10 हजार लोगों का ऐतिहासिक 'भाषा मार्च', मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए सड़क पर उतरा जनसैलाब10 हजार लोगों का ऐतिहासिक 'भाषा मार्च', मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए सड़क पर उतरा जनसैलाब

रांची:
झारखंड की भौगोलिक सीमाओं, खनिज संपदा और प्राकृतिक सौंदर्य से परे यदि इस राज्य की असली धड़कन कहीं बसती है, तो वह यहां की समृद्ध जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं में बसती है। सदियों से मौखिक परंपरा, लोकगीतों, लोककथाओं और पारंपरिक ज्ञान के जरिए जीवित रही इन भाषाओं के अस्तित्व, सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए राजधानी रांची का मोरहाबादी मैदान से लेकर भगवान बिरसा मुंडा का समाधि स्थल तक का इलाका ऐतिहासिक गवाह बन गया। मौका था ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा’ के आह्वान पर निकाले गए विशाल ‘भाषा मार्च’ का, जिसमें राज्य के कोने-कोने से पहुंचे लगभग 10 हजार से अधिक लोगों ने शिरकत की।

इस आंदोलन ने यह साफ कर दिया कि झारखंड की नई पीढ़ी अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी भाषाई अस्मिता को लेकर न केवल जागरूक है, बल्कि अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए मुखर होकर संघर्ष करने को भी तैयार है।


बापू वाटिका से उठी हुंकार, बिरसा समाधि पर लिया गया संकल्प

कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत रांची के मोरहाबादी स्थित बापू वाटिका से हुई। सुबह से ही विभिन्न जिलों से आए छात्र-छात्राओं, शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, साहित्य प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का जुटना शुरू हो गया था। हाथों में अपनी मातृभाषा के समर्थन में तख्तियां और जुबां पर झारखंडी संस्कृति के सम्मान के नारे लिए यह विशाल जनसमूह जब आगे बढ़ा, तो पूरा शहर झारखंडी रंगों और संस्कृति में रंग गया।

हजारों लोगों का यह कारवां मोरहाबादी से होता हुआ राजधानी के मुख्य मार्ग अल्बर्ट एक्का चौक पर पहुंचा। यहाँ से यह जुलूस झारखंड के महानायक भगवान बिरसा मुंडा के समाधि स्थल की ओर बढ़ा। समाधि स्थल पर पहुंचकर मार्च में शामिल लोगों ने पुरखों के सपनों का झारखंड बनाने और यहाँ की तमाम जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की हिफाजत करने का सामूहिक संकल्प लिया। पूरे मार्ग में झारखंड की संथाली, मुंडारी, हो, कुड़ुख, खड़िया, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली और पंचपरगनिया जैसी भाषाओं के समर्थन में गूंजते नारों ने प्रशासनिक गलियारों तक स्पष्ट संदेश भेज दिया।


भाषा किसी समाज की आत्मा होती है: बंधु तिर्की

इस ऐतिहासिक मार्च में मुख्य वक्ता के रूप में शामिल झारखंड सरकार के पूर्व शिक्षा मंत्री श्री बंधु तिर्की ने जनसैलाब को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी समाज और राष्ट्र की पहचान केवल उसके भवनों या सड़कों से नहीं होती, बल्कि उसकी भाषा और संस्कृति से होती है।

उन्होंने बड़े ही मार्मिक शब्दों में कहा, “भाषा किसी भी समाज की आत्मा होती है। एक पीढ़ी अपने पूर्वजों का ज्ञान, इतिहास, दर्शन और संस्कृति भाषा के माध्यम से ही अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित करती है। यदि भाषा ही समाप्त हो जाएगी, तो हमारी संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का अस्तित्व भी स्वतः समाप्त हो जाएगा। इसलिए झारखंड की भाषाओं की उपेक्षा करना सीधे तौर पर झारखंड की आत्मा पर प्रहार करने के समान है।”

उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि झारखंड में अनगिनत भाषाएं और बोलियां हैं, जिनमें लोक साहित्य का अथाह भंडार छिपा है। इसके बावजूद आज तक इन भाषाओं के विकास, प्रचार-प्रसार और शैक्षणिक विस्तार के लिए कोई ठोस संस्थागत और ढांचागत व्यवस्था नहीं बन पाई है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भाषा का संरक्षण केवल सम्मेलनों, बैठकों या नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसके लिए धरातल पर कड़े नीतिगत निर्णय लेने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर उनके साथ खलिक अहमद, हरि वृंदावन सहित कई शिक्षाविद, बुद्धिजीवी और मोर्चा के प्रमुख भाषा संयोजक—पप्पू कुमार, बिनधार, जगदीश, बसंत, मानकी, लिबयान, संतोष और सहदेव जैसे युवा व सामाजिक प्रतिनिधियों ने भी अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई और आंदोलन को धार दी।


झारखंड के गठन के मूल सपनों से जुड़ा है यह आंदोलन

वक्ताओं ने अपने संबोधन में झारखंड आंदोलन के इतिहास को याद करते हुए कहा कि अलग राज्य के लिए किए गए लंबे संघर्ष के मूल आधारों में यहाँ की जल, जंगल, जमीन के साथ-साथ आदिवासी-मूलवासी अस्मिता और भाषा-संस्कृति की सुरक्षा प्रमुख रूप से शामिल थी। राज्य गठन के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी यदि झारखंड के मूल बाशिंदों की भाषाएं शिक्षा, रोजगार, प्रशासन और अकादमिक जगत में उपेक्षित हैं, तो यह गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

