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रांची: झारखंड हाईकोर्ट को जल्द ही तीन नए न्यायाधीश मिलने जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने झारखंड सुपीरियर ज्यूडिशियल सर्विस कैडर के तीन प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीशों को झारखंड हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। कॉलेजियम की ओर से जिन तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम को मंजूरी दी गई है, उनमें गढ़वा के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश मनोज प्रसाद, साहिबगंज के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अखिल कुमार और डालटनगंज के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश राम शर्मा शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 10 सितंबर 2026 को हुई बैठक में इन नामों पर सहमति जताई।

तीनों न्यायिक अधिकारियों को हाईकोर्ट में पदोन्नत किए जाने की सिफारिश से झारखंड की न्यायिक व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है। झारखंड हाईकोर्ट में लंबे समय से न्यायाधीशों की संख्या और लंबित मामलों को लेकर चर्चा होती रही है। ऐसे में तीन नए न्यायाधीशों के आने से अदालत के कामकाज में अतिरिक्त न्यायिक क्षमता जुड़ सकती है।

हालांकि, अभी एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की मंजूरी के बाद प्रक्रिया पूरी तरह समाप्त नहीं होती। कॉलेजियम की सिफारिश के बाद केंद्र सरकार की प्रक्रिया और राष्ट्रपति की औपचारिक नियुक्ति तथा अधिसूचना की प्रक्रिया पूरी होती है। इसके बाद ही न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रभावी होगी।

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तीनों न्यायिक अधिकारियों के नाम पर कॉलेजियम की मुहर

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने झारखंड हाईकोर्ट के लिए जिन तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम की सिफारिश की है, वे हैं:

मनोज प्रसाद – प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, गढ़वा

अखिल कुमार – प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, साहिबगंज

राम शर्मा – प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डालटनगंज

इन तीनों अधिकारियों के नाम को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 10 सितंबर 2026 की बैठक में मंजूरी दी। LiveLaw के अनुसार, कॉलेजियम ने तीनों न्यायिक अधिकारियों को झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है।

झारखंड की न्यायिक सेवा से आने वाले इन अधिकारियों के पास जिला न्यायपालिका में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का अनुभव है। हाईकोर्ट में नियुक्ति के बाद यह अनुभव राज्य की उच्च न्यायिक व्यवस्था के लिए उपयोगी माना जा रहा है।

गढ़वा के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश मनोज प्रसाद

कॉलेजियम की सिफारिश में शामिल मनोज प्रसाद वर्तमान में गढ़वा के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यरत बताए गए हैं। जिला न्यायपालिका में प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है।

जिले में न्यायिक प्रशासन के साथ-साथ महत्वपूर्ण आपराधिक और दीवानी मामलों की सुनवाई से संबंधित जिम्मेदारियां भी जिला न्यायपालिका के स्तर पर होती हैं। ऐसे में लंबे न्यायिक अनुभव वाले अधिकारियों को हाईकोर्ट में पदोन्नत किया जाना न्यायिक सेवा के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

कॉलेजियम द्वारा मनोज प्रसाद के नाम की सिफारिश के बाद अब उनके हाईकोर्ट जज बनने की आगे की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

साहिबगंज के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश अखिल कुमार

दूसरा नाम अखिल कुमार का है। वे साहिबगंज के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें भी झारखंड हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की गई है।

जिला न्यायालय स्तर पर काम करने वाले न्यायिक अधिकारियों को हाईकोर्ट में पदोन्नत किए जाने की प्रक्रिया न्यायपालिका में अनुभव और सेवा रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर की जाती है। अखिल कुमार का नाम भी इसी प्रक्रिया के तहत कॉलेजियम के सामने आया और 10 सितंबर की बैठक में उनके नाम को मंजूरी दी गई।

साहिबगंज जैसे जिले में जिला न्यायपालिका की जिम्मेदारी संभालना प्रशासनिक और न्यायिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। हाईकोर्ट में उनके आने से जिला न्यायपालिका के अनुभव का उच्च न्यायालय के स्तर पर इस्तेमाल होगा।

डालटनगंज के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश राम शर्मा

तीसरा नाम राम शर्मा का है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार वे डालटनगंज यानी पलामू क्षेत्र के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यरत हैं। कॉलेजियम ने उन्हें भी झारखंड हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की है।

राम शर्मा का नाम भी उन तीन न्यायिक अधिकारियों में शामिल है, जिन्हें जिला न्यायपालिका से हाईकोर्ट में पदोन्नत करने के प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मंजूरी दी है।

तीनों अधिकारियों की नियुक्ति होने के बाद झारखंड हाईकोर्ट की न्यायिक क्षमता में वृद्धि होगी। खासकर लंबित मामलों की सुनवाई और अलग-अलग पीठों के काम के बंटवारे में इसका असर पड़ सकता है।

झारखंड हाईकोर्ट में वर्तमान स्थिति क्या है?

