#NPU #NPUNews #NilamberPitamberUniversity #JharkhandNews #PalamuNews #Medininagar #DineshKumarSingh #NafisAhmad #MrityunjayKumar #JharkhandUniversity #UniversityNews #JharkhandLatestNews

मेदिनीनगर। नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय (NPU) में बुधवार को उस समय प्रशासनिक स्थिति अचानक बदल गई, जब राज्यपाल सह कुलाधिपति की ओर से कुलपति डॉ. दिनेश कुमार सिंह के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों पर अगले आदेश तक रोक लगाए जाने के कुछ ही घंटे बाद विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार को बदलने का आदेश जारी कर दिया गया। राजभवन की ओर से कुलपति के अधिकार सीमित किए जाने के बाद करीब पांच घंटे के भीतर कुलपति ने रजिस्ट्रार डॉ. नफीस अहमद को पद से विरमित करते हुए डॉ. मृत्युंजय कुमार को नया रजिस्ट्रार नियुक्त कर दिया। इस घटनाक्रम के बाद नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में प्रशासनिक अधिकारों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।

राज्यपाल सह कुलाधिपति संतोष कुमार गंगवार की ओर से कुलपति के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों पर रोक लगाए जाने की कार्रवाई विश्वविद्यालय में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ी शिकायतों और विशेष ऑडिट में दर्ज आपत्तियों के बाद हुई है। राजभवन की ओर से जारी निर्देश के अनुसार कुलपति के अधिकारों को सीमित किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार उन्हें सामान्य या रूटीन कार्यों तक सीमित रहने तथा विशेष प्रशासनिक अथवा वित्तीय निर्णय के लिए आवश्यक अनुमति लेने की स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि राजभवन से कुलपति के अधिकारों पर रोक की सूचना मिलने के कुछ ही घंटे बाद रजिस्ट्रार को बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। रजिस्ट्रार डॉ. नफीस अहमद के अनुसार उन्हें राजभवन से संबंधित पत्र की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने पत्र कुलपति को दिखाया था। इसके बाद बुधवार की रात करीब नौ बजे उन्हें पद से विरमित करने का पत्र जारी किया गया और डॉ. मृत्युंजय कुमार को नया रजिस्ट्रार नियुक्त कर दिया गया।

डॉ. नफीस अहमद ने इस कार्रवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि जब राजभवन ने कुलपति के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों पर रोक लगा दी थी, तो उसके बाद कुलपति द्वारा रजिस्ट्रार को पद से विरमित करने और नए रजिस्ट्रार की नियुक्ति का आदेश किस अधिकार के तहत जारी किया गया, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए। उन्होंने इस मामले में राजभवन से मार्गदर्शन लेने और संबंधित मामले को विश्वविद्यालय के सिंडिकेट के सामने रखने की बात कही है।

राजभवन के आदेश के बाद बढ़ा विवाद

नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार बदलने का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि रजिस्ट्रार की नियुक्ति और पदमुक्ति से संबंधित प्रक्रिया पहले से ही विवाद के केंद्र में है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार डॉ. नफीस अहमद की नियुक्ति जेपीएससी के माध्यम से रजिस्ट्रार के पद पर हुई थी। उन्होंने अगस्त में अपने पद से इस्तीफा देने की बात कही थी, लेकिन उनके अनुसार उच्च शिक्षा विभाग की ओर से उनके इस्तीफे को स्वीकार किए जाने की स्थिति स्पष्ट नहीं थी।

रिपोर्ट के अनुसार 12 अगस्त को विश्वविद्यालय की सिंडिकेट बैठक में भी उनके इस्तीफे का मामला रखा गया था। हालांकि उस समय उनके इस्तीफे को स्वीकार करने के संबंध में अंतिम निर्णय नहीं हो सका और उन्हें अगले आदेश तक रजिस्ट्रार के रूप में काम करते रहने की स्थिति में रखा गया था। इसके बाद बुधवार को अचानक उन्हें पद से विरमित करने और नए रजिस्ट्रार की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया गया। यही कारण है कि अब विश्वविद्यालय में इस फैसले की वैधानिक प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

