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रांची। झारखंड में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का असर अब अंचल कार्यालयों के नियमित कामकाज पर भी दिखाई देने लगा है। बड़ी संख्या में राजस्व एवं अंचल स्तर के कर्मचारियों को निर्वाचन संबंधी कार्यों में लगाए जाने के कारण जमीन के म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज सहित जाति, आय और आवासीय प्रमाण पत्र से जुड़े काम प्रभावित होने की शिकायत सामने आ रही है। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जिन्हें जमीन से जुड़े दस्तावेज या विभिन्न सरकारी और प्रशासनिक कार्यों के लिए जरूरी प्रमाण पत्र समय पर चाहिए।

राज्य के म्यूटेशन डैशबोर्ड के 20 सितंबर 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, झारखंड में कुल 25,84,447 म्यूटेशन मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें 12,41,899 मामलों का निपटारा हो चुका है, जबकि 68,555 मामले अभी भी लंबित हैं। इसके अलावा 12,73,993 मामले खारिज किए जा चुके हैं। यानी राज्य में दाखिल-खारिज से जुड़े मामलों का बड़ा हिस्सा किसी न किसी स्तर पर प्रक्रिया से गुजर चुका है, लेकिन हजारों आवेदन अभी भी लंबित हैं।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि म्यूटेशन के किसी मामले के निपटारे में राज्य में औसतन 66 दिन लग रहे हैं। वहीं 20 सितंबर के आंकड़ों में एक ही दिन में 363 नए मामले दर्ज हुए, जबकि 1,014 मामलों का निपटारा किया गया और 436 मामले खारिज हुए।

ऐसे समय में जब SIR की प्रक्रिया में निर्वाचन संबंधी काम तेजी से चल रहा है और बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी उसमें लगाए गए हैं, अंचल कार्यालयों में नियमित राजस्व सेवाओं को समय पर जारी रखना प्रशासन के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है।


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20 सितंबर तक 68,555 म्यूटेशन मामले लंबित

म्यूटेशन जमीन से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है। किसी जमीन की खरीद-बिक्री, उत्तराधिकार या अन्य वैधानिक हस्तांतरण के बाद राजस्व रिकॉर्ड में नए मालिक या अधिकारधारी का नाम दर्ज करने की प्रक्रिया को आम तौर पर दाखिल-खारिज या म्यूटेशन कहा जाता है।

झारखंड में इसके लिए ऑनलाइन व्यवस्था भी संचालित है। बावजूद इसके बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं। 20 सितंबर तक 25.84 लाख से अधिक आवेदन दर्ज होने के मुकाबले 68,555 मामले लंबित थे।

यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जमीन से संबंधित रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने का असर आगे होने वाले कई प्रशासनिक और कानूनी कार्यों पर पड़ सकता है। म्यूटेशन लंबित रहने की स्थिति में आवेदक को अपने जमीन संबंधी रिकॉर्ड को लेकर आगे की प्रक्रियाओं में अतिरिक्त परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

दूसरी ओर, उपलब्ध आंकड़ों में 12,73,993 आवेदन खारिज होने की बात भी सामने आती है। किसी आवेदन के खारिज होने के पीछे दस्तावेजों की कमी, रिकॉर्ड में विसंगति, आपत्ति या प्रक्रिया संबंधी अन्य कारण हो सकते हैं। इसलिए हर खारिज आवेदन को केवल प्रशासनिक देरी का परिणाम मानना उचित नहीं होगा।

एक दिन में 363 नए आवेदन, 1,014 का निपटारा

20 सितंबर के म्यूटेशन डैशबोर्ड के आंकड़ों में एक दिन की गतिविधि भी सामने आई है। इस दिन राज्य में 363 नए म्यूटेशन मामले दर्ज हुए।

इसके मुकाबले 1,014 मामलों का निपटारा किया गया। वहीं 436 आवेदन खारिज किए गए।

इन आंकड़ों से यह जरूर पता चलता है कि लंबित मामलों को कम करने के लिए निपटारे की प्रक्रिया जारी है। लेकिन नए आवेदन भी लगातार आते रहते हैं। इसलिए केवल एक दिन में ज्यादा मामलों के निपटारे से लंबित मामलों की समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं होगी। इसके लिए लगातार और समयबद्ध तरीके से मामलों की समीक्षा करनी होगी।

राज्य में म्यूटेशन के निपटारे में औसतन 66 दिन लगने की जानकारी भी इसी चुनौती की ओर संकेत करती है।

