहार से जुड़ा है।

यदि वाहन चालक गति सीमा का पालन करे, हेलमेट और सीट बेल्ट का इस्तेमाल करे, मोबाइल फोन का उपयोग न करे, शराब पीकर वाहन न चलाए और गलत दिशा में ड्राइविंग से बचे तो दुर्घटनाओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।

इसी कारण स्वीकृत योजनाओं में जागरूकता अभियान के लिए अलग से राशि रखी गई थी।

रांची ट्रैफिक पुलिस भी अपने जागरूकता अभियानों में नियमों का पालन, सतर्क रहने, तेज गति से बचने और पैदल यात्रियों के प्रति सावधानी जैसे संदेश देती रही है।


तकनीक और मानव संसाधन दोनों जरूरी

सड़क सुरक्षा के लिए केवल आधुनिक कैमरे और ITMS पर्याप्त नहीं हैं।

तकनीक से डेटा मिल सकता है, लेकिन उस डेटा पर कार्रवाई के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी चाहिए।

उदाहरण के तौर पर ANPR कैमरे किसी वाहन की नंबर प्लेट रिकॉर्ड कर सकते हैं, लेकिन संदिग्ध या नियम उल्लंघन के मामले में आगे की कार्रवाई के लिए विभागीय सिस्टम और कर्मचारी जरूरी हैं।

इसी तरह दुर्घटना की सूचना मिलने के बाद एंबुलेंस को समय पर मौके पर पहुंचना और घायल को उचित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना जरूरी है।

इसलिए 166.92 करोड़ रुपये की योजनाओं में तकनीकी उपकरणों के साथ प्रशिक्षण और आपातकालीन व्यवस्था को शामिल किया जाना सड़क सुरक्षा के व्यापक ढांचे का हिस्सा है।


अब आगे क्या होगा?

परिवहन विभाग की ओर से जारी नए शो-कॉज के बाद अब परिवहन आयुक्त से निर्धारित समय में जवाब मांगा गया है।

जवाब में योजनाओं की मौजूदा स्थिति, देरी के कारण, अब तक की गई कार्रवाई और आगे की समयबद्ध कार्ययोजना बतानी होगी।

इसके बाद विभाग उपलब्ध जवाब और दस्तावेजों के आधार पर आगे की कार्रवाई कर सकता है।

मुख्य सचिव कार्यालय को भी पत्र की प्रतिलिपि भेजे जाने की बात रिपोर्ट में सामने आई है।

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि स्वीकृत सड़क सुरक्षा योजनाओं को अब कितनी तेजी से जमीन पर उतारा जाता है।


झारखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?

झारखंड में शहरों के साथ-साथ राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर भी बड़ी संख्या में वाहन चलते हैं। पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में सड़क की भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं, जबकि बड़े शहरों में यातायात का दबाव अलग तरह की चुनौतियां पैदा करता है।

ऐसे में सड़क सुरक्षा की एक समान व्यवस्था हर स्थान पर लागू करना आसान नहीं है।

कुछ स्थानों पर CCTV और ANPR अधिक उपयोगी हो सकते हैं, तो कुछ क्षेत्रों में सड़क डिजाइन, संकेतक, बैरियर और स्पीड कंट्रोल की जरूरत ज्यादा हो सकती है।

इसी तरह दुर्घटना संभावित ग्रामीण क्षेत्रों में एंबुलेंस और आपातकालीन सेवा की उपलब्धता महत्वपूर्ण हो सकती है।

इसलिए स्वीकृत योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन से राज्य में सड़क सुरक्षा व्यवस्था को कई स्तरों पर मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।


निष्कर्ष

झारखंड में 166.92 करोड़ रुपये की सड़क सुरक्षा योजनाओं का 11 महीने बाद भी अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ना परिवहन विभाग के लिए महत्वपूर्ण प्रशासनिक मामला बन गया है। अक्टूबर 2025 में स्वीकृत योजनाओं में CCTV, SVD और ANPR कैमरे, Automated Testing Track, वाहन वजन प्रणाली, इंटरसेप्टर वैन, Road Safety Call Center, जागरूकता अभियान और कर्मचारियों की ट्रेनिंग जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं।

अब परिवहन विभाग ने दोबारा शो-कॉज जारी कर योजनाओं की स्थिति और देरी के कारणों पर जवाब मांगा है। साथ ही भविष्य के लिए समयबद्ध Action Plan देने को कहा गया है।

सड़क सुरक्षा योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य तभी पूरा होगा जब स्वीकृत राशि और योजनाएं फाइलों से निकलकर कैमरे, ITMS, फिटनेस जांच, इंटरसेप्टर, जागरूकता अभियान और आपातकालीन सेवाओं के रूप में जमीन पर दिखाई दें।

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