अखबार में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, झारखंड हाईकोर्ट में वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश समेत 13 न्यायाधीश कार्यरत हैं, जबकि हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के लिए कुल स्वीकृत पद 25 हैं।

इस हिसाब से स्वीकृत क्षमता और वर्तमान कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या के बीच अंतर बना हुआ है। तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति होने के बाद कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या बढ़ेगी और रिक्त पदों की संख्या में कमी आएगी।

हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या का सीधा संबंध मामलों की सुनवाई की क्षमता से होता है। अधिक न्यायाधीश होने पर अलग-अलग पीठों का गठन किया जा सकता है और विभिन्न प्रकार के मामलों की सुनवाई के लिए न्यायिक समय बढ़ाया जा सकता है।

हालांकि, केवल जजों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलों का तत्काल समाधान नहीं होता। इसके लिए अदालत की प्रशासनिक व्यवस्था, सुनवाई की गति, वकीलों की उपलब्धता, केस मैनेजमेंट और अन्य कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं।

हाईकोर्ट में तीन नए जज आने से क्या बदलेगा?

तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति का सबसे बड़ा संभावित असर हाईकोर्ट की कार्यक्षमता पर पड़ेगा। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से अधिक पीठों के गठन की संभावना बढ़ सकती है।

इससे लंबित मामलों की सुनवाई के लिए अतिरिक्त न्यायिक समय उपलब्ध हो सकता है। अलग-अलग प्रकार के मामलों को अलग पीठों में बांटने में भी सुविधा मिल सकती है।

झारखंड हाईकोर्ट में आपराधिक मामलों के अलावा भूमि विवाद, सेवा मामले, संवैधानिक मामले, कंपनी और वाणिज्यिक विवाद, सरकारी नीतियों से संबंधित याचिकाएं और अन्य महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई होती है।

इन मामलों की संख्या लगातार बनी रहती है। ऐसे में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ना न्यायिक प्रशासन के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।

लंबित मामलों के निपटारे की उम्मीद

हाईकोर्ट में लंबित मामलों का निपटारा न्याय व्यवस्था की बड़ी चुनौती है। किसी मामले के लंबे समय तक लंबित रहने से संबंधित पक्षों को आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

नए न्यायाधीशों की नियुक्ति से लंबित मामलों की सुनवाई में तेजी आने की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे प्रभावी होती है, क्योंकि नए न्यायाधीशों के कार्यभार संभालने के बाद उन्हें अलग-अलग बेंच और मामलों की जिम्मेदारी दी जाती है।

तीन नए न्यायाधीशों के आने से वर्तमान न्यायाधीशों पर काम का दबाव भी कुछ हद तक कम हो सकता है।

जिला न्यायपालिका से हाईकोर्ट तक पहुंचने की प्रक्रिया

भारत में हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए संविधान और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाता है। न्यायिक अधिकारियों के मामले में संबंधित हाईकोर्ट की ओर से प्रस्ताव तैयार किया जाता है। इसके बाद प्रक्रिया आगे बढ़ते हुए सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम तक पहुंचती है।

कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं। हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है।

प्रस्ताव पर विचार के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम अपनी सिफारिश केंद्र सरकार को भेजता है। इसके बाद केंद्रीय स्तर पर नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। अंत में राष्ट्रपति की नियुक्ति और आधिकारिक अधिसूचना के बाद संबंधित व्यक्ति हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदभार ग्रहण करता है।

कॉलेजियम की सिफारिश के बाद क्या होगा?

