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रांची | स्वास्थ्य समाचार
मौसम में बदलाव के साथ लोगों की सेहत पर भी असर दिखाई देने लगा है। सुबह और शाम के समय तापमान में गिरावट तथा दिन में मौसम के अलग-अलग मिजाज के बीच सर्दी, खांसी, गले में खराश, छींक, बुखार और शरीर में दर्द जैसी शिकायतें बढ़ने की बात सामने आई है। रांची में सामान्य फ्लू के लक्षणों वाले मरीजों की संख्या बढ़ने से अस्पतालों के आउट पेशेंट डिपार्टमेंट यानी ओपीडी में भीड़ देखी जा रही है। अखबार की कटिंग के मुताबिक, सामान्य फ्लू से संबंधित मरीजों की संख्या में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और संबंधित ओपीडी में रोजाना करीब 250 मरीज पहुंच रहे थे। इनमें 70 से 75 मरीज सामान्य फ्लू के लक्षणों से प्रभावित बताए गए हैं।
मौसम में बदलाव के दौरान शरीर को तापमान के उतार-चढ़ाव के अनुकूल होने में समय लग सकता है। हालांकि, सर्दी-खांसी और बुखार के पीछे केवल मौसम ही कारण नहीं होता। वायरल संक्रमण, एलर्जी और दूसरे श्वसन संबंधी संक्रमण भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकते हैं। इसलिए लगातार खांसी, तेज बुखार, सांस लेने में परेशानी या कमजोरी होने पर लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में कई लोग खांसी, छींक, गले में खराश और बुखार की शिकायत लेकर डॉक्टरों से परामर्श ले रहे थे। कुछ मरीजों ने लगातार खांसी के कारण छाती में दर्द होने की भी शिकायत की। डॉक्टरों ने बदलते मौसम में सावधानी बरतने, शरीर को पर्याप्त गर्म रखने और बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा लेने से बचने की सलाह दी है।
मौसम में उतार-चढ़ाव के साथ क्यों बढ़ती हैं मौसमी बीमारियां?
मौसम बदलने पर तापमान, नमी और लोगों की दैनिक गतिविधियों में बदलाव आता है। सुबह और शाम ठंडक तथा दिन में अपेक्षाकृत गर्म वातावरण के कारण लोगों को कपड़ों और दिनचर्या में बदलाव करना पड़ता है। इस अवधि में कुछ लोगों को नाक बहने, छींक आने, गले में खराश या खांसी जैसी शिकायतें हो सकती हैं।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि केवल ठंडे या गर्म मौसम में रहने से ही फ्लू नहीं होता। इन्फ्लूएंजा और दूसरे श्वसन संक्रमण वायरस के कारण फैलते हैं। संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने के दौरान निकली बूंदों और कुछ परिस्थितियों में दूषित हाथों या सतहों के संपर्क से संक्रमण फैल सकता है। तापमान में बदलाव के दौरान लोगों के व्यवहार, बंद कमरों में रहने और संपर्क की परिस्थितियों में बदलाव भी संक्रमण के फैलाव को प्रभावित कर सकते हैं।
रांची में मौसमी बीमारियों के मरीज बढ़ने की खबर इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। जब कम समय में अधिक लोग एक जैसी शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचते हैं, तो डॉक्टरों के लिए मरीजों का परीक्षण करना और यह निर्धारित करना जरूरी होता है कि मामला सामान्य सर्दी-जुकाम, एलर्जी, फ्लू या किसी अन्य संक्रमण से संबंधित है।
ओपीडी में रोजाना 250 मरीज आने का उल्लेख
अखबार की कटिंग में बताया गया है कि संबंधित ओपीडी में प्रतिदिन औसतन 250 मरीज पहुंचते थे। इनमें लगभग 70 से 75 मरीज सामान्य फ्लू के लक्षणों वाले बताए गए हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुल ओपीडी मरीजों में सामान्य फ्लू से संबंधित मामलों की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत थी।
ओपीडी अस्पताल का वह विभाग होता है, जहां मरीज बिना भर्ती हुए डॉक्टर से परामर्श लेते हैं। सर्दी, खांसी, बुखार, सिरदर्द, गले में खराश और सामान्य कमजोरी जैसी शिकायतों वाले बहुत से मरीज पहले ओपीडी में ही जांच कराने पहुंचते हैं।
