*मांदर की बनावट और ध्वनि आदिवासी संस्कृति की धड़कन*
झारखंड की लोकसंस्कृति, आदिवासी जीवन और पारंपरिक नृत्य-संगीत की पहचान बन चुके मांदर को अब आधिकारिक पहचान मिल गई है। भारत सरकार की जीआई (जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी भौगोलिक संकेतक) रजिस्ट्री, चेन्नई ने ‘मांदर ऑफ झारखंड’ को जीआई के रूप में पंजीकृत किया है। इसका भौगोलिक क्षेत्र झारखंड निर्धारित किया गया है। इसके लिए आवेदन 24 सितंबर 2021 को दाखिल किया गया था।
मांदर महज एक पारंपरिक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। आदिवासी पर्व-त्योहारों, लोकनृत्यों और सामुदायिक आयोजनों में इसकी थाप आज भी लोगों को जोड़ती है। जीआई टैग मिलने के साथ मांदर की विशिष्ट बनावट, स्थानीय कच्चे माल, पारंपरिक निर्माण तकनीक और खास ध्वनि को आधिकारिक मान्यता मिली है।
मांदर निर्माण की कला पीढ़ियों से स्थानीय कारीगरों के हाथों जीवित है। जीआई आवेदन में झारखंड के विभिन्न जनजातीय समुदायों के संगीत, नृत्य और सामाजिक जीवन में मांदर की भूमिका को भी प्रमुख आधार बनाया गया है।
जीआई के लिए आवेदन रायडीह मांदर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड, गुमला की ओर से किया गया था। इससे पारंपरिक मांदर कारीगरों और शिल्पकारों को अपनी कला की पहचान मजबूत होने की उम्मीद है।
मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से सोशल मीडिया हैंडल ‘एक्स’ पर भी इस उपलब्धि पर खुशी जताई गई। एक्स पर कहा गया है कि मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन के नेतृत्व में धरोहरों को लगातार वैश्विक पहचान मिल रही है।
सोहराय खोवर चित्रकला, केसरिया कलाकंद, कुचाई सिल्क, भगैया साड़ी व डोकरा क्राफ्ट के बाद अब ‘मांदर’ को GI Tag प्रदान किया गया है।मांदर की बनावट और ध्वनि आदिवासी संस्कृति की धड़कन है।