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रांची: झारखंड सरकार ने केंद्र के Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी शुरू कर दी है। राज्य सरकार का मुख्य तर्क खनिज संपदा से मिलने वाले राजस्व, राज्य के कराधिकार और 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से जुड़े संवैधानिक अधिकारों को लेकर है। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने अगस्त और सितंबर 2026 में सार्वजनिक रूप से कहा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की मंजूरी दी है और सरकार कानूनी विकल्प पर आगे बढ़ रही है।

अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार, विधि विभाग से राय लेने के बाद खान विभाग ने मामले की संचिका मुख्यमंत्री के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजी है। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल किए जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। विवाद का केंद्र यह है कि संसद से पारित 2026 के संशोधन ने राज्यों की ओर से खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस या अन्य लेवी लगाने की शक्ति पर नई पाबंदियां लगाई हैं।

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2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शुरू हुई थी नई व्यवस्था

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि 25 जुलाई 2024 के सुप्रीम कोर्ट के नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के फैसले से जुड़ी है। Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Ltd. मामले में सुप्रीम कोर्ट ने खनिज अधिकारों और रॉयल्टी से संबंधित कई महत्वपूर्ण संवैधानिक सवालों पर फैसला दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि खनिजों पर मिलने वाली रॉयल्टी को टैक्स नहीं माना जा सकता और राज्य विधानसभाओं को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता प्राप्त है, हालांकि खनिज अधिकारों पर राज्य की कर लगाने की शक्ति संसद द्वारा कानून के माध्यम से सीमित की जा सकती है। अदालत ने यह भी माना कि खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति राज्य के भूमि कराधिकार से जुड़ी है।

इस फैसले के बाद खनिज संपदा वाले राज्यों के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने की संभावनाएं बढ़ीं। झारखंड ने भी इसके बाद Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 बनाया। राज्य सरकार ने खनिज-युक्त भूमि से जुड़े सेस की व्यवस्था लागू करने की दिशा में कदम उठाया।

झारखंड ने 2024 में बनाया था Mineral Bearing Land Cess कानून

झारखंड विधानसभा ने अगस्त 2024 में खनिज-युक्त भूमि पर सेस लगाने के लिए विधेयक पारित किया था। इस कानून के तहत अलग-अलग खनिजों के लिए अलग दरें निर्धारित की गई थीं। उस समय रिपोर्टों के अनुसार कोयला और लौह अयस्क के लिए 100 रुपये प्रति टन, बॉक्साइट के लिए 70 रुपये और मैंगनीज तथा अन्य खनिजों के लिए 50 रुपये प्रति टन की दर प्रस्तावित की गई थी।

इस कानून का उद्देश्य राज्य में उपलब्ध खनिज संसाधनों से अतिरिक्त राजस्व प्राप्त करना था। सरकार का पक्ष रहा है कि झारखंड में खनन गतिविधियों के कारण राज्य को सड़क, आधारभूत संरचना, पर्यावरण, स्वास्थ्य और प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर भी खर्च करना पड़ता है। ऐसे में खनिज संसाधनों से मिलने वाले राजस्व का उपयोग राज्य के विकास और कल्याणकारी योजनाओं में किया जा सकता है।

झारखंड के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, 2024 में राज्य द्वारा पारित Mineral Bearing Land Cess कानून से लगभग 11,000 करोड़ रुपये सालाना राजस्व की संभावना बताई गई थी। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी कहा गया कि 2024-25 में खनन से जुड़ा राजस्व राज्य की अपनी गैर-कर प्राप्तियों का लगभग 84.9 प्रतिशत था।

अब 2026 के केंद्रीय संशोधन से क्या बदला?

संसद ने अगस्त 2026 में Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026 पारित किया। यह विधेयक 10 अगस्त को लोकसभा में पेश हुआ, 12 अगस्त को लोकसभा और 13 अगस्त को राज्यसभा से पारित हुआ। इसके जरिए 1957 के MMDR Act में कई बदलाव किए गए।

संशोधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा राज्यों की ओर से लगाए जाने वाले टैक्स और सेस से संबंधित है। विधेयक में राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर लगाए जाने वाले कुछ कर, सेस या अन्य लेवी को केंद्र द्वारा निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अधीन किया गया है। इसके अलावा, ऐसे कुछ पुराने बकाये जिन्हें संशोधन लागू होने से पहले जमा या वसूल नहीं किया गया था, उन्हें अमान्य किए जाने का प्रावधान भी रखा गया है।

केंद्रीय स्तर पर इस बदलाव के पीछे सरकार की ओर से यह तर्क रखा गया कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कर और सेस से खनन क्षेत्र पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। PRS के अनुसार विधेयक के उद्देश्यों में अलग-अलग दरों, कई प्रकार के लेवी, खनन शुरू होने के बाद अप्रत्याशित कर और पिछली अवधि से संबंधित करों जैसी समस्याओं को कम करना शामिल था।

झारखंड सरकार को करीब 14 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का मुद्दा

झारखंड सरकार ने संशोधन के बाद राज्य को होने वाले संभावित राजस्व प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा है कि राज्य ने मौजूदा वित्तीय वर्ष में खनिज सेस से करीब 14,000 करोड़ रुपये प्राप्त होने का अनुमान लगाया था। उनके अनुसार केंद्रीय संशोधन के बाद इस संभावित राजस्व पर असर पड़ सकता है।

सरकार का कहना है कि इस राजस्व का असर राज्य की विकास योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों की वित्तीय क्षमता पर पड़ सकता है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी अगस्त में प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में खनिज राजस्व की भूमिका और राज्य की वित्तीय स्थिति पर इसके संभावित प्रभाव का उल्लेख किया था।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 14,000 करोड़ रुपये संभावित राजस्व प्रभाव का राज्य सरकार का अनुमान है, न कि सुप्रीम कोर्ट या केंद्र सरकार द्वारा तय की गई निश्चित नुकसान राशि। इस राशि को इसी संदर्भ में समझना चाहिए।

सरकार की दलील: खनिज संसाधन से जुड़े खर्च भी राज्य को उठाने पड़ते हैं

झारखंड सरकार का कहना है कि राज्य में बड़े पैमाने पर खनन होता है और खनिज परिवहन से जुड़ी गतिविधियों के कारण राज्य को आधारभूत ढांचे पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने केंद्र को भेजे अपने पत्र में खनन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव, विस्थापन, भूमि संबंधी समस्याओं और स्थानीय आधारभूत ढांचे पर पड़ने वाले दबाव का उल्लेख किया था। उनका तर्क है कि खनिज संसाधनों से होने वाली आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ उन क्षेत्रों में रहने वाली आबादी और राज्य सरकार को इसके सामाजिक तथा पर्यावरणीय प्रभावों का सामना करना पड़ता है।

राज्य सरकार इसी आधार पर चाहती है कि खनिज संपदा वाले राज्यों को अपने संसाधनों से पर्याप्त राजस्व प्राप्त करने की संवैधानिक और वित्तीय गुंजाइश बनी रहे।

सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का फिर से संदर्भ

झारखंड सरकार की प्रस्तावित कानूनी चुनौती में 2024 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण आधार हो सकता है। PRS के विश्लेषण के अनुसार, 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि राज्य खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता रखते हैं। साथ ही अदालत ने खनिज-युक्त भूमि को भूमि कराधिकार के संदर्भ में भी देखा था।

वहीं 2026 के संशोधन ने राज्यों की इस शक्ति पर नई सीमाएं लगाने का प्रयास किया है। इसी वजह से संवैधानिक अधिकारों और संसद की विधायी शक्ति की सीमा को लेकर कानूनी सवाल उठ रहे हैं।

PRS के विश्लेषण में भी इस संशोधन से जुड़े कुछ संवैधानिक प्रश्नों की पहचान की गई है। इनमें खनिज-युक्त भूमि के नियमन को केंद्र के दायरे में लाने की संसद की क्षमता, पुराने बकायों को प्रभावित करने वाले प्रावधान और 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद की स्थिति जैसे मुद्दे शामिल हैं।

इन मुद्दों पर अंतिम संवैधानिक व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ही करेगा, यदि चुनौती अदालत के समक्ष स्वीकार होकर सुनवाई तक पहुंचती है।

पुराने बकाये को लेकर भी बड़ा विवाद

विवाद केवल भविष्य में सेस लगाने तक सीमित नहीं है। 2026 के संशोधन में पुराने ऐसे राज्य लेवी से जुड़े बकाये के संबंध में भी प्रावधान है, जिन्हें संशोधन लागू होने से पहले जमा या वसूल नहीं किया गया था। ऐसे कुछ बकाये को अमान्य किए जाने का प्रावधान है। हालांकि जो राशि पहले ही जमा या वसूल की जा चुकी है, उसे वापस करने का प्रावधान नहीं रखा गया है।

यही कारण है कि राज्य सरकार पुराने खनिज बकाये के मुद्दे को भी अपनी कानूनी चुनौती का हिस्सा मान रही है।

सितंबर 2026 में वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि राज्य सरकार संशोधित कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी और अपने दावे से जुड़े मुद्दों को कानूनी रूप से आगे बढ़ाएगी।

राज्य सरकार की फाइल मुख्यमंत्री के पास

अखबार की रिपोर्ट में बताया गया है कि खान विभाग ने विधि विभाग से राय लेने के बाद मुख्यमंत्री के पास संचिका भेजी है। मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।

वित्त मंत्री के सार्वजनिक बयानों से भी यह स्पष्ट है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है। अगस्त में उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री ने इस संबंध में आदेश दिया है। सितंबर में भी उन्होंने दोहराया कि संशोधित MMDR कानून के खिलाफ कानूनी चुनौती की तैयारी चल रही है।

इसका अर्थ यह है कि मामला अब केवल राजनीतिक या प्रशासनिक आपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि राज्य सरकार इसे न्यायिक मंच पर ले जाने की तैयारी में है।

केंद्र और राज्य के अधिकारों का सवाल

यह पूरा विवाद मूल रूप से केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक शक्तियों से भी जुड़ा हुआ है। भारत के संविधान में खनिज और खनन से जुड़े अलग-अलग पहलुओं के लिए केंद्र और राज्यों को अलग-अलग अधिकार दिए गए हैं।

MMDR Act, 1957 खनन क्षेत्र के विकास और नियमन का प्रमुख केंद्रीय कानून है। दूसरी ओर, राज्यों के पास खनिज अधिकारों और भूमि से जुड़े कुछ कराधिकार भी हैं। 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इन अधिकारों की संवैधानिक स्थिति पर महत्वपूर्ण व्याख्या दी थी।

2026 के संशोधन ने इसी क्षेत्र में केंद्र की भूमिका और राज्यों की कर लगाने की शक्ति के बीच संतुलन को नए तरीके से परिभाषित किया है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में होने वाली संभावित सुनवाई में यह सवाल महत्वपूर्ण हो सकता है कि संसद द्वारा लगाई गई नई सीमाएं संविधान के तहत राज्यों को प्राप्त शक्तियों के साथ किस तरह लागू होती हैं।

खनन क्षेत्र और उद्योग पर भी असर

केंद्र सरकार की ओर से संशोधन के पीछे दिए गए तर्कों में खनन क्षेत्र में अलग-अलग राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले करों और सेस की वजह से पैदा होने वाली लागत और अनिश्चितता को कम करना शामिल है। PRS के अनुसार, विधेयक के उद्देश्यों में कई प्रकार के कर और लेवी, अलग-अलग दरों और खनन शुरू होने के बाद लगाए जाने वाले अप्रत्याशित शुल्क जैसी समस्याओं को दूर करना भी शामिल था।

दूसरी ओर, खनिज संपदा वाले राज्यों का तर्क है कि स्थानीय संसाधनों से होने वाली आर्थिक गतिविधियों का लाभ राज्यों को भी मिलना चाहिए और खनन से जुड़े सामाजिक तथा पर्यावरणीय खर्चों को पूरा करने के लिए उनके पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन होने चाहिए।

इस तरह विवाद के दो अलग पहलू सामने आते हैं—एक तरफ खनन क्षेत्र के लिए समान और पूर्वानुमानित कर व्यवस्था की जरूरत, दूसरी तरफ राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और स्थानीय संसाधनों से राजस्व प्राप्त करने का अधिकार।

झारखंड की अर्थव्यवस्था में खनन राजस्व की अहम भूमिका

झारखंड देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य की अर्थव्यवस्था में खनन और खनिज आधारित गतिविधियों का महत्वपूर्ण स्थान है। राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में बताया गया कि 2024-25 में खनन राजस्व राज्य की अपनी गैर-कर प्राप्तियों का लगभग 84.9 प्रतिशत था।

यही कारण है कि खनिज सेस को लेकर होने वाला बदलाव राज्य के लिए केवल एक कानूनी विषय नहीं बल्कि वित्तीय नीति से भी जुड़ा हुआ है।

राज्य सरकार का कहना है कि यदि खनिजों से मिलने वाले अतिरिक्त राजस्व पर रोक लगती है, तो उसके विकास और सामाजिक योजनाओं के लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों पर असर पड़ सकता है। हालांकि इस संभावित प्रभाव की वास्तविक मात्रा भविष्य में राजस्व संग्रह और केंद्रीय कानून के क्रियान्वयन के आधार पर स्पष्ट होगी।

केंद्र का पक्ष क्या है?

केंद्रीय संशोधन के उद्देश्य को समझना भी जरूरी है। विधेयक की आधिकारिक नीति पृष्ठभूमि और PRS के विश्लेषण के अनुसार, केंद्र सरकार ने खनन क्षेत्र में अलग-अलग राज्यों द्वारा लगाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के करों और लेवी से पैदा होने वाली लागत, अनिश्चितता और असमानता को दूर करने की जरूरत बताई है।

केंद्र की व्यवस्था के तहत खनिज क्षेत्र में एक समान नियामक ढांचा बनाए रखने और खनन गतिविधियों को अधिक पूर्वानुमानित बनाने का उद्देश्य बताया गया है।

इसलिए प्रस्तावित कानूनी लड़ाई में केवल राजस्व का सवाल नहीं होगा, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि केंद्र और राज्यों के संवैधानिक अधिकारों के बीच सही सीमा क्या है।

अब आगे क्या होगा?

झारखंड सरकार के सामने अगला प्रमुख कदम सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करना होगा। याचिका में 2026 के संशोधन के उन प्रावधानों को चुनौती दी जा सकती है, जिन्हें राज्य अपनी संवैधानिक शक्तियों को प्रभावित करने वाला मानता है।

सुप्रीम कोर्ट में मामला आने के बाद अदालत पहले याचिका की सुनवाई और उसके आधारों पर विचार करेगी। आगे चलकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा जा सकता है और दोनों पक्ष अपने-अपने संवैधानिक तथा कानूनी तर्क रख सकते हैं।

इस प्रक्रिया में 2024 के संविधान पीठ के फैसले का भी महत्वपूर्ण संदर्भ रहेगा। 2026 के संशोधन में किए गए बदलाव और 2024 के फैसले के बीच कानूनी संबंध पर अदालत की व्याख्या इस विवाद की दिशा तय करने वाले प्रमुख पहलुओं में से एक हो सकती है।

₹14 हजार करोड़ से आगे बड़ा मुद्दा वित्तीय अधिकार का

झारखंड सरकार की ओर से बताए गए करीब 14 हजार करोड़ रुपये के संभावित राजस्व प्रभाव ने इस विवाद को आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बना दिया है। लेकिन कानूनी विवाद केवल इस राशि तक सीमित नहीं है।

असल सवाल यह है कि खनिज संपदा वाले राज्यों को अपने क्षेत्र में मौजूद खनिज संसाधनों से किस सीमा तक अतिरिक्त राजस्व प्राप्त करने का अधिकार है और संसद उस अधिकार पर किस सीमा तक प्रतिबंध लगा सकती है।

2024 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों की खनिज कराधान क्षमता को लेकर महत्वपूर्ण व्याख्या दी थी। अब 2026 के केंद्रीय संशोधन के बाद उसी क्षेत्र में एक नया कानूनी ढांचा सामने आया है।

झारखंड सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना इसी संवैधानिक और वित्तीय विवाद का अगला चरण होगा।

निष्कर्ष

खनिज सेस और MMDR संशोधन को लेकर झारखंड और केंद्र के बीच विवाद अब न्यायिक स्तर तक पहुंचने की दिशा में है। राज्य सरकार ने संशोधित कानून को चुनौती देने का फैसला किया है और मुख्यमंत्री की मंजूरी के बाद कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। वित्त मंत्री के अनुसार, राज्य को खनिज सेस से लगभग 14 हजार करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का नुकसान हो सकता है। वहीं केंद्र के संशोधन का उद्देश्य राज्यों की अलग-अलग लेवी से पैदा होने वाली अनिश्चितता और अतिरिक्त लागत को सीमित करना बताया गया है।

आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह महत्वपूर्ण प्रश्न होगा कि 2026 के संशोधन के प्रावधान 2024 के संविधान पीठ के फैसले और संविधान में केंद्र-राज्य के बीच निर्धारित शक्तियों के साथ किस तरह मेल खाते हैं। इस पर अदालत का निर्णय खनिज संपदा वाले राज्यों की वित्तीय शक्तियों और केंद्र-राज्य संबंधों के लिए व्यापक महत्व रख सकता है।

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