जब मौसमी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ती है, तो पंजीकरण काउंटर, डॉक्टरों के कमरे और दवा वितरण केंद्रों पर भीड़ बढ़ सकती है। मरीजों को अपनी बारी के लिए इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसे समय में अस्पताल प्रबंधन के लिए मरीजों को व्यवस्थित तरीके से परामर्श उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होता है।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि कटिंग में दिए गए मरीजों की संख्या एक विशेष रिपोर्ट और समयावधि से संबंधित है। इसे रांची के सभी अस्पतालों या वर्तमान समय के मरीजों की कुल संख्या नहीं माना जाना चाहिए। अलग-अलग अस्पतालों में मरीजों की संख्या और संक्रमण के मामलों में अंतर हो सकता है।
सर्दी, खांसी और बुखार को हल्के में लेना पड़ सकता है भारी
मौसम बदलने पर सर्दी-जुकाम होना आम बात हो सकती है, लेकिन हर मरीज में लक्षणों की गंभीरता एक जैसी नहीं होती। कुछ लोगों में नाक बहना, छींक और हल्की खांसी कुछ दिनों में ठीक हो सकती है, जबकि कुछ लोगों को बुखार, शरीर में दर्द, अत्यधिक थकान या लगातार खांसी की शिकायत हो सकती है।
कई बार लोग शुरुआत में लक्षणों को सामान्य समझकर कामकाज जारी रखते हैं। यदि खांसी और बुखार लंबे समय तक बने रहें या हालत बिगड़ने लगे, तो चिकित्सकीय जांच जरूरी हो सकती है। लक्षणों के आधार पर स्वयं यह तय नहीं किया जा सकता कि संक्रमण सामान्य है या किसी गंभीर बीमारी से जुड़ा है।
खांसी के साथ छाती में दर्द होने पर भी सावधानी जरूरी है। लगातार खांसने से छाती की मांसपेशियों में दर्द हो सकता है, लेकिन हर स्थिति में यही कारण हो, यह जरूरी नहीं। यदि छाती में तेज दर्द, सांस फूलना, सीने में दबाव या अन्य गंभीर लक्षण हों, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।
इसी तरह तेज या लगातार बुखार, असामान्य सुस्ती, पानी की कमी, भ्रम या तेजी से बिगड़ती तबीयत को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों में विशेष सावधानी जरूरी है।
बच्चों और बुजुर्गों में संक्रमण का खतरा
बच्चों और बुजुर्गों को मौसमी संक्रमण के दौरान विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। छोटे बच्चों में बीमारी के लक्षणों को स्पष्ट रूप से समझना कभी-कभी कठिन हो सकता है। बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है, भोजन या पानी कम ले सकता है अथवा सामान्य से अधिक सुस्त दिखाई दे सकता है।
अभिभावकों को बच्चे के व्यवहार, तापमान, सांस लेने की स्थिति और पानी पीने पर ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा लगातार पानी नहीं पी पा रहा है, सांस लेने में परेशानी है, अत्यधिक सुस्ती है या हालत तेजी से बिगड़ रही है, तो तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।
बुजुर्गों में भी संक्रमण का असर अधिक गंभीर हो सकता है, विशेषकर तब जब उन्हें पहले से हृदय रोग, फेफड़ों की बीमारी, मधुमेह या दूसरी पुरानी स्वास्थ्य समस्याएं हों। ऐसे मरीजों में संक्रमण के लक्षण कभी-कभी सामान्य से अलग भी दिखाई दे सकते हैं। इसलिए लक्षण शुरू होने पर चिकित्सक से सलाह लेने में देरी नहीं करनी चाहिए।
घर में किसी एक सदस्य को खांसी, बुखार या फ्लू जैसे लक्षण हों, तो दूसरे सदस्यों तक संक्रमण पहुंचने का खतरा कम करने के लिए सावधानियां अपनानी चाहिए। खांसते या छींकते समय मुंह और नाक ढकना, हाथ साफ रखना, कमरे में हवा का उचित आवागमन बनाए रखना और बीमारी की स्थिति में निकट संपर्क कम करना उपयोगी कदम हैं।
बच्चों को ठंड से बचाने के साथ साफ-सफाई भी जरूरी
अभिभावकों को मौसम के अनुसार बच्चों के कपड़ों का ध्यान रखना चाहिए। सुबह और शाम ठंडक होने पर जरूरत के मुताबिक गर्म कपड़े पहनाना उपयोगी हो सकता है। हालांकि, बच्चों को जरूरत से ज्यादा कपड़े पहनाकर असहज करना भी ठीक नहीं है। कपड़ों का चयन तापमान और बच्चे की सुविधा के अनुसार होना चाहिए।