दूसरी ओर विश्वविद्यालय की ओर से डॉ. मृत्युंजय कुमार को रजिस्ट्रार का प्रभार देने की प्रक्रिया शुरू की गई। रिपोर्टों के मुताबिक डॉ. मृत्युंजय कुमार पहले विश्वविद्यालय में प्रॉक्टर के रूप में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। बाद में उन्हें प्रभारी रजिस्ट्रार बनाया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने गुरुवार को प्रभारी रजिस्ट्रार के रूप में कार्यभार ग्रहण करने की जानकारी दी।

डॉ. नफीस अहमद ने प्रभार देने से किया इनकार

नए रजिस्ट्रार डॉ. मृत्युंजय कुमार जब प्रभार लेने के लिए डॉ. नफीस अहमद के पास पहुंचे, तो डॉ. नफीस अहमद ने प्रभार देने से इनकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्हें जिस तरीके से पद से विरमित किया गया है, वह प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि यदि उन्हें पद से हटाने या विरमित करने की कार्रवाई करनी थी, तो संबंधित स्तर पर आवश्यक अनुमति और प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए थी।

डॉ. नफीस अहमद ने यह भी कहा कि अगर विश्वविद्यालय की फाइलों से किसी तरह की छेड़छाड़ की गई, तो संबंधित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई जा सकती है। उन्होंने बुधवार रात विश्वविद्यालय परिसर की सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने का निर्देश दिए जाने की बात भी कही है। इससे यह संकेत मिलता है कि विवाद अब केवल रजिस्ट्रार के पद और प्रभार तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण फाइलों और दस्तावेजों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।

डॉ. नफीस अहमद ने विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों को फाइलों को सुरक्षित रखने और अपनी कस्टडी में रखने का निर्देश देने की बात कही है। उन्होंने सीसीडीसी सेल को 9 सितंबर की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने के लिए भी कहा है। उनका आरोप है कि उन्हें नियमसम्मत तरीके से कार्यमुक्त नहीं किया गया। हालांकि इन दावों पर आगे की प्रशासनिक या कानूनी स्थिति स्पष्ट होना बाकी है।

पांच घंटे में बदला पूरा प्रशासनिक घटनाक्रम

बुधवार का घटनाक्रम समय के हिसाब से भी काफी महत्वपूर्ण रहा। शाम के समय विश्वविद्यालय को राजभवन से कुलपति के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों पर रोक से संबंधित पत्र प्राप्त हुआ। रजिस्ट्रार डॉ. नफीस अहमद के अनुसार उन्होंने पत्र निकाला और कुलपति को इसकी जानकारी दी। इसके कुछ घंटों बाद रात में रजिस्ट्रार को पद से विरमित करने और डॉ. मृत्युंजय कुमार को नया रजिस्ट्रार बनाने का आदेश जारी कर दिया गया।

यानी जिस समय विश्वविद्यालय प्रशासन को राजभवन के आदेश के अनुसार कुलपति की शक्तियों में बदलाव के बाद आगे की प्रक्रिया तय करनी थी, उसी दौरान रजिस्ट्रार पद पर भी बड़ा बदलाव हो गया। यही वजह है कि इस मामले ने विश्वविद्यालय के कर्मचारियों, अधिकारियों और छात्र संगठनों के बीच चर्चा तेज कर दी है।

राजभवन के आदेश के बाद कुलपति की प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियों पर रोक का उद्देश्य विश्वविद्यालय में चल रहे विवादों और वित्तीय मामलों की निगरानी को मजबूत करना बताया जा रहा है। लेकिन इसी बीच रजिस्ट्रार बदलने की कार्रवाई ने एक अलग प्रशासनिक प्रश्न खड़ा कर दिया है कि अधिकार सीमित होने के बाद कुलपति किन-किन मामलों में निर्णय ले सकते हैं और किन मामलों में उन्हें राजभवन की अनुमति लेना जरूरी होगा।

