रांची यूनिवर्सिटी में पीएचडी शोध व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधाररांची यूनिवर्सिटी में पीएचडी शोध व्यवस्था में ऐतिहासिक सुधार

रांची: उच्च शिक्षा और शोध के क्षेत्र में गुणवत्ता, पारदर्शिता तथा गतिशीलता लाने की दिशा में रांची विश्वविद्यालय (आरयू) ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं दूरगामी निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पीएचडी थीसिस मूल्यांकन की प्रक्रिया में दशकों से चली आ रही पुरानी और शिथिल व्यवस्था को समाप्त करते हुए एक नई कड़क नीति लागू कर दी है। नए आदेश के अनुसार, अब किसी भी पीएचडी शोधार्थी की थीसिस जांच के लिए परीक्षकों का पैनल तब तक तैयार नहीं किया जा सकेगा, जब तक कि संबंधित परीक्षकों की लिखित सहमति और उनकी उपलब्धता की स्पष्ट पुष्टि न हो जाए।

रांची विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक डॉ. संजय कुमार सिंह द्वारा इस संबंध में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। इस नए नियम के लागू होने से शोध प्रबंध के मूल्यांकन में होने वाले अनावश्यक विलंब और ‘पैनम गेम’ के नाम पर होने वाले टालमटोल पर पूरी तरह से विराम लगने की उम्मीद जताई जा रही है।

पुरानी व्यवस्था की अड़चनें और नए आदेश की आवश्यकता

रांची विश्वविद्यालय में अब तक पीएचडी थीसिस मूल्यांकन के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जा रही थी, वह शोधार्थियों के लिए अक्सर मानसिक तनाव और समय की बर्बादी का कारण बनती थी। पुरानी व्यवस्था के तहत, शोधार्थी जब अपना शोध प्रबंध जमा करता था, तो उसका सुपरवाइजर (मार्गदर्शक) संभावित बाहरी विशेषज्ञों या परीक्षकों की एक सूची या पैनल तैयार कर परीक्षा विभाग को भेज देता था। परीक्षा विभाग जब उस पैनल के आधार पर संबंधित परीक्षकों से थीसिस जांचने के लिए संपर्क करता था, तो अक्सर यह देखा जाता था कि कई प्रोफेसर अपनी व्यस्तता, अस्वस्थता या अन्य कारणों का हवाला देकर मूल्यांकन करने से साफ मना कर देते थे या कोई जवाब ही नहीं देते थे।

कई मामलों में तो महीने-छह महीने बीत जाने के बाद परीक्षक अपनी अनुपलब्धता जाहिर करते थे। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने पूरा स्वीकृत पैनल रद्द कर नए सिरे से दूसरा पैनल तैयार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता था। इस लंबी और थकाऊ प्रक्रिया में महीनों, और कभी-कभी तो सालों का समय बर्बाद हो जाता था, जिसका सीधा नकारात्मक प्रभाव शोधार्थी के शैक्षणिक करियर, नौकरी के अवसरों और शोध की प्रासंगिकता पर पड़ता था। इसी प्रशासनिक लेती-लतीफी, समय की बर्बादी और पुनरावृत्ति की समस्या को हमेशा के लिए खत्म करने के लिए विश्वविद्यालय ने पैनल भेजने की पूरी प्रक्रिया का पुनर्गठन किया है।

अब नाम भेजने से पहले सुपरवाइजर को पूरी करनी होंगी तीन अनिवार्य शर्तें

विश्वविद्यालय के नए निर्देशों में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि अब शोधार्थियों के सुपरवाइजर केवल औपचारिक रूप से नाम तय कर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। किसी भी शोध प्रबंध के मूल्यांकन का पैनल तैयार कर परीक्षा विभाग को सौंपने से पहले सुपरवाइजर को अनिवार्य रूप से तीन मुख्य मानकों का पालन करना होगा और इसका सत्यापन योग्य रिकॉर्ड सुरक्षित रखना होगा:

  1. परीक्षक की स्पष्ट सहमति: सुपरवाइजर को सबसे पहले प्रस्तावित परीक्षक से संपर्क कर यह स्पष्ट रूप से जानना होगा कि वे संबंधित विषय पर तैयार की गई पीएचडी थीसिस का मूल्यांकन करने के लिए मानसिक और तकनीकी रूप से तैयार हैं या नहीं।
  2. समय और उपलब्धता की पुष्टि: केवल सहमति होना ही काफी नहीं होगा, बल्कि परीक्षक को यह भी पुष्टि करनी होगी कि विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित समय-सीमा के भीतर थीसिस की जांच पूरी कर रिपोर्ट भेजने के लिए उनके पास पर्याप्त समय उपलब्ध है।
  3. सत्यापन योग्य रिकॉर्ड (ई-मेल या आधिकारिक पत्राचार): मौखिक या टेलीफोनिक सहमति को अब मान्यता नहीं दी जाएगी। सुपरवाइजर को परीक्षक द्वारा भेजी गई ई-मेल स्वीकृति या किसी अन्य आधिकारिक व सत्यापन योग्य लिखित माध्यम से प्राप्त सहमति को अपने पास सुरक्षित रखना होगा। यह रिकॉर्ड इस बात का आधिकारिक प्रमाण होगा कि पैनल में नाम शामिल करने से पहले परीक्षक से विधिवत संपर्क किया गया था।

सुपरवाइजरों की जवाबदेही तय, खत्म होगी ‘कागजी पैनल‘ बनाने की परिपाटी

रांची यूनिवर्सिटी के इस कड़े कदम से अब थीसिस के सुपरवाइजरों की सीधी जवाबदेही तय हो गई है। पहले कई बार केवल औपचारिकता पूरी करने के लिए देश-विदेश के बड़े-बड़े विद्वानों और प्रोफेसरों के नाम बिना उनकी अग्रिम जानकारी या स्वीकृति के पैनल में शामिल कर दिए जाते थे। बाद में जब उन प्रोफेसरों तक थीसिस पहुँचती थी, तो वे अपनी व्यस्तता के कारण उसे लौटा देते थे।

अब नए नियमों के कारण कोई भी गाइड बिना लिखित प्रमाण के किसी परीक्षक का नाम प्रस्तावित नहीं कर सकेगा। इससे परीक्षा विभाग के पास जब पैनल पहुँचेगा, तो वह पहले से ही 100% क्रियान्वित होने की स्थिति में होगा। यदि भविष्य में कोई परीक्षक पैनल स्वीकृत होने के बाद मूल्यांकन करने से पीछे हटता है, तो सुपरवाइजर द्वारा सुरक्षित रखा गया ई-मेल का रिकॉर्ड विश्वविद्यालय को पारदर्शी स्थिति प्रदान करेगा।

नया आदेश और इसके दूरगामी परिणाम: शोधार्थियों के लिए बड़ी राहत

रांची विश्वविद्यालय के इस ऐतिहासिक निर्णय का सबसे बड़ा लाभ सीधे शोधार्थियों को मिलेगा। इस नई व्यवस्था के लागू होने से निम्नलिखित बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे:

  • थीसिस मूल्यांकन प्रक्रिया में तेजी: स्वीकृत पैनल से परीक्षकों के मुकरने की संभावना न्यूनतम हो जाएगी, जिससे पैनल बदलने में लगने वाले अतिरिक्त महीनों के समय की बचत होगी।
  • समय पर मिलेगी पीएचडी डिग्री: समय-सीमा के भीतर मूल्यांकन पूरा होने से शोधार्थियों को उनकी डॉक्टरेट की डिग्री समय पर मिल सकेगी, जिससे वे विभिन्न उच्च शिक्षण संस्थानों में असिस्टेंट प्रोफेसर या अन्य पदों के लिए समय पर आवेदन कर सकेंगे।
  • विश्वविद्यालय की साख में सुधार: मूल्यांकन प्रक्रिया के सुव्यवस्थित होने से रांची यूनिवर्सिटी के परीक्षा विभाग का कार्यभार सुगम होगा और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक साख व रैंकिंग में सुधार होगा।
  • पारदर्शिता और डिजिटल रिकॉर्ड: ई-मेल और लिखित माध्यम से सहमति लेने की व्यवस्था से प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता आएगी और किसी भी प्रकार के फर्जीवाड़े या शिथिलता की गुंजाइश खत्म होगी।

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