10 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा तीनों नामों को मंजूरी दिए जाने के बाद अब आगे की प्रक्रिया शुरू होगी।

कॉलेजियम की सिफारिश संबंधित प्रक्रिया के तहत केंद्र सरकार तक जाएगी। इसके बाद नियुक्ति से संबंधित आवश्यक जांच और औपचारिकताएं पूरी की जाएंगी। राष्ट्रपति की मंजूरी और नियुक्ति वारंट जारी होने के बाद नियुक्ति प्रभावी होगी।

इसलिए समाचार में यह कहना अधिक सटीक है कि तीनों न्यायिक अधिकारियों को झारखंड हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश/मंजूरी मिल गई है, जबकि अंतिम औपचारिक नियुक्ति की प्रक्रिया अभी बाकी है।

यही कारण है कि वर्तमान समय में इन तीनों को “प्रस्तावित नए जज” या “हाईकोर्ट के लिए अनुशंसित न्यायिक अधिकारी” कहना अधिक उचित है।

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक ही दिन कई हाईकोर्ट के लिए नाम मंजूर किए

10 सितंबर की कॉलेजियम बैठक में केवल झारखंड हाईकोर्ट से संबंधित फैसला नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अलग-अलग हाईकोर्ट के लिए कई न्यायिक अधिकारियों के नामों पर भी विचार किया।

रिपोर्टों के अनुसार, दिल्ली हाईकोर्ट के लिए आठ न्यायिक अधिकारियों के नामों को मंजूरी दी गई। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के लिए एक न्यायिक अधिकारी और कर्नाटक हाईकोर्ट के लिए तीन न्यायिक अधिकारियों के नामों को भी मंजूरी दी गई।

इस तरह 10 सितंबर की बैठक न्यायिक नियुक्तियों के लिहाज से महत्वपूर्ण रही। झारखंड के लिए इसमें मनोज प्रसाद, अखिल कुमार और राम शर्मा के नाम सामने आए।

झारखंड हाईकोर्ट के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

झारखंड में बड़ी संख्या में लोग न्यायिक मामलों के समाधान के लिए हाईकोर्ट का रुख करते हैं। राज्य के अलग-अलग जिलों से आने वाले मामलों की अंतिम सुनवाई का महत्वपूर्ण मंच हाईकोर्ट है।

न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या होने से मामलों की सुनवाई के लिए अधिक पीठों का गठन संभव होता है। इससे अलग-अलग श्रेणी के मामलों को व्यवस्थित तरीके से सुना जा सकता है।

वर्तमान में स्वीकृत 25 पदों की तुलना में कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या कम है। ऐसे में तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति से रिक्तियों का अंतर कम होगा।

इसके अलावा जिला न्यायपालिका से अनुभवी न्यायिक अधिकारियों का हाईकोर्ट में आना एक महत्वपूर्ण संस्थागत बदलाव माना जा सकता है।

न्यायिक सेवा के अधिकारियों के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश

इन नियुक्तियों का एक दूसरा महत्व भी है। जिला न्यायपालिका में काम कर रहे न्यायिक अधिकारियों के लिए हाईकोर्ट में पदोन्नति एक महत्वपूर्ण करियर अवसर होता है।

इससे यह भी संकेत मिलता है कि न्यायिक सेवा कैडर से अनुभवी अधिकारियों को हाईकोर्ट के स्तर पर जिम्मेदारी दी जा रही है।

मनोज प्रसाद, अखिल कुमार और राम शर्मा के नाम पर कॉलेजियम की मंजूरी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। तीनों वर्तमान में जिला न्यायपालिका के महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं और अब उन्हें उच्च न्यायालय के स्तर पर जिम्मेदारी मिलने की संभावना है।

हाईकोर्ट में जजों की संख्या बढ़ना क्यों जरूरी?

हाईकोर्ट में मामलों का दायरा काफी व्यापक होता है। राज्य सरकार से जुड़े मामले, नियुक्ति और सेवा विवाद, आपराधिक मामले, जमानत याचिकाएं, भूमि विवाद, कर संबंधी मामले, नागरिक विवाद और संवैधानिक मामलों की सुनवाई हाईकोर्ट में होती है।

इसके अलावा ऐसे मामलों की संख्या भी होती है जिनमें हाईकोर्ट के आदेश का प्रभाव राज्य के बड़े हिस्से पर पड़ सकता है।

इसलिए न्यायाधीशों की संख्या पर्याप्त होना जरूरी है। अगर स्वीकृत पदों की तुलना में न्यायाधीशों की संख्या कम हो तो काम का दबाव बढ़ सकता है और मामलों की सुनवाई में अधिक समय लग सकता है।

तीन नए जजों की नियुक्ति से यह दबाव कुछ हद तक कम होने की उम्मीद है।

न्यायपालिका में रिक्त पदों का मुद्दा

देश के कई हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के रिक्त पद लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं। झारखंड हाईकोर्ट भी इससे अलग नहीं है।

जब किसी हाईकोर्ट में स्वीकृत पदों की तुलना में न्यायाधीश कम होते हैं तो उपलब्ध न्यायाधीशों को अधिक संख्या में मामलों की सुनवाई करनी पड़ती है।

इस स्थिति में नए न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायिक व्यवस्था को मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है।

झारखंड हाईकोर्ट के मामले में भी तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम की सिफारिश को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।

क्या तीनों तुरंत जज बन जाएंगे?

नहीं। यह बात स्पष्ट रखना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी/सिफारिश की है। इसके बाद संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होगी।

अंतिम नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार की प्रक्रिया और राष्ट्रपति की औपचारिक स्वीकृति आवश्यक होती है। नियुक्ति वारंट जारी होने और अधिसूचना के बाद ही तीनों अधिकारी औपचारिक रूप से हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में कार्यभार संभालेंगे।

इसलिए फिलहाल इसे “झारखंड हाईकोर्ट में तीन नए जजों की नियुक्ति की राह साफ” कहना उचित है।

झारखंड के लिए आगे क्या उम्मीद?

अगर तीनों नियुक्तियां औपचारिक रूप से पूरी हो जाती हैं तो झारखंड हाईकोर्ट को तीन नए न्यायाधीश मिलेंगे। इससे अदालत की कुल कार्यरत न्यायिक क्षमता बढ़ेगी।

सबसे महत्वपूर्ण उम्मीद लंबित मामलों की सुनवाई को लेकर है। नए न्यायाधीशों के आने के बाद अलग-अलग पीठों में मामलों का वितरण बेहतर तरीके से किया जा सकता है।

हालांकि, न्यायिक प्रक्रिया में केवल संख्या ही पर्याप्त नहीं होती। मामलों की सुनवाई के लिए प्रशासनिक व्यवस्था, कोर्ट रूम, स्टाफ, रिकॉर्ड प्रबंधन और तकनीकी सुविधाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं।

इसलिए तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायिक क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसके वास्तविक परिणाम आने वाले समय में दिखाई देंगे।

कॉलेजियम की मंजूरी से न्यायिक हलकों में हलचल

सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के इस फैसले के बाद झारखंड के न्यायिक और कानूनी क्षेत्र में भी इसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। जिला न्यायपालिका से तीन अधिकारियों के नाम हाईकोर्ट के लिए सामने आने से अधिवक्ताओं और न्यायिक सेवा से जुड़े लोगों की भी नजर अब आगे की नियुक्ति प्रक्रिया पर रहेगी।

एक बार केंद्र सरकार और राष्ट्रपति स्तर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन अधिकारियों के शपथ ग्रहण की प्रक्रिया होगी। इसके बाद हाईकोर्ट में उनके कार्यक्षेत्र और पीठ से जुड़ी जिम्मेदारियां तय की जाएंगी।

झारखंड हाईकोर्ट में फिलहाल 25 स्वीकृत पद

अखबार में दी गई जानकारी के अनुसार झारखंड हाईकोर्ट में न्यायाधीशों के कुल 25 स्वीकृत पद हैं। इनमें से वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश समेत 13 न्यायाधीश कार्यरत हैं।

अगर कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित तीनों अधिकारियों की नियुक्ति पूरी हो जाती है तो कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 16 हो सकती है। इसके बाद भी स्वीकृत 25 पदों की तुलना में कुछ पद रिक्त रहेंगे।

इसका मतलब है कि भविष्य में हाईकोर्ट में और न्यायिक नियुक्तियों की आवश्यकता बनी रह सकती है।

तीन नामों से आगे भी नजर

झारखंड हाईकोर्ट के लिए तीन नामों की सिफारिश को एक महत्वपूर्ण शुरुआत माना जा सकता है। आगे यदि अन्य रिक्त पदों को भरने के लिए भी नियुक्ति प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो हाईकोर्ट की न्यायिक क्षमता और बढ़ सकती है।

फिलहाल मनोज प्रसाद, अखिल कुमार और राम शर्मा के नाम पर कॉलेजियम की मंजूरी मिल चुकी है। अब इन तीनों की नियुक्ति की औपचारिक प्रक्रिया पर नजर रहेगी।

कुल मिलाकर, झारखंड हाईकोर्ट को तीन नए न्यायाधीश मिलने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। गढ़वा के मनोज प्रसाद, साहिबगंज के अखिल कुमार और डालटनगंज के राम शर्मा को हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाने की सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश से राज्य की उच्च न्यायिक व्यवस्था में नई ताकत जुड़ने की उम्मीद है। नियुक्ति की अंतिम प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन तीनों के हाईकोर्ट में कार्यभार संभालने का रास्ता साफ होगा।

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