वक्ताओं ने इस बात पर भी विशेष बल दिया कि भाषाएं किसी एक जाति, धर्म या वर्ग विशेष की बपौती नहीं होतीं, बल्कि वे पूरे समाज की साझा विरासत होती हैं। झारखंड की ये क्षेत्रीय और जनजातीय भाषाएं राज्य के विभिन्न समुदायों को आपस में पिरोने और जोड़ने का काम करती हैं। इन भाषाओं को बचाना केवल एक समुदाय विशेष की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह पूरे झारखंड के गौरव और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य को बचाने का एक सामूहिक और नैतिक प्रयास है।


मोर्चा की 10 प्रमुख और दूरदर्शी मांगें

इस विशाल भाषा मार्च के दौरान ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा’ की ओर से सरकार के समक्ष एक स्पष्ट, तार्किक और दूरदर्शी 10 सूत्री मांग पत्र रखा गया, जो निम्नलिखित है:

  1. प्रभावी भाषा नीति का क्रियान्वयन: झारखंड की सभी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, विकास और उपयोग के लिए एक स्पष्ट और प्रभावी राज्य भाषा नीति तुरंत लागू की जाए।
  2. भाषा अकादमी की स्थापना: राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा अकादमी’ की स्थापना हो, जो इन भाषाओं के साहित्य, संस्कृति और शोध कार्यों को संस्थागत संरक्षण प्रदान कर सके।
  3. मातृभाषा में शिक्षा व्यवस्था: प्राथमिक कक्षाओं से लेकर उच्च शिक्षा एवं विश्वविद्यालय स्तर तक विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाई करने की समुचित और गुणवत्तापूर्ण व्यवस्था मिले।
  4. शिक्षकों के रिक्त पदों पर बहाली: विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के लिए स्वीकृत एवं आवश्यक शिक्षकों के खाली पड़े पदों पर तत्काल और पारदर्शी नियुक्तियां की जाएं।
  5. स्वतंत्र बजट आवंटन: प्रत्येक भाषा के स्वतंत्र विकास, पठन-पाठन सामग्री के प्रकाशन और शोध कार्यों के लिए अलग से विशेष बजट का प्रावधान किया जाए।
  6. साहित्यकारों और कलाकारों का सम्मान: झारखंडी साहित्यकारों, लेखकों, कवियों, पारंपरिक लोक कलाकारों और शोधकर्ताओं को वित्तीय प्रोत्साहन, मंच और राज्यकीय सम्मान प्रदान किया जाए।
  7. उच्च शिक्षा व शोध केंद्र: विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में इन भाषाओं के उच्च स्तरीय अध्ययन, शोध (Research) और अध्यापन के लिए आधुनिक संसाधनयुक्त विभागों का सुदृढ़ीकरण हो।
  8. लोक साहित्य का दस्तावेजीकरण: झारखंड की तमाम भाषाओं के लोक साहित्य, लोकगीत, लोककथाओं, पारंपरिक ज्ञान और मौखिक इतिहास (Oral History) को डिजिटल और लिखित रूप में सहेजने के लिए बड़े पैमाने पर दस्तावेजीकरण का कार्य कराया जाए।
  9. प्रशासनिक व सरकारी उपयोग: सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक गतिविधियों, विज्ञापनों और जनसंपर्क के माध्यमों में झारखंड की इन लोक भाषाओं को उचित और अनिवार्य स्थान दिया जाए।
  10. स्थायी विशेषज्ञ निकाय: भाषा संरक्षण और संवर्धन से जुड़ी नीतियों के निर्धारण के लिए विषय विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और भाषा प्रतिनिधियों को शामिल कर एक स्थायी सलाहकार निकाय का गठन किया जाए।

युवा पीढ़ी की भारी भागीदारी ने बदली आंदोलन की तस्वीर

इस पूरे मार्च का सबसे सुखद और प्रेरणादायक पहलू इसमें छात्र-छात्राओं की भारी-भरकम भागीदारी रही। राज्यभर के करीब 30 से अधिक महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से आए युवाओं ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता की दौड़ में वे अपनी जड़ों से कटे नहीं हैं।

मार्च में शामिल कई विद्यार्थियों ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि उनकी मातृभाषा केवल उनके घरों और गांवों की चारदीवारी तक सीमित न रहे, बल्कि आधुनिक युग के स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में भी उसे पूरा मान-सम्मान मिले। युवाओं की यह मुखर उपस्थिति यह बताने के लिए काफी थी कि आने वाले समय में झारखंड की सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित हाथों में है।


शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखने का संकल्प

कार्यक्रम के अंत में मोर्चा के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की कि आज का यह विशाल भाषा मार्च किसी भी राजनीतिक दल, सरकार या व्यक्ति विशेष के विरोध में नहीं है। यह विशुद्ध रूप से झारखंड की भाषाओं के अधिकार, मान-सम्मान और उनके उज्ज्वल भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उठाया गया एक सकारात्मक और रचनात्मक कदम है।

मोर्चा ने यह भी चेताया कि यह आंदोलन किसी एक दिन के कार्यक्रम या प्रतीकात्मक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहने वाला है। जब तक झारखंड की सभी जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं को उनका उचित शैक्षणिक, सामाजिक और संस्थागत अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक यह संघर्ष पूरी तरह से लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और चरणबद्ध तरीके से निरंतर जारी रहेगा।

अंततः, इस ऐतिहासिक भाषा मार्च ने हुकूमत और समाज को यह अकाट्य संदेश दे दिया है कि झारखंड की भाषाएं मात्र संवाद या बातचीत का साधन भर नहीं हैं, बल्कि वे यहाँ के सुदूर इतिहास, संस्कृति, सभ्यता और अस्मिता की मजबूत आधारशिला हैं। यह सत्य अटल है कि— “भाषा बचेगी, तभी संस्कृति बचेगी और संस्कृति बचेगी, तभी झारखंड की विशिष्ट पहचान सुरक्षित रहेगी।”

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