Drowning Prevention: डूबने से होने वाली मौतें रोकी जा सकती हैं- शशि प्रकाश झाDrowning Prevention: डूबने से होने वाली मौतें रोकी जा सकती हैं- शशि प्रकाश झा

डूबने से मौतों को रोकने के लिए पहला राज्यस्तरीय सम्मेलन आज होटल बीएनआर चाणक्या में संपन्न

रांची। जिंदगी जिंदाबाद

Drowning Prevention: झारखंड में नदियों, तालाबों, झरनों, खानों के गड्ढों और पर्यटन स्थलों में डूबने से होने वाली अप्राकृतिक मौतों को लेकर एक गंभीर और स्थायी समाधान की दिशा में पहला राज्यस्तरीय कदम उठाया गया है। आज बुधवार को होटल चाणक्या बीएनआर में नेशनल हेल्थ मिशन झारखंड और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली गैर सरकारी संस्था सिनी द्वारा वैश्विक सहयोगियों जैसे आरएनएलआई के तकनीकी सहयोग से स्टेट लेवल कंसल्टेशन ऑन ड्राउनिंग प्रिवेंशन कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस उच्चस्तरीय परामर्श सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य राज्य में डूबने की घटनाओं को रोकने के लिए तैयारी, जोखिम प्रबंधन और विभिन्न सरकारी विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना था।

इस कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग, आपदा प्रबंधन, वन एवं पर्यावरण, शिक्षा और पंचायती राज विभाग के प्रतिनिधियों के साथ-साथ यूनिसेफ, जेएसएलपीएस, पिरामल फाउंडेशन और सीआईएनआई समेत दर्जनों गैर-सरकारी व विकास संगठनों के प्रतिनिधियों ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई। बैठक के दौरान राज्य में जल दुर्घटनाओं से निपटने के लिए एक विस्तृत रणनीति तथा 90-दिवसीय कार्य योजना (90-डे प्लान) तैयार करने पर सहमति जताई गई।


समीक्षा के दौरान पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार मई से जुलाई 2025 के बीच राज्य में डूबने से 161 लोगों की जान गई है, जो प्रतिदिन औसतन दो मौतों को दर्शाता है। इस गंभीर स्थिति पर चिंता जताते हुए विशेषज्ञों और अधिकारियों ने कहा कि दुर्घटना के बाद राहत कार्य चलाने से बेहतर है कि दुर्घटना होने ही न दी जाए। इसके लिए जोखिम वाले हॉटस्पॉट्स को चिन्हित करने, जल स्रोतों को बैरियर लगाकर सुरक्षित बनाने, प्राथमिक बचाव उपकरण तैनात करने और समुदाय को जागरूक करने की जरूरत है।


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अभियान निदेशक श्री शशि प्रकाश झा ने कहा कि डूबने से होने वाली मौतें पूरी तरह से रोकी जा सकती हैं। इसके लिए खास कर स्कूल और कॉलेज के छात्रों के बीच व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। उन्होंने उच्च जोखिम वाले स्नान घाटों और झरनों पर स्थायी सुरक्षा रस्सियां व बैरियर नेट लगाने का सुझाव दिया, ताकि डूबते व्यक्ति को सहारा मिल सके।


त्वरित राहत, बचाव और अस्पतालों की मैपिंग पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि हादसे के बाद पहली प्राथमिकता त्वरित प्राथमिक उपचार होनी चाहिए, ताकि घबराहट की स्थिति न बने। इसके लिए सीपीआर देने और मरीज को ऑक्सीजन का प्रवाह बनाए रखने के बाद तुरंत अस्पताल ले जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। एंबुलेंस कहां उपलब्ध होगी, इसके साथ ही स्वास्थ्य हेल्पलाइन नंबर 104, 108 और हेल्थ नंबरों का व्यापक प्रसार-प्रचार और मैसेजिंग होना बेहद जरूरी है।


Drowning Prevention: ईको-टूरिज्म और पंचायतों का प्रशिक्षण अनिवार्य: अबु बकर सिद्दीकी पी

वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के सचिव श्री अबु बकर सिद्दीकी पी ने पर्यावरणीय और नीतिगत दृष्टिकोण साझा करते हुए कहा कि झारखंड में ईको-टूरिज्म बढ़ रहा है, ऐसे में पर्यटन से जुड़ी पंचायतों को विशेष ट्रेनिंग देने की सख्त जरूरत है। वन, पर्यावरण और जल निकायों के संरक्षण के साथ-साथ आपदा प्रबंधन की भूमिका तय करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि हर जगह पुलिस की तैनाती संभव नहीं है, इसलिए सामुदायिक भागीदारी और प्रत्येक विभाग की जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि अनजान जलस्रोतों और पर्यटन स्थलों के पास चेतावनी बोर्ड, नो-स्विमिंग जोन और सुरक्षा मानकों को कड़ाई से लागू और स्पष्ट रूप से तय किया जाए।


कार्यशाला में आपदा प्रबंधन विभाग के संयुक्त सचिव श्री राकेश कुमार ने भी विशेष रूप से शिरकत की। उन्होंने डूबने से होने वाली मौतों को आपदा प्रबंधन के दायरे में एकीकृत करते हुए अंतर-विभागीय समन्वय और त्वरित आपदा राहत व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया।
वहीं स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ प्रभात कुमार ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा व्यवस्था ‘ग्राउंड जीरो’ से ही शुरू करनी होगी, क्योंकि दुर्घटना के बाद केवल अस्पताल पर निर्भर रहना बहुत देर हो जाने जैसा है।


इस सम्मेलन में भारत सरकार, डब्ल्यूएचओ और ब्रिटेन की संस्था आरएनएलआई के विशेषज्ञों ने ऑनलाइन जुड़कर अपने तकनीकी अनुभव साझा किए।


कार्यक्रम में डॉ. प्रभात, डॉ. राहुल किशोर सिंह, डॉ कमलेश, डॉ. पुष्पा, डॉ. मुकेश मिश्रा, डॉ. विजय किशोर रजक, डॉ. जेशिना, सिनी झारखण्ड के एसपीएम राम राज सिंह आदि ने भी डूबने की घटनाओं को रोकने, जन-जागरूकता फैलाने और त्वरित चिकित्सीय सहायता पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे। इस अवसर पर मुख्य रूप से एनएचएम की राज्य कार्यक्रम प्रबंधक अनिमा किस्कू समेत स्वास्थ्य विभाग, आपदा प्रबंधन और एनएचएम के अन्य वरिष्ठ अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित रहे।


सम्मेलन के दौरान झारखंड स्टेट एक्शन फ्रेमवर्क फॉर ड्राउनिंग प्रिवेंशन’ तैयार करने का प्रस्ताव पास किया गया। इसके तहत एक बहु-विभागीय कार्य समूह का गठन किया जाएगा, जो राज्यभर में डूबने की घटनाओं की निगरानी, मौसम आधारित तैयारी, सामुदायिक प्रशिक्षण और सुरक्षा बैरियर लगाने जैसे कार्यों को जमीन पर उतारेगा। कार्यशाला के अंत में सभी हितधारकों ने मिलकर एक एकीकृत एसओपी जारी करने और पूरे राज्य में व्यापक जागरूकता अभियान चलाने का दृढ़ संकल्प लिया।

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