झारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता और भाषाई अधिकारों की पुनर्रचनाझारखंड की सांस्कृतिक अस्मिता और भाषाई अधिकारों की पुनर्रचना

रांची: झारखंड की सुरम्य वादियों, खनिज संपदा और ऐतिहासिक जन-आंदोलनों की भूमि आज फिर एक नए सांस्कृतिक एवं भाषाई पुनर्जागरण की गवाह बनने जा रही है। सदियों से यहाँ के आदिवासी और मूलवासी समाज की आत्मा रही जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के वजूद पर मँडरा रहे संकट के बादलों को छाँटने और उनके अधिकारिक सम्मान को पुनर्स्थापित करने के लिए राज्य के प्रबुद्ध वर्ग, भाषाशास्त्रियों, शिक्षकों तथा युवाओं ने एकजुट होकर आर-पार के संघर्ष का बिगुल फूंक दिया है।

राजधानी रांची के करमटोली स्थित प्रेस क्लब के सभागार में ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा’ के बैनर तले आयोजित एक गरिमामयी और उद्देश्यपूर्ण प्रेस वार्ता में राज्य की भाषाई नीतियों, विश्वविद्यालयों की वर्तमान स्थिति तथा विद्यार्थियों व शोधार्थियों की बदहाली पर अत्यंत गंभीरता से मंथन किया गया।

इस संवाद सम्मेलन के दौरान मंच पर मौजूद विभिन्न भाषाई प्रतिनिधियों ने एक स्वर में यह घोषणा की कि अपनी माटी, संस्कृति और मातृभाषा की रक्षा के लिए आगामी 9 अक्टूबर 2026 को राजधानी रांची की सड़कों पर एक विशाल और ऐतिहासिक ‘झारखंड भाषा यात्रा’ का आयोजन किया जाएगा। यह यात्रा केवल एक औपचारिक जुलूस या पैदल मार्च नहीं होगी, बल्कि यह झारखंड के नौ प्रमुख भाषाई परिवारों की साझी पीड़ा, उनकी सांस्कृतिक चेतना और अपने लोकतांत्रिक व शैक्षणिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए एक वैचारिक हुंकार होगी।

बाबू वाटिका से अल्बर्ट एक्का चौक तक गूंजेगी माटी की आवाज

प्रेस वार्ता में विस्तृत खाका प्रस्तुत करते हुए मोर्चा के समन्वयकों ने बताया कि 9 अक्टूबर 2026 की सुबह मोरहाबादी स्थित ऐतिहासिक बाबू वाटिका (बापू वाटिका) के प्रांगण से इस ‘झारखंड भाषा यात्रा’ का भव्य शुभारंभ होगा। मोरहाबादी का यह परिसर, जो अतीत में कई बड़े जन-आंदोलनों और सांस्कृतिक क्रांतियों का गवाह रहा है, एक बार फिर भाषाई चेतना के नए सूर्योदय का साक्षी बनेगा। बाबू वाटिका में महात्मा गांधी और राज्य के महान अमर शहीदों की प्रतिमाओं के समक्ष नमन करने के उपरांत यह पदयात्रा जन-समूह के रूप में आगे बढ़ेगी।

यह पदयात्रा मोरहाबादी से निकलकर कचहरी चौक होते हुए शहर के हृदय स्थल अल्बर्ट एक्का चौक तक जाएगी। कचहरी चौक का मार्ग चुनना अपने आप में सांकेतिक है, जो राज्य के प्रशासनिक और न्यायप्रिय तंत्र को यह संदेश देगा कि भाषाओं की उपेक्षा अब और बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके बाद, देश की रक्षा में प्राण न्योछावर करने वाले परमवीर चक्र विजेता अमर शहीद अल्बर्ट एक्का के नाम से सुसज्जित चौक पर पहुँचकर यह यात्रा एक विशाल जनसभा और भाषाई महासंकल्प के रूप में परिवर्तित होगी।

इस यात्रा के दौरान प्रतिभागियों के हाथों में तख्तियाँ, भाषाई तख्तियाँ, पारंपरिक वाद्ययंत्र और सांस्कृतिक प्रतीक होंगे। यात्रा का मुख्य उद्देश्य झारखंड के आम नागरिकों, बुद्धिजीवियों, प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक नेतृत्त्व का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना है कि राज्य गठन के दो दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यहाँ की मूल भाषाओं को वह मुकाम और संरक्षण नहीं मिल सका है, जिसकी वे हकदार थीं।

भविष्य की रणनीति और भाषाई उलगुलान का संकल्प

प्रेस वार्ता के अंत में मोर्चा के पदाधिकारियों ने यह साफ कर दिया कि 9 अक्टूबर की ‘झारखंड भाषा यात्रा’ उनके आंदोलन का अंत नहीं, बल्कि एक नए और दीर्घकालिक ‘भाषाई उलगुलान’ का श्रीगणेश है। यदि इस ऐतिहासिक पदयात्रा और शांतिपूर्ण जन-आह्वान के बाद भी शासन-प्रशासन की नींद नहीं खुलती है, तो यह मोर्चा आने वाले दिनों में गाँव-गाँव और पंचायत स्तर तक जाकर भाषाई चेतना समितियाँ बनाएगा और राज्यव्यापी आंदोलन को और अधिक तीव्र करेगा।

रांची के प्रेस क्लब में 29 सितंबर 2026 की इस दोपहर में जो वैचारिक चिनगारी सुलगी है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि झारखंड का युवा और बौद्धिक समाज अब अपनी भाषाई धरोहर की अनदेखी बर्दाश्त करने के मूड में बिल्कुल नहीं है। 9 अक्टूबर 2026 को मोरहाबादी के मैदान से अल्बर्ट एक्का चौक तक उठने वाले कदम केवल सड़कों को नहीं नापेंगे, बल्कि वे झारखंड के भाषाई भविष्य का एक नया और स्वर्णिम इतिहास भी लिखेंगे।

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