मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बनीं गंभीर चुनौती, झारखंड में समय पर इलाज और सामाजिक संवेदनशीलता की जरूरत
रांची, वरीय संवाददाता। मानसिक स्वास्थ्य आज के दौर की सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो गया है। बदलती जीवनशैली, काम का दबाव, आर्थिक परेशानियां, पारिवारिक तनाव, बेरोजगारी, सामाजिक अपेक्षाएं और अकेलापन लोगों की मानसिक सेहत को प्रभावित कर रहे हैं। मानसिक परेशानी से जूझ रहे लोगों की संख्या और इलाज की जरूरत को देखते हुए समय पर पहचान, उचित परामर्श और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता बेहद जरूरी हो गई है। इसके बावजूद समाज में मानसिक बीमारियों को लेकर फैली गलत धारणाएं और भेदभाव बड़ी बाधा बने हुए हैं। कई लोग अपनी परेशानी बताने से डरते हैं, जबकि कुछ लोग इलाज कराने के बजाय लंबे समय तक समस्या को छिपाते रहते हैं।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का महत्व
हर साल 10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। यह दिन मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने, मानसिक समस्याओं से प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा करने और इलाज की सुविधाओं को मजबूत बनाने का अवसर देता है। वर्ष 2026 की थीम लोगों के वास्तविक अनुभवों को सुनने और उन अनुभवों के आधार पर वास्तविक बदलाव लाने पर केंद्रित है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ चुके लोगों की आवाज को स्वास्थ्य सेवाओं और नीतियों के निर्माण में उचित स्थान देना इस संदेश का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सीआईपी में एक साल में 1.17 लाख से अधिक मरीज पहुंचे
रांची के कांके स्थित केंद्रीय मनश्चिकित्सा संस्थान (सीआईपी) के आंकड़ों से मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत का एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता है। संस्थान की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध वर्ष 2025 के अस्पताल संबंधी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी से दिसंबर 2025 तक बाह्य रोगी विभाग यानी ओपीडी में कुल 1,17,202 मरीजों की उपस्थिति दर्ज की गई। इसी अवधि में 4,418 मरीजों को अस्पताल में भर्ती किया गया। इसके अलावा आपातकालीन सेवाओं में 4,715 मामले दर्ज हुए।
ओपीडी में दर्ज उपस्थिति को अलग-अलग व्यक्तियों की कुल संख्या नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि एक मरीज कई बार परामर्श या इलाज के लिए अस्पताल आ सकता है। इसके बावजूद ये आंकड़े विशेष मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व को स्पष्ट करते हैं।
सीआईपी मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उपचार, प्रशिक्षण और शोध से जुड़ा प्रमुख संस्थान है। यहां मानसिक समस्याओं से प्रभावित मरीजों को विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। मरीजों की बड़ी संख्या यह भी बताती है कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए विशेष संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण है। साथ ही, सामान्य अस्पतालों, जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि मरीजों को समय पर सहायता मिल सके।
मानसिक बीमारी को समय पर पहचानना जरूरी
मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं हमेशा अचानक गंभीर रूप में सामने नहीं आतीं। कई बार इनके शुरुआती लक्षण सामान्य तनाव, चिड़चिड़ापन, थकान, नींद की परेशानी या काम में मन नहीं लगने जैसे दिखाई देते हैं। व्यक्ति इन्हें अस्थायी परेशानी समझकर नजरअंदाज कर सकता है।
लगातार उदासी, अत्यधिक चिंता, किसी काम में रुचि कम होना, नींद या भूख में बदलाव, सामाजिक संपर्क से दूरी बनाना, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और निराशा जैसे लक्षण मानसिक परेशानी के संकेत हो सकते हैं। हालांकि, केवल एक लक्षण के आधार पर किसी व्यक्ति को मानसिक बीमारी से ग्रस्त नहीं माना जा सकता। सही स्थिति का आकलन प्रशिक्षित चिकित्सक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ही कर सकता है।