इसके साथ ही हाथों की सफाई, पर्याप्त पानी पीना, संतुलित भोजन और पर्याप्त नींद का ध्यान रखना चाहिए। बच्चों को खांसते या छींकते समय मुंह और नाक ढकने की आदत सिखाना भी उपयोगी है।
मौसमी बीमारी से बचने के नाम पर बच्चों को सभी ठंडी चीजों से पूरी तरह दूर रखने की आवश्यकता हर स्थिति में नहीं होती। खानपान का निर्णय बच्चे की उम्र, स्वास्थ्य और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार होना चाहिए। मुख्य उद्देश्य साफ-सुथरा भोजन, पर्याप्त पोषण और संक्रमण से बचाव की आदतों को बढ़ावा देना है।
यदि बच्चे को बुखार, लगातार खांसी या सांस लेने में परेशानी हो, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। डॉक्टर की सलाह के अनुसार जांच और उपचार कराना बेहतर है।
डॉक्टरों की सलाह: बिना परामर्श दवा लेने से बचें
सर्दी, खांसी और बुखार होने पर कुछ लोग स्वयं दवा खरीदकर लेने लगते हैं। कभी-कभी वे पहले इस्तेमाल की गई दवा दोबारा ले लेते हैं या किसी परिचित की सलाह पर उपचार शुरू कर देते हैं। यह तरीका हर मरीज के लिए सुरक्षित नहीं होता।
सर्दी-जुकाम और फ्लू जैसे लक्षणों के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। सही उपचार मरीज की उम्र, लक्षणों की अवधि, दूसरी बीमारियों और चिकित्सकीय जांच पर निर्भर करता है। इसलिए दवा का चुनाव डॉक्टर की सलाह के अनुसार करना चाहिए।
विशेष रूप से एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग बिना चिकित्सकीय सलाह के नहीं करना चाहिए। एंटीबायोटिक बैक्टीरिया से होने वाले कुछ संक्रमणों के उपचार में उपयोगी होती हैं, लेकिन वे सामान्य वायरल सर्दी या फ्लू को ठीक नहीं करतीं। अनावश्यक उपयोग से एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी समस्या बढ़ सकती है।
बुखार कम करने वाली दवाओं का उपयोग भी उम्र, स्वास्थ्य और उचित खुराक के अनुसार होना चाहिए। बच्चों को वयस्कों की दवा या खुराक अपने आप देना खतरनाक हो सकता है। किसी भी दवा के इस्तेमाल से पहले डॉक्टर या योग्य फार्मासिस्ट से उचित जानकारी लेना बेहतर है।
खांसी लंबे समय तक रहे तो क्या करें?
कई बार बुखार या नाक बहने जैसे लक्षण कम होने के बाद भी खांसी कुछ समय तक बनी रह सकती है। इसकी वजह संक्रमण के बाद श्वसन मार्ग में बची संवेदनशीलता सहित कई कारण हो सकते हैं। लेकिन लगातार बनी रहने वाली या बढ़ती खांसी का मूल्यांकन जरूरी हो सकता है।
यदि खांसी के साथ सांस फूलना, खून आना, तेज बुखार, सीने में दर्द या अत्यधिक कमजोरी हो, तो शीघ्र चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए। जिन लोगों को अस्थमा या फेफड़ों की पुरानी बीमारी है, उन्हें लक्षण बढ़ने पर विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
संक्रमण के दौरान दूसरों तक बीमारी फैलने की आशंका कम करने के लिए खांसते समय टिश्यू या कोहनी से मुंह ढकें, इस्तेमाल किए गए टिश्यू को सुरक्षित तरीके से फेंकें और हाथ साफ रखें। बुखार या अस्वस्थता के दौरान आराम करना और जरूरत के अनुसार कामकाज से विराम लेना भी उपयोगी हो सकता है।
यदि मरीज को घर पर आराम करने की सलाह दी गई है, तो उसे डॉक्टर के निर्देशों का पालन करना चाहिए। बीमारी की अवधि और ठीक होने में लगने वाला समय व्यक्ति और संक्रमण के प्रकार के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
फ्लू, सामान्य सर्दी और एलर्जी में अंतर समझना जरूरी
सामान्य सर्दी, इन्फ्लूएंजा और एलर्जी के कुछ लक्षण एक जैसे हो सकते हैं। नाक बहना, छींक और खांसी तीनों स्थितियों में दिखाई दे सकते हैं। इसलिए केवल लक्षण देखकर निश्चित रूप से बीमारी का नाम बताना सही नहीं है।
सामान्य सर्दी में नाक बहना, छींक और गले में खराश जैसे लक्षण हो सकते हैं। इन्फ्लूएंजा में अचानक बुखार, शरीर में दर्द, थकान और खांसी जैसी शिकायतें हो सकती हैं। एलर्जी में बार-बार छींक आना, नाक या आंखों में खुजली और पानी बहने जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं। लेकिन ये केवल सामान्य संकेत हैं; हर व्यक्ति में लक्षण अलग हो सकते हैं।