वित्तीय मामलों को लेकर पहले से उठ रहे थे सवाल

कुलपति डॉ. दिनेश कुमार सिंह के अधिकारों पर रोक का मामला अचानक सामने आया घटनाक्रम नहीं है। इससे पहले विश्वविद्यालय में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर शिकायतें की गई थीं। इसके बाद झारखंड वित्त विभाग की ओर से विशेष ऑडिट कराया गया। रिपोर्टों के अनुसार ऑडिट में मार्च 2025 से जनवरी 2026 के बीच विश्वविद्यालय में हुए करीब 47.21 करोड़ रुपये के खर्च पर आपत्तियां दर्ज की गईं।

विशेष ऑडिट में कुछ राशि को वसूली योग्य बताए जाने की भी बात सामने आई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार करीब 19.64 लाख रुपये की राशि को वसूली योग्य बताया गया है। इसके अलावा कई अन्य भुगतान और वित्तीय प्रक्रियाओं पर भी ऑडिट में आपत्तियां दर्ज होने की जानकारी सामने आई है। इन ऑडिट टिप्पणियों और शिकायतों के आधार पर ही राज्यपाल की ओर से कुलपति के अधिकारों पर कार्रवाई की गई।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ऑडिट में दर्ज आपत्तियां और शिकायतें अपने आप में किसी व्यक्ति की अंतिम दोषसिद्धि नहीं होती हैं। संबंधित अधिकारियों या पक्षों का जवाब और आगे की जांच के बाद ही किसी वित्तीय अनियमितता के संबंध में अंतिम निष्कर्ष निकाला जा सकता है। राज्यपाल की कार्रवाई फिलहाल प्रशासनिक और वित्तीय अधिकारों को सीमित करने के रूप में सामने आई है।

परीक्षा से जुड़े भुगतान का मामला भी चर्चा में

एनपीयू से संबंधित रिपोर्टों में परीक्षा कार्यों से जुड़े भुगतान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार विशेष ऑडिट और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच परीक्षा नियंत्रक से संबंधित निर्णय तथा एक एजेंसी को किए गए भुगतान का मामला भी सामने आया है। रिपोर्टों में करीब 2.68 करोड़ रुपये के भुगतान का उल्लेख किया गया है।

बताया गया है कि परीक्षा से संबंधित कुछ कार्यों को पूरा नहीं किए जाने को लेकर आपत्ति थी। इसके बावजूद बाद में संबंधित भुगतान किए जाने की बात सामने आई। इसी मामले में परीक्षा नियंत्रक की भूमिका और पदस्थापन को लेकर भी प्रशासनिक सवाल उठाए गए हैं। हालांकि इन मामलों में भी ऑडिट और विभिन्न रिपोर्टों में दर्ज तथ्यों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

कुलपति के अधिकारों पर रोक लगाए जाने के पीछे कई शिकायतों और ऑडिट आपत्तियों का एक साथ होना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राज्यपाल की कार्रवाई के बाद विश्वविद्यालय में प्रशासनिक फैसलों की समीक्षा और दस्तावेजों की सुरक्षा पर भी ध्यान बढ़ गया है।

रजिस्ट्रार की नियुक्ति को लेकर वैधानिक सवाल

रजिस्ट्रार डॉ. नफीस अहमद ने जिस मुद्दे को उठाया है, वह विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली से जुड़ा महत्वपूर्ण सवाल है। उनका कहना है कि उनकी नियुक्ति जेपीएससी के माध्यम से हुई थी और विश्वविद्यालय के सिंडिकेट से भी संबंधित प्रक्रिया पूरी हुई थी। ऐसी स्थिति में उन्हें पद से हटाने या कार्यमुक्त करने के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, यह अब विवाद का विषय बन गया है।