मानसिक बीमारी को समय पर पहचानने से इलाज शुरू करने में मदद मिलती है। कई स्थितियों में मनोचिकित्सा, परामर्श, दवाओं या इनके संयोजन से व्यक्ति को राहत मिल सकती है। उपचार का तरीका व्यक्ति की समस्या, उसकी गंभीरता और चिकित्सकीय आकलन के अनुसार तय किया जाता है।
समाज में मानसिक बीमारी को लेकर अब भी भेदभाव
मानसिक स्वास्थ्य की राह में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक सामाजिक भेदभाव है। कई लोग मानसिक परेशानी को कमजोरी, इच्छाशक्ति की कमी या व्यक्ति के व्यवहार की समस्या मान लेते हैं। कुछ लोग यह भी समझते हैं कि मानसिक बीमारी का इलाज संभव नहीं है। ऐसी धारणाएं मरीज और उसके परिवार के लिए मुश्किलें पैदा करती हैं।
मानसिक बीमारी से प्रभावित व्यक्ति को ताने देना, उसका मजाक उड़ाना, उसे दूसरों से अलग रखना या उसकी समस्या को नाटक बताना स्थिति को और कठिन बना सकता है। ऐसे व्यवहार से व्यक्ति का आत्मविश्वास कम हो सकता है और वह अपने परिवार तथा समाज से दूरी बनाने लग सकता है।
यह समझना जरूरी है कि मानसिक बीमारी भी स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या है। जिस तरह शारीरिक बीमारी होने पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए, उसी तरह मानसिक परेशानी के लिए भी उसे शर्मिंदा करना उचित नहीं है। मानसिक बीमारी किसी व्यक्ति के चरित्र, क्षमता या नैतिकता का प्रमाण नहीं होती।
समाज को ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां लोग बिना डर अपनी समस्या साझा कर सकें। परिवार, मित्र, सहकर्मी और शिक्षक यदि संवेदनशील व्यवहार करें, तो मानसिक परेशानी से जूझ रहे व्यक्ति को समय पर मदद लेने का भरोसा मिल सकता है।
ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच चुनौती
झारखंड के ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच एक महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है। कई इलाकों में विशेषज्ञ चिकित्सकों, मनोवैज्ञानिकों और प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की उपलब्धता सीमित है। अस्पताल तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है। परिवहन का खर्च, कामकाज से छुट्टी लेने की परेशानी और इलाज से जुड़े खर्च भी बाधा बन सकते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की कमी भी समस्या को गंभीर बना सकती है। यदि परिवार के सदस्य मानसिक परेशानी के शुरुआती संकेतों को पहचान नहीं पाते, तो मरीज को समय पर चिकित्सा सहायता नहीं मिलती। कई बार बीमारी को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है और परिवार समस्या को दूसरों से छिपाने का प्रयास करता है।
कुछ परिस्थितियों में लोग मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ के पास जाने के बजाय केवल घरेलू उपायों या झाड़-फूंक पर निर्भर रहते हैं। पारंपरिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए भी यह समझना आवश्यक है कि गंभीर मानसिक परेशानी के लिए उचित चिकित्सकीय जांच और उपचार की जरूरत हो सकती है। यदि इन उपायों के कारण जरूरी इलाज में देरी होती है, तो मरीज की स्थिति बिगड़ सकती है।
इस चुनौती से निपटने के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी शुरुआती जांच तथा परामर्श की सुविधा बढ़ाई जा सकती है। स्वास्थ्यकर्मियों को सामान्य मानसिक समस्याओं के संकेत पहचानने और जरूरत पड़ने पर मरीज को विशेषज्ञ संस्थान तक भेजने का प्रशिक्षण देना उपयोगी होगा।
तनाव और पारिवारिक समस्याएं भी बन सकती हैं परेशानी की वजह
परिवार में विवाद, आर्थिक संकट, रोजगार की अनिश्चितता, परीक्षा का दबाव, नौकरी में प्रतिस्पर्धा, सामाजिक तुलना और भविष्य को लेकर चिंता व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं।
आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे परिवारों में तनाव का स्तर बढ़ सकता है। नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं को बार-बार असफलता मिलने पर निराशा महसूस हो सकती है। कामकाजी लोगों को लंबे समय तक काम करने, लक्ष्य पूरा करने और नौकरी सुरक्षित रखने का दबाव झेलना पड़ सकता है। विद्यार्थियों पर अच्छे अंक लाने और भविष्य में सफल होने का दबाव भी मानसिक परेशानी बढ़ा सकता है।
पारिवारिक संबंधों में संवाद की कमी स्थिति को और जटिल बना सकती है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी बात कोई नहीं सुनता या उसकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तो वह अपनी परेशानी दूसरों से साझा करना बंद कर सकता है।
तनाव का अनुभव करना अपने आप में मानसिक बीमारी का प्रमाण नहीं है। सामान्य तनाव जीवन का हिस्सा हो सकता है। लेकिन यदि तनाव लगातार बना रहे, व्यक्ति की नींद और दैनिक गतिविधियों पर असर पड़े या वह खुद को असहाय महसूस करने लगे, तो सहायता लेना उचित है।
युवाओं और विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान
युवा और विद्यार्थी पढ़ाई, प्रतियोगी परीक्षाओं, करियर, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की सफलता और जीवनशैली देखकर भी कुछ युवाओं में अपनी उपलब्धियों को लेकर असंतोष बढ़ सकता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों को असफलता का डर परेशान कर सकता है। कई विद्यार्थी परिवार की अपेक्षाओं के कारण अपनी कठिनाइयों के बारे में खुलकर बात नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि परीक्षा में खराब प्रदर्शन होने पर परिवार या समाज उन्हें असफल मान लेगा।
ऐसी स्थिति में शिक्षण संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। स्कूलों और कॉलेजों में परामर्श सेवाएं, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम और विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित संवाद का माहौल विकसित किया जाना चाहिए। शिक्षकों को विद्यार्थियों के व्यवहार में लंबे समय तक बने रहने वाले बदलावों को समझने और जरूरत पड़ने पर उन्हें उचित सहायता की ओर मार्गदर्शन करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है।
अभिभावकों को भी बच्चों की तुलना दूसरों से करने से बचना चाहिए। हर विद्यार्थी की क्षमता, परिस्थितियां और सीखने की गति अलग होती है। बच्चों को केवल अंकों और उपलब्धियों के आधार पर आंकने के बजाय उनके प्रयास, रुचियों और भावनात्मक जरूरतों को भी महत्व देना जरूरी है।
आत्महत्या के आंकड़े बढ़ती चिंता की ओर करते हैं इशारा
उपलब्ध अखबारी कटिंग में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 से 2024 के बीच झारखंड में 11,794 लोगों की आत्महत्या से मौत होने की बात कही गई है। इसी रिपोर्ट में वर्ष 2024 के दौरान 1,991 मामले दर्ज होने का उल्लेख है।
इन आंकड़ों का स्वतंत्र स्रोत और गणना की पद्धति कटिंग में स्पष्ट नहीं है। इसलिए प्रकाशन से पहले मूल सरकारी स्रोत की पुष्टि करना जरूरी है। आत्महत्या से जुड़ी घटनाओं के पीछे कई जटिल सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और मानसिक कारक हो सकते हैं। किसी एक कारण को सभी मामलों के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता।
आत्महत्या की रोकथाम के लिए मानसिक परेशानी के शुरुआती संकेतों को गंभीरता से लेना, सहायता की उपलब्धता बढ़ाना और सामाजिक भेदभाव कम करना महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति लगातार निराशा व्यक्त कर रहा हो, खुद को दूसरों पर बोझ समझ रहा हो, जीवन के प्रति उम्मीद खो रहा हो या स्वयं को नुकसान पहुंचाने की बात कर रहा हो, तो उसकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए।
ऐसी स्थिति में उसे अकेला छोड़ने के बजाय भरोसेमंद व्यक्ति और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेने में सहयोग करना जरूरी है। यदि तत्काल खतरा हो, तो आपातकालीन सहायता प्राप्त करनी चाहिए।
परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
मानसिक स्वास्थ्य की समस्या से जूझ रहे व्यक्ति के लिए परिवार का सहयोग काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। परिवार के सदस्य यदि उसकी बात ध्यान से सुनें और उसकी परेशानी को गंभीरता से लें, तो उसे अपनी स्थिति बताने में आसानी हो सकती है।
मरीज के व्यवहार में बदलाव आने पर उसे डांटने या दोष देने के बजाय यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि वह किन कठिनाइयों से गुजर रहा है। जरूरत पड़ने पर मनोचिकित्सक या प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने में मदद करनी चाहिए।
इलाज के दौरान मरीज को नियमित परामर्श, निर्धारित दवाओं और चिकित्सकीय निर्देशों का पालन करने में सहयोग की जरूरत पड़ सकती है। दवाओं को अपने स्तर पर बंद करना या उपचार में बदलाव करना उचित नहीं है। किसी परेशानी या दुष्प्रभाव की स्थिति में चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
परिवार को मरीज की गोपनीयता और गरिमा का भी ध्यान रखना चाहिए। उसकी बीमारी की जानकारी बिना जरूरत दूसरों के साथ साझा करना या उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करना उचित नहीं है। मरीज को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना और उसकी पसंद तथा जरूरतों का सम्मान करना बेहतर देखभाल का हिस्सा है।
कार्यस्थल पर भी जरूरी है मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल
मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियां केवल घर या शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं हैं। कार्यस्थलों पर लंबे समय तक काम, लगातार लक्ष्य, असुरक्षित रोजगार, कार्यस्थल पर भेदभाव और सहकर्मियों के साथ तनाव भी कर्मचारियों की मानसिक सेहत को प्रभावित कर सकते हैं।
किसी कर्मचारी के काम में अचानक गिरावट, लगातार अनुपस्थिति या व्यवहार में बदलाव के कई कारण हो सकते हैं। इसलिए बिना निष्कर्ष निकाले उससे संवेदनशीलता के साथ बातचीत करना उचित है।
संस्थानों को कर्मचारियों के लिए ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास करना चाहिए, जहां वे जरूरत पड़ने पर परामर्श ले सकें। काम और निजी जीवन के बीच संतुलन, उचित कार्यभार, सम्मानजनक व्यवहार और शिकायतों के समाधान की प्रभावी व्यवस्था तनाव कम करने में सहायक हो सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य के विषय पर कार्यस्थलों में जागरूकता बढ़ाने से यह धारणा कमजोर हो सकती है कि मानसिक परेशानी बताने से कर्मचारी की क्षमता या पेशेवर छवि पर सवाल उठेंगे।
इलाज और परामर्श को बनाना होगा अधिक सुलभ
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए केवल बड़े अस्पतालों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि प्राथमिक स्तर से लेकर विशेषज्ञ संस्थानों तक एक प्रभावी व्यवस्था विकसित की जाए।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में मानसिक स्वास्थ्य की शुरुआती जांच तथा परामर्श की सुविधाएं उपलब्ध कराने से मरीजों को समय पर सहायता मिल सकती है। जिला स्तर पर विशेषज्ञ सेवाओं को मजबूत करने और गंभीर मामलों के लिए रेफरल व्यवस्था बेहतर बनाने की जरूरत है।
स्वास्थ्यकर्मियों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी प्रशिक्षण देना, दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना और मरीजों को उपचार के दौरान निरंतर सहयोग देना भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही मरीजों और उनके परिवारों को बीमारी, उपचार तथा पुनर्वास के बारे में सही जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का आकलन केवल अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना आवश्यक है कि मरीजों को कितनी जल्दी सहायता मिल रही है, उपचार कितना सुलभ है, मरीजों के अधिकारों की रक्षा हो रही है या नहीं और उपचार के बाद उन्हें समाज में सामान्य जीवन जीने के लिए कितना सहयोग मिल रहा है।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 का संदेश
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस 2026 की थीम लोगों के वास्तविक अनुभवों को सुनने और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करने पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य उन लोगों की जरूरतों को समझना है, जिन्होंने मानसिक बीमारी और उसके इलाज से जुड़ी चुनौतियों का सामना किया है।
मरीजों को यह बताने का अवसर मिलना चाहिए कि इलाज प्राप्त करते समय उन्हें किन बाधाओं का सामना करना पड़ा, किस प्रकार के सहयोग से उन्हें लाभ हुआ और किन बदलावों से सेवाओं को अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।
इस दृष्टिकोण से मानसिक स्वास्थ्य व्यवस्था अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक बन सकती है। मरीजों के अनुभवों के आधार पर अस्पतालों में संवाद, गोपनीयता, परामर्श और उपचार की व्यवस्था में सुधार किया जा सकता है।
जागरूकता के साथ व्यवहार में बदलाव भी जरूरी
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस केवल एक दिन का आयोजन नहीं होना चाहिए। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों, चर्चाओं और जागरूकता अभियानों का उद्देश्य लोगों के व्यवहार में स्थायी बदलाव लाना होना चाहिए।
स्कूलों, कॉलेजों, कार्यालयों और समुदायों में मानसिक स्वास्थ्य पर नियमित बातचीत की व्यवस्था की जा सकती है। स्थानीय भाषाओं में जागरूकता सामग्री उपलब्ध कराकर लोगों को मानसिक बीमारी के शुरुआती संकेतों, इलाज की सुविधाओं और सहायता प्राप्त करने के तरीकों के बारे में बताया जा सकता है।
मीडिया की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। मानसिक बीमारी और आत्महत्या से जुड़ी घटनाओं की रिपोर्टिंग करते समय संवेदनशील भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए। सनसनीखेज प्रस्तुति से बचना और सहायता प्राप्त करने के विकल्पों की जानकारी देना अधिक उपयोगी हो सकता है।
पर्याप्त नींद, नियमित शारीरिक गतिविधि, संतुलित दिनचर्या, भरोसेमंद लोगों से बातचीत और तनाव को पहचानने की आदत मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहायक हो सकती है। हालांकि, गंभीर या लंबे समय से बनी मानसिक परेशानी में इन उपायों को पेशेवर उपचार का विकल्प नहीं समझना चाहिए।
निष्कर्ष: मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने की जरूरत
झारखंड में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत और सामाजिक जागरूकता की चुनौती दोनों पर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है। सीआईपी में वर्ष 2025 के दौरान ओपीडी में दर्ज 1,17,202 उपस्थिति और 4,418 मरीजों का भर्ती होना विशेष मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व को रेखांकित करता है। वहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित पहुंच, सामाजिक भेदभाव और समय पर इलाज नहीं मिलना बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
समाधान के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार, प्राथमिक स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, प्रशिक्षित कर्मियों की संख्या बढ़ाना और परिवारों तथा समुदायों को जागरूक करना जरूरी है। इसके साथ ही मरीजों की गरिमा, गोपनीयता और अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल केवल डॉक्टरों या अस्पतालों की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, समाज, शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों और सरकार की साझा भूमिका से ही बेहतर व्यवस्था विकसित हो सकती है।
विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस का संदेश स्पष्ट है—मानसिक परेशानी से जूझ रहे लोगों को चुप रहने के लिए मजबूर करने के बजाय उनकी बात सुननी होगी, उनकी जरूरतों को समझना होगा और समय पर सहायता उपलब्ध करानी होगी। मानसिक बीमारी के प्रति संवेदनशील व्यवहार और सुलभ उपचार ही एक ऐसे समाज की नींव बन सकते हैं, जहां लोग बिना डर और भेदभाव के मदद मांग सकें।