यदि मरीज को तेज बुखार, सांस लेने में कठिनाई या लगातार बिगड़ते लक्षण हों, तो इसे केवल एलर्जी या सामान्य सर्दी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। डॉक्टर जरूरत के अनुसार जांच की सलाह दे सकते हैं।
इसी तरह सामान्य फ्लू के लक्षण और H1N1 जैसे इन्फ्लूएंजा संक्रमण के लक्षणों में समानता हो सकती है। किसी खास संक्रमण की पुष्टि के लिए चिकित्सकीय मूल्यांकन और आवश्यकतानुसार परीक्षण की जरूरत होती है।
अगस्त 2026 में झारखंड में H1N1 के मामले भी आए सामने
मौसमी फ्लू जैसे लक्षणों को लेकर सावधानी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अगस्त 2026 में झारखंड के अस्पतालों में इन्फ्लूएंजा से संबंधित मामलों की रिपोर्ट सामने आई थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की 26 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) में उस महीने H1N1 के छह मामलों की पुष्टि हुई थी। अस्पतालों ने अलग-अलग आयु वर्ग के मरीजों में फ्लू जैसे लक्षणों में बढ़ोतरी भी दर्ज की थी। https://timesofindia.indiatimes.com/city/ranchi/six-h1n1-cases-detected-at-rims-as-hospitals-report-surge-in-patients-with-flu-symptoms/amp_articleshow/133542322.cms
29 अगस्त 2026 की एक अन्य रिपोर्ट में झारखंड में मौसमी इन्फ्लूएंजा की निगरानी बढ़ाने, अस्पतालों में आइसोलेशन बेड तैयार रखने और संदिग्ध मरीजों की जांच पर जोर दिए जाने का उल्लेख था। https://timesofindia.indiatimes.com/city/ranchi/surveillance-stepped-up-as-8-samples-test-positive-for-influenza-in-aug/articleshow/133612105.cms
इन रिपोर्टों से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि अखबार की कटिंग में बताए गए सभी मरीज H1N1 से संक्रमित थे। सामान्य फ्लू जैसे लक्षण कई बीमारियों में हो सकते हैं और किसी विशेष संक्रमण की पुष्टि जांच से ही की जा सकती है।
मौसमी संक्रमण के समय अस्पतालों की भूमिका संदिग्ध मरीजों की पहचान, आवश्यक जांच, उचित उपचार और गंभीर मरीजों को सही जगह रेफर करने में महत्वपूर्ण होती है। लोगों को भी लक्षणों के बारे में सही जानकारी रखनी चाहिए और बिना प्रमाण किसी बीमारी को लेकर घबराहट नहीं फैलानी चाहिए।
घर पर देखभाल के दौरान किन बातों का ध्यान रखें?
हल्के लक्षण वाले मरीजों को उनकी स्थिति के अनुसार डॉक्टर घर पर आराम करने की सलाह दे सकते हैं। ऐसे में पर्याप्त आराम करना, पानी और अन्य उपयुक्त तरल पदार्थ लेना तथा संतुलित भोजन करना मददगार हो सकता है। लेकिन मरीज की उम्र, पहले से मौजूद बीमारियों और लक्षणों की गंभीरता के अनुसार सलाह अलग हो सकती है।
कमरे में पर्याप्त हवा आने-जाने की व्यवस्था रखें। यदि घर में कोई व्यक्ति बीमार है, तो संभव हो तो निकट संपर्क कम करें और साझा जगहों की सफाई का ध्यान रखें। खांसते या छींकते समय मुंह और नाक ढकना तथा हाथों को साबुन-पानी से धोना संक्रमण फैलने की आशंका कम करने में मदद कर सकता है।
दूसरों के साथ गिलास, तौलिया या व्यक्तिगत उपयोग की चीजें साझा करने से बचना बेहतर है। बीमारी के दौरान भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से बचें, खासकर यदि बुखार या लगातार खांसी हो। बाहर जाना आवश्यक हो, तो मास्क और स्वच्छता संबंधी सावधानियां अपनाएं।
यदि लक्षण बढ़ें, सांस लेने में कठिनाई हो, मरीज असामान्य रूप से सुस्त हो या पानी की कमी के संकेत दिखें, तो चिकित्सा सहायता लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। गंभीर लक्षणों में घरेलू उपचार को अस्पताल जाने का विकल्प नहीं मानना चाहिए।
स्वास्थ्य संस्थानों की तैयारी भी महत्वपूर्ण