उनका कहना है कि राजभवन के आदेश के बाद पहले राजभवन से लिखित मार्गदर्शन लिया जाना चाहिए था और फिर सिंडिकेट के माध्यम से इस मामले को आगे बढ़ाया जाना चाहिए था। दूसरी तरफ विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से डॉ. मृत्युंजय कुमार को प्रभारी रजिस्ट्रार नियुक्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

इस मामले में आगे राजभवन, उच्च शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय के स्तर से स्थिति स्पष्ट किए जाने की संभावना है। यदि दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं, तो प्रशासनिक आदेशों और नियुक्ति से संबंधित दस्तावेज इस विवाद में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

फाइलों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता

रजिस्ट्रार विवाद के बीच विश्वविद्यालय की फाइलों और रिकॉर्ड को लेकर भी चिंता जताई गई है। डॉ. नफीस अहमद ने विभागीय अधिकारियों को फाइलों को अपनी कस्टडी में रखने और किसी तरह की छेड़छाड़ की स्थिति में प्राथमिकी दर्ज कराने की बात कही है। साथ ही 9 सितंबर की सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखने का निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई है।

फाइलों की सुरक्षा इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि विश्वविद्यालय में वित्तीय और प्रशासनिक निर्णयों से संबंधित दस्तावेजों की जांच हो सकती है। ऐसे में भुगतान, नियुक्ति, परीक्षा कार्य, टेंडर, प्रशासनिक आदेश और अन्य महत्वपूर्ण रिकॉर्ड सुरक्षित रहना आवश्यक है। किसी भी दस्तावेज में बदलाव या रिकॉर्ड के गायब होने की स्थिति में विवाद और अधिक गंभीर हो सकता है।

विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह सामान्य शैक्षणिक और प्रशासनिक कामकाज को प्रभावित किए बिना विवादित मामलों में पारदर्शिता बनाए रखे। विद्यार्थियों से जुड़े परीक्षा, प्रमाणपत्र, नामांकन और अन्य जरूरी काम नियमित रूप से चलते रहें, यह भी महत्वपूर्ण है।

छात्रों और कर्मचारियों पर क्या असर होगा

नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में चल रहे इस प्रशासनिक विवाद का सबसे बड़ा असर विद्यार्थियों और कर्मचारियों पर पड़ने की आशंका रहती है। विश्वविद्यालय में परीक्षा, परिणाम, प्रमाणपत्र, नामांकन, शोध, कॉलेजों से संबंधित काम और कर्मचारियों से जुड़े प्रशासनिक कार्य लगातार चलते रहते हैं। ऐसे में शीर्ष स्तर पर अधिकारों को लेकर विवाद होने पर निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

हालांकि अभी तक सामने आई जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय के नियमित कामकाज को जारी रखने की कोशिश की जा रही है। नए प्रभारी रजिस्ट्रार की नियुक्ति इसी प्रशासनिक निरंतरता का हिस्सा मानी जा रही है। डॉ. मृत्युंजय कुमार ने प्रभारी रजिस्ट्रार के रूप में कार्यभार संभालने की जानकारी दी है।

छात्रों के लिए यह जरूरी है कि प्रशासनिक विवाद के कारण परीक्षा और शैक्षणिक कैलेंडर प्रभावित न हो। विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर परीक्षा कार्यक्रम, प्रवेश और अन्य शैक्षणिक सूचनाएं जारी होती रहती हैं।

छात्र संगठनों ने जताई प्रतिक्रिया

कुलपति के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों पर रोक के बाद विश्वविद्यालय परिसर में छात्र संगठनों की प्रतिक्रिया भी सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार कुछ छात्र संगठनों ने राज्यपाल की कार्रवाई का स्वागत किया और विश्वविद्यालय में वित्तीय मामलों की जांच तथा जवाबदेही की मांग को दोहराया।