SIR के दौरान कर्मचारियों की चुनावी ड्यूटी से बढ़ा दबाव

अंचल कार्यालयों में राजस्व से जुड़े काम करने वाले कर्मचारियों को SIR के दौरान निर्वाचन संबंधी जिम्मेदारियों में लगाया गया है। SIR यानी Special Intensive Revision का उद्देश्य मतदाता सूची की व्यापक समीक्षा और उसे अद्यतन करना है।

झारखंड में यह प्रक्रिया फिलहाल महत्वपूर्ण चरण में है। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार 20 सितंबर तक दावा-आपत्ति चरण में करीब 9.78 लाख आवेदन प्राप्त हो चुके थे। इनमें Form-6, Form-8, Form-7 और Form-6A से जुड़े आवेदन शामिल थे। निर्वाचन अधिकारियों को इन आवेदनों की जांच, सत्यापन, सुनवाई और निपटारे का काम निर्धारित समयसीमा में करना है।

इस बड़े निर्वाचन कार्य के लिए जिला और प्रखंड स्तर पर कर्मचारियों की जरूरत होती है। इनमें ऐसे कर्मचारी भी शामिल हैं जो सामान्य परिस्थितियों में राजस्व, प्रमाण पत्र और जमीन से जुड़े प्रशासनिक कार्यों में लगे रहते हैं।

इस वजह से एक ही प्रशासनिक तंत्र के सामने दोहरी जिम्मेदारी आ गई है—एक ओर मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण, दूसरी ओर आम लोगों को मिलने वाली नियमित राजस्व सेवाएं।

जमीन के साथ जाति, आय और आवासीय प्रमाण पत्र का काम भी प्रभावित

अंचल कार्यालयों की जिम्मेदारी केवल जमीन के म्यूटेशन तक सीमित नहीं है। आम नागरिकों को कई प्रकार के प्रमाण पत्रों के लिए भी इन कार्यालयों या संबंधित राजस्व प्रशासन पर निर्भर रहना पड़ता है।

इनमें प्रमुख रूप से जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र और आवासीय प्रमाण पत्र शामिल हैं।

इन प्रमाण पत्रों की जरूरत विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति और दाखिले में पड़ सकती है। सरकारी नौकरियों, विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं, आरक्षण संबंधी प्रक्रियाओं और अन्य प्रशासनिक कार्यों में भी इन दस्तावेजों की आवश्यकता होती है।

यदि प्रमाण पत्र समय पर नहीं बनता है, तो इसका असर सीधे आवेदक की अगली प्रक्रिया पर पड़ सकता है। उदाहरण के लिए किसी छात्र को छात्रवृत्ति के लिए आय या जाति प्रमाण पत्र की जरूरत है और प्रमाण पत्र बनने में देरी हो जाती है, तो उसे संबंधित आवेदन या सत्यापन प्रक्रिया में परेशानी हो सकती है।

इसी तरह नौकरी या सरकारी योजना के लिए निर्धारित समयसीमा में दस्तावेज जमा करना जरूरी हो तो प्रमाण पत्र में देरी अतिरिक्त समस्या पैदा कर सकती है।

आम लोगों को अंचल कार्यालयों के चक्कर लगाने की शिकायत

म्यूटेशन और प्रमाण पत्रों में देरी का एक महत्वपूर्ण प्रभाव यह है कि लोगों को बार-बार संबंधित कार्यालयों का चक्कर लगाना पड़ सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह समस्या और ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है। अंचल कार्यालय तक पहुंचने के लिए कई लोगों को अपने गांव या पंचायत से दूर जाना पड़ता है। यदि किसी एक आवेदन के संबंध में बार-बार कार्यालय जाना पड़े तो समय और आर्थिक संसाधन दोनों खर्च होते हैं।

ऑनलाइन आवेदन की व्यवस्था होने के बावजूद कई मामलों में आवेदकों को दस्तावेज, सत्यापन, आपत्ति या अन्य प्रक्रिया के लिए कार्यालय स्तर पर संपर्क करना पड़ता है।

इसलिए प्रशासनिक व्यवस्था में कर्मचारियों की उपलब्धता और मामलों के समय पर निपटारे का सीधा संबंध नागरिक सेवाओं की गति से है।

66 दिन का औसत समय क्यों महत्वपूर्ण है?

म्यूटेशन के निपटारे में औसतन 66 दिन लगना इसलिए महत्वपूर्ण आंकड़ा है क्योंकि जमीन से जुड़े मामलों में रिकॉर्ड अपडेट होना कई लोगों के लिए जरूरी होता है।

मसलन, किसी व्यक्ति ने जमीन खरीदी है और संबंधित रिकॉर्ड में उसका नाम दर्ज होना बाकी है। ऐसे में वह अपने भूमि रिकॉर्ड को अपडेट कराने के लिए म्यूटेशन प्रक्रिया पर निर्भर रहता है।

इसी तरह विरासत में मिली जमीन के मामलों में भी रिकॉर्ड में उत्तराधिकारी का नाम दर्ज कराने की आवश्यकता पड़ सकती है।

यदि किसी मामले में दस्तावेज पूरे हैं और कोई विवाद या आपत्ति नहीं है, तो उसके निपटारे में अनावश्यक देरी आवेदक के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। वहीं जिन मामलों में दस्तावेजों की जांच, आपत्ति या कानूनी स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है, उनमें स्वाभाविक रूप से ज्यादा समय लग सकता है।

इसलिए लंबित मामलों को उनकी प्रकृति के आधार पर अलग-अलग देखकर निपटाने की आवश्यकता होती है।

पहले भी सामने आ चुकी है म्यूटेशन में देरी की समस्या

झारखंड में म्यूटेशन मामलों के लंबित रहने की समस्या नई नहीं है। अगस्त 2026 में भी राज्य के ई-म्यूटेशन आंकड़ों को लेकर रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें 65,556 से अधिक मामले लंबित बताए गए थे और औसत निपटारा समय करीब 66 दिन बताया गया था। उस समय कुल दर्ज मामलों की संख्या करीब 25.67 लाख थी।

सितंबर में लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 68,555 बताई गई है। हालांकि अलग-अलग तारीखों के डैशबोर्ड आंकड़ों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि नए आवेदन लगातार जुड़ते रहते हैं और निपटारे तथा खारिज किए जाने की प्रक्रिया भी साथ चलती रहती है।

इसलिए केवल लंबित मामलों की संख्या में बदलाव से पूरी प्रशासनिक स्थिति का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इसके लिए जिलेवार, अंचलवार और मामले की उम्र के आधार पर आंकड़ों को देखना अधिक उपयोगी होगा।


30 और 90 दिन से ज्यादा पुराने मामलों पर भी नजर

राज्य के विभिन्न जिलों में प्रशासन की ओर से लंबित म्यूटेशन मामलों की समीक्षा की जा रही है। हाल में पश्चिमी सिंहभूम में उपायुक्त स्तर पर राजस्व कार्यों की समीक्षा के दौरान 30 दिन और 90 दिन से अधिक पुराने म्यूटेशन मामलों की स्थिति की अलग से समीक्षा करने तथा 90 दिन से अधिक पुराने मामलों को प्राथमिकता से निपटाने का निर्देश दिया गया था।

इससे यह संकेत मिलता है कि केवल कुल लंबित मामलों की संख्या ही नहीं, बल्कि कितने समय से मामला लंबित है, यह भी प्रशासनिक निगरानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है।

पुराने मामलों की अलग सूची बनाकर उनके लंबित रहने के कारणों की पहचान की जा सकती है। अगर दस्तावेज की कमी है तो आवेदक को इसकी जानकारी दी जा सकती है। यदि किसी स्तर पर सत्यापन लंबित है तो संबंधित अधिकारी से कार्रवाई कराई जा सकती है।


SIR और सामान्य प्रशासन के बीच संतुलन जरूरी

SIR एक व्यापक निर्वाचन प्रक्रिया है और मतदाता सूची की शुद्धता के लिए इसमें बड़ी संख्या में अधिकारियों और कर्मचारियों की आवश्यकता होती है। दूसरी तरफ नागरिकों को रोजमर्रा की सरकारी सेवाएं भी समय पर चाहिए।

ऐसे में प्रशासन के सामने चुनौती यह है कि निर्वाचन प्रक्रिया की समयसीमा प्रभावित न हो और साथ ही राजस्व एवं प्रमाण पत्र से जुड़े जरूरी काम भी पूरी तरह ठप न हों।

झारखंड में SIR की दावा-आपत्ति प्रक्रिया भी बड़ी संख्या में आवेदनों के कारण महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्य बन चुकी है। 20 सितंबर तक करीब 9.78 लाख आवेदन प्राप्त होने की जानकारी दी गई थी।

इसलिए कर्मचारियों की तैनाती, वैकल्पिक व्यवस्था और काम के बंटवारे को लेकर प्रशासनिक स्तर पर संतुलन बनाना जरूरी होगा।


मतदाता पुनरीक्षण के साथ जमीन के काम की भी निगरानी जरूरी

SIR की प्रक्रिया समयबद्ध है। वहीं म्यूटेशन और प्रमाण पत्रों के आवेदन भी लगातार आते रहते हैं। ऐसे में अंचल कार्यालयों में काम की निगरानी केवल निर्वाचन अवधि तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

लंबित म्यूटेशन की अंचलवार सूची तैयार करना, पुराने मामलों की पहचान करना और दैनिक निपटारे की समीक्षा करना उपयोगी कदम हो सकते हैं।

इसी तरह प्रमाण पत्रों के लंबित मामलों को भी अलग से मॉनिटर किया जा सकता है, ताकि विद्यार्थियों, नौकरी के आवेदकों और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों को समय पर दस्तावेज मिल सकें।


ऑनलाइन व्यवस्था के बावजूद मानवीय हस्तक्षेप की जरूरत

ई-म्यूटेशन और ऑनलाइन प्रमाण पत्र जैसी व्यवस्थाओं का उद्देश्य सरकारी सेवाओं को तेज और पारदर्शी बनाना है। लेकिन ऑनलाइन आवेदन के बाद भी कई मामलों में राजस्व रिकॉर्ड की जांच, दस्तावेजों का सत्यापन और स्थल संबंधी जानकारी की पुष्टि की जरूरत पड़ती है।

इसलिए तकनीकी व्यवस्था तभी प्रभावी होगी जब संबंधित स्तर पर पर्याप्त कर्मचारी और अधिकारी उपलब्ध हों।

SIR जैसी विशेष परिस्थिति में यदि कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा चुनाव संबंधी कार्य में लगाया जाता है, तो नियमित ऑनलाइन आवेदनों की जांच और निपटारे की गति प्रभावित हो सकती है।

यही कारण है कि तकनीकी व्यवस्था के साथ मानव संसाधन की उपलब्धता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।


12.73 लाख मामले खारिज, आवेदकों के लिए समझना जरूरी

20 सितंबर तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 12,73,993 म्यूटेशन मामले खारिज किए जा चुके थे।

यह संख्या भी बड़ी है। लेकिन खारिज मामलों को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि किस कारण आवेदन अस्वीकृत हुआ।

यदि किसी आवेदन में आवश्यक दस्तावेज नहीं हैं, भूमि रिकॉर्ड में अंतर है, उत्तराधिकार संबंधी विवाद है या किसी अन्य व्यक्ति की आपत्ति है, तो मामले की प्रकृति अलग होगी।

इसलिए आवेदकों के लिए यह जरूरी है कि आवेदन करते समय सभी आवश्यक दस्तावेज सही तरीके से उपलब्ध कराएं और आवेदन की स्थिति पर नजर रखें।

प्रशासन की ओर से भी आवेदन खारिज होने का कारण स्पष्ट रूप से उपलब्ध कराना नागरिकों के लिए उपयोगी होगा। इससे लोग आवश्यकता पड़ने पर सुधार कर दोबारा आवेदन या निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे की कार्रवाई कर सकेंगे।


जमीन से जुड़े मामलों का असर आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ता है

जमीन का रिकॉर्ड केवल सरकारी दस्तावेज नहीं है। यह किसी व्यक्ति की संपत्ति और उससे जुड़े अधिकारों से भी संबंधित होता है।

जमीन की खरीद-बिक्री, विरासत, बैंकिंग या अन्य वैधानिक प्रक्रियाओं में भूमि रिकॉर्ड की भूमिका हो सकती है। इसलिए म्यूटेशन में देरी का असर कभी-कभी व्यक्तिगत स्तर से आगे भी जा सकता है।

हालांकि हर म्यूटेशन आवेदन का स्वरूप अलग होता है और किसी आवेदन के लंबित रहने के कारण भी अलग-अलग हो सकते हैं। इसलिए सभी मामलों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है।

प्रशासनिक दृष्टि से सबसे जरूरी बात यह है कि जिन मामलों में कोई विवाद या कानूनी बाधा नहीं है, उनका समयबद्ध तरीके से निपटारा हो और जिन मामलों में समस्या है, उनके बारे में आवेदक को स्पष्ट जानकारी मिले।


SIR खत्म होने के बाद लंबित मामलों पर कितना असर पड़ेगा?

SIR की प्रक्रिया पूरी होने के बाद बड़ी संख्या में निर्वाचन संबंधी जिम्मेदारियों से जुड़े कर्मचारियों के नियमित विभागीय कार्यों में लौटने की संभावना रहेगी। इससे अंचल कार्यालयों में लंबित राजस्व मामलों के निपटारे की गति बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।

लेकिन केवल कर्मचारियों की वापसी से समस्या अपने आप खत्म नहीं होगी। लंबित मामलों की संख्या, पुराने आवेदनों, दस्तावेजों की स्थिति और मामलों की जटिलता के आधार पर विशेष अभियान चलाने की जरूरत पड़ सकती है।

जिलेवार समीक्षा और अंचलवार लक्ष्य निर्धारित करके लंबित मामलों को कम किया जा सकता है।


प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती

फिलहाल झारखंड के अंचल कार्यालयों के सामने दो महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हैं।

पहली, SIR के तहत निर्वाचन संबंधी कार्यों को समय पर पूरा करना, ताकि मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रिया निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ सके।

दूसरी, आम लोगों को नियमित राजस्व एवं प्रमाण पत्र सेवाएं उपलब्ध कराना, ताकि जमीन, जाति, आय और आवासीय प्रमाण पत्र जैसे जरूरी कार्य लंबे समय तक न अटकें।

इन दोनों के बीच संतुलन बनाना प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।


आम लोगों के लिए क्या मायने रखती है यह स्थिति?

इस पूरी स्थिति का सबसे सीधा असर आम नागरिक पर पड़ता है। जिन लोगों ने म्यूटेशन के लिए आवेदन किया है, उन्हें अपने आवेदन की स्थिति की जानकारी लेते रहना चाहिए।

इसी तरह जाति, आय या आवासीय प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करने वाले लोगों को भी आवेदन संख्या और आवश्यक दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए।

यदि किसी आवेदन में कमी बताई जाती है, तो उसे समय पर पूरा करना जरूरी है। जमीन से जुड़े मामलों में किसी प्रकार की आपत्ति या विवाद हो तो संबंधित कार्यालय से स्थिति की जानकारी लेना भी महत्वपूर्ण है।


आगे निगरानी और समयबद्ध निपटारे पर जोर जरूरी

20 सितंबर के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में एक दिन में 1,014 म्यूटेशन मामलों का निपटारा भी हुआ। इसका मतलब यह है कि लंबित मामलों को कम करने की प्रक्रिया चल रही है। लेकिन उसी समय 363 नए मामले दर्ज हुए और 436 मामले खारिज भी हुए।

इसलिए लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए लगातार कई दिनों और सप्ताहों के आंकड़ों को देखना जरूरी होगा।

प्रशासन के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि पुराने मामलों का निपटारा प्राथमिकता से किया जाए और नए आवेदनों को भी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार समय पर जांचा जाए।


SIR के बीच राजस्व सेवाओं को गति देना अगली चुनौती

झारखंड में SIR की प्रक्रिया ने निर्वाचन प्रशासन के सामने बड़ा कार्यभार रखा है। इसी दौरान अंचल कार्यालयों में म्यूटेशन और प्रमाण पत्रों से जुड़े काम प्रभावित होने की शिकायत सामने आई है।

20 सितंबर तक 25,84,447 म्यूटेशन मामलों में 68,555 लंबित, 12,41,899 निपटाए और 12,73,993 खारिज किए जाने का आंकड़ा मौजूदा स्थिति की तस्वीर पेश करता है। वहीं औसतन 66 दिन का निपटारा समय यह बताता है कि राजस्व सेवाओं की गति पर लगातार नजर रखने की जरूरत है।

SIR की समयबद्ध प्रक्रिया के साथ-साथ जमीन और प्रमाण पत्र से जुड़े नागरिक कार्यों को भी समान प्राथमिकता देना प्रशासन के लिए अहम रहेगा। खासकर विद्यार्थियों, नौकरी के आवेदकों और सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के लिए प्रमाण पत्र समय पर मिलना जरूरी है।

आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि SIR से जुड़े कर्मचारियों की व्यस्तता कम होने के बाद अंचल कार्यालयों में म्यूटेशन और अन्य राजस्व मामलों के निपटारे की गति कितनी बढ़ती है। फिलहाल उपलब्ध आंकड़े यही बताते हैं कि राज्य में हजारों म्यूटेशन मामले लंबित हैं और इनके निपटारे में औसतन 66 दिन का समय लग रहा है, जबकि आम नागरिक जमीन और जरूरी प्रमाण पत्रों के लिए अंचल कार्यालयों पर निर्भर हैं।

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