मौसमी बीमारियों के मरीज बढ़ने पर अस्पतालों में केवल डॉक्टरों की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि पंजीकरण, जांच, दवा वितरण और मरीजों को उचित विभाग तक पहुंचाने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होती है।
यदि ओपीडी में सामान्य फ्लू जैसे लक्षणों वाले मरीज अधिक संख्या में पहुंच रहे हों, तो मरीजों की शुरुआती जांच और लक्षणों के आधार पर प्राथमिकता तय करने से व्यवस्था बेहतर हो सकती है। गंभीर लक्षण वाले मरीजों की पहचान समय पर करना जरूरी है, ताकि उन्हें आवश्यक उपचार मिल सके।
अस्पतालों को संक्रमण नियंत्रण के उपायों, हाथों की सफाई, आवश्यक मास्क और अन्य चिकित्सा सामग्री की उपलब्धता पर ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्यकर्मियों को भी संक्रमण से बचाव के निर्धारित नियमों का पालन करना चाहिए।
अगस्त 2026 में झारखंड में इन्फ्लूएंजा की निगरानी को लेकर सामने आई रिपोर्टों में अस्पतालों की तैयारियों और संदिग्ध मरीजों की स्क्रीनिंग पर जोर दिया गया था। यह दिखाता है कि सामान्य श्वसन लक्षणों के बढ़ने पर स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी और तैयारी महत्वपूर्ण रहती है।
बदलते मौसम में दिनचर्या कैसे रखें?
मौसम में उतार-चढ़ाव के दौरान अपनी दिनचर्या में कुछ व्यावहारिक बदलाव किए जा सकते हैं। सुबह और शाम बाहर निकलते समय तापमान के अनुसार कपड़े पहनें। पर्याप्त नींद लें और नियमित रूप से संतुलित भोजन करें। पानी पीने की आदत बनाए रखें और अपने आसपास साफ-सफाई का ध्यान रखें।
व्यायाम या बाहरी गतिविधियों के दौरान अपनी सेहत और मौसम की स्थिति का ध्यान रखना चाहिए। यदि बुखार या शरीर में दर्द हो, तो भारी शारीरिक गतिविधियों से बचकर आराम करें और जरूरत के अनुसार डॉक्टर से सलाह लें।
एलर्जी से परेशान लोगों को उन चीजों से बचने की कोशिश करनी चाहिए, जिनसे उनके लक्षण बढ़ते हैं। हालांकि, बार-बार छींक, खांसी या सांस की समस्या होने पर सही कारण जानने के लिए चिकित्सकीय सलाह जरूरी है।
बुजुर्गों और पुरानी बीमारी वाले लोगों को अपनी नियमित दवाएं डॉक्टर के निर्देशानुसार लेनी चाहिए। संक्रमण के लक्षण दिखाई देने पर यह न मानें कि बीमारी अपने आप ठीक हो जाएगी। समय पर सलाह लेने से जरूरत के अनुसार उचित उपचार मिल सकता है।
निष्कर्ष: सावधानी बरतें, लक्षणों को नजरअंदाज न करें
रांची में मौसम बदलने के साथ सामान्य फ्लू के मरीजों की संख्या बढ़ने संबंधी अखबार की रिपोर्ट लोगों को अपनी सेहत के प्रति सतर्क रहने का संदेश देती है। कटिंग के अनुसार, संबंधित ओपीडी में रोजाना करीब 250 मरीज पहुंच रहे थे, जिनमें 70 से 75 मरीज सामान्य फ्लू जैसे लक्षणों वाले बताए गए थे। रिपोर्ट में कुल मरीजों की तुलना में ऐसे मामलों में लगभग 30 प्रतिशत बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है।
सर्दी, खांसी, छींक और बुखार सामान्य मौसमी शिकायतें हो सकती हैं, लेकिन हर मरीज की स्थिति अलग होती है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पुरानी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। बिना चिकित्सकीय सलाह के एंटीबायोटिक या अन्य दवाएं लेने से बचना चाहिए।
यदि बुखार लगातार बना रहे, खांसी बढ़ती जाए, छाती में दर्द हो या सांस लेने में कठिनाई आए, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है। गंभीर लक्षणों की स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता लें।
मौसम में बदलाव को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन स्वच्छता, उचित आराम, संतुलित भोजन, संक्रमण से बचाव की आदतों और समय पर चिकित्सकीय सलाह के माध्यम से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है। सबसे जरूरी है कि लोग अफवाहों से बचें, बीमारी के लक्षणों को समझें और जरूरत पड़ने पर सही चिकित्सा सहायता लें।