छात्र संगठनों की ओर से पहले भी विश्वविद्यालय में वित्तीय मामलों को लेकर शिकायतें किए जाने की जानकारी सामने आई थी। अब राजभवन की कार्रवाई के बाद उनकी मांगों को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा बढ़ी है।

दूसरी ओर रजिस्ट्रार को हटाए जाने के फैसले को लेकर भी विरोध सामने आया है। इससे यह स्पष्ट है कि विश्वविद्यालय में एक ही समय पर दो अलग-अलग प्रशासनिक मुद्दे सक्रिय हो गए हैं—एक ओर कुलपति के अधिकारों पर राजभवन की रोक और दूसरी ओर रजिस्ट्रार के पद पर बदलाव।

कुलपति के सामने आगे क्या स्थिति होगी

राज्यपाल की ओर से कुलपति के वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों पर रोक लगाए जाने के बाद डॉ. दिनेश कुमार सिंह की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कुछ रिपोर्टों में उन्हें इस्तीफा देने का निर्देश दिए जाने की बात सामने आई है। वहीं यदि निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार इस्तीफा नहीं दिया जाता है, तो आगे की प्रशासनिक कार्रवाई की संभावना भी बताई गई है।

फिलहाल इस मामले में आगे की कार्रवाई राजभवन और संबंधित विभागों के निर्देशों पर निर्भर करेगी। कुलपति के अधिकारों पर लगी रोक कब तक रहेगी और उनके संबंध में अंतिम निर्णय क्या होगा, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

विश्वविद्यालय के लिए बड़ा प्रशासनिक मोड़

नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय वर्ष 2009 में स्थापित झारखंड का राज्य विश्वविद्यालय है और इसका मुख्यालय मेदिनीनगर, पलामू में है। विश्वविद्यालय के अंतर्गत स्नातक, स्नातकोत्तर, शोध और विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियां संचालित होती हैं।

ऐसे विश्वविद्यालय में कुलपति और रजिस्ट्रार जैसे शीर्ष प्रशासनिक पदों में एक ही दिन में बड़ा बदलाव होना संस्थान के लिए महत्वपूर्ण घटना है। एक ओर राज्यपाल ने कुलपति की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों पर रोक लगा दी, वहीं दूसरी ओर कुछ ही घंटों में रजिस्ट्रार बदलने का आदेश जारी हुआ। इसके बाद पुराने रजिस्ट्रार ने नए रजिस्ट्रार को प्रभार देने से इनकार किया और पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए।

अब निगाह इस बात पर रहेगी कि राजभवन, उच्च शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन इस विवाद को किस तरह सुलझाते हैं। साथ ही विशेष ऑडिट में दर्ज आपत्तियों पर आगे क्या कार्रवाई होती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।

विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए आने वाला समय कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण रहेगा। वित्तीय मामलों की जांच, प्रशासनिक फैसलों की समीक्षा, रजिस्ट्रार विवाद और विश्वविद्यालय के नियमित कामकाज को एक साथ संभालना होगा। विद्यार्थियों और कर्मचारियों की नजर इस बात पर रहेगी कि इन विवादों के बीच परीक्षा, परिणाम, प्रमाणपत्र, नियुक्ति और अन्य शैक्षणिक प्रक्रियाएं समय पर चलती रहें।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय में कुलपति के अधिकारों पर राजभवन की रोक के बाद मामला केवल वित्तीय कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा है। कुछ ही घंटों बाद रजिस्ट्रार बदले जाने से प्रशासनिक विवाद भी सामने आ गया है। डॉ. नफीस अहमद की ओर से प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाने और डॉ. मृत्युंजय कुमार के प्रभारी रजिस्ट्रार के रूप में कार्यभार संभालने के बाद अब आगे की स्थिति संबंधित प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया से तय होगी।

लिंक

नीलांबर-पीतांबर विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट

NPU VC के अधिकारों पर कार्रवाई की खबर

रजिस्ट्रार बदलने से जुड़ी खबर

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *