रांची: झारखंड में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने, सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित करने और मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम स्तर पर लाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), झारखंड की ओर से एक महत्वपूर्ण पहल की गई है। बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को रांची के नामकुम स्थित लोक स्वास्थ्य संस्थान में सुमन रोडमैप 2030 को लेकर एक दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने, गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने तथा वर्ष 2030 तक निर्धारित स्वास्थ्य लक्ष्यों को हासिल करने की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई।

कार्यशाला में सुरक्षित मातृत्व, नवजात शिशु देखभाल, टीबी उन्मूलन, नियमित टीकाकरण, यू-विन पोर्टल पर लाभार्थियों का विवरण दर्ज करने, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के कर्मचारियों के मानदेय भुगतान, सहिया प्रोत्साहन राशि और टीबी मरीजों के लंबित भुगतान जैसे महत्वपूर्ण विषयों को प्रमुखता से उठाया गया। कार्यक्रम के दौरान स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाने और लंबित कार्यों को समयबद्ध तरीके से पूरा करने पर विशेष जोर दिया गया।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, झारखंड के अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने स्वास्थ्य अधिकारियों और जिला कार्यक्रम प्रबंधकों की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य योजनाओं में केवल कागजी प्रगति पर्याप्त नहीं है। योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने टीबी मरीजों को निक्षय पोषण योजना के तहत मिलने वाली वित्तीय सहायता में देरी पर चिंता जताई और निर्देश दिया कि पात्र मरीजों की लंबित राशि का भुगतान त्योहार से पहले सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर सुनिश्चित किया जाए।

अभियान निदेशक ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब अधिकारी और कर्मचारी पूरी जिम्मेदारी के साथ काम करेंगे। उन्होंने लापरवाही और टालमटोल की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की आवश्यकता बताई। साथ ही चेतावनी दी कि स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन में शिथिलता बरतने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की जा सकती है।

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सुमन रोडमैप 2030 पर राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, झारखंड के मातृत्व स्वास्थ्य कोषांग की ओर से आयोजित इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित मातृत्व और नवजात शिशु स्वास्थ्य से संबंधित सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाना था। कार्यक्रम में वर्ष 2030 तक राज्य में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम करने के लिए रणनीतिक कार्ययोजना तैयार करने पर चर्चा की गई।

सुमन यानी सुरक्षित मातृत्व आश्वासन कार्यक्रम का उद्देश्य गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को सम्मानजनक, गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित और नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना है। इसके अंतर्गत गर्भावस्था से लेकर प्रसव और प्रसव के बाद तक महिलाओं को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने पर जोर दिया जाता है।

कार्यशाला में इस बात पर चर्चा हुई कि गर्भवती महिलाओं को समय पर स्वास्थ्य जांच, आवश्यक परामर्श, सुरक्षित प्रसव की सुविधा और प्रसव के बाद उचित देखभाल मिलना जरूरी है। इसके साथ ही नवजात शिशुओं की शुरुआती देखभाल, स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं की पहचान और जरूरत पड़ने पर बेहतर चिकित्सा केंद्र तक पहुंच सुनिश्चित करने की व्यवस्था को मजबूत बनाने की आवश्यकता पर भी ध्यान दिया गया।

राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ सभी पात्र महिलाओं तक पहुंचाने के लिए विभागीय समन्वय, स्वास्थ्य संस्थानों की कार्यक्षमता और जमीनी स्तर पर काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई। कार्यशाला में अधिकारियों को योजनाओं के क्रियान्वयन की नियमित समीक्षा करने और स्वास्थ्य सेवाओं में आने वाली बाधाओं को समय पर दूर करने की जरूरत बताई गई।

सुमन रोडमैप 2030 को लेकर आयोजित इस बैठक का व्यापक उद्देश्य मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए स्पष्ट प्राथमिकताएं तय करना और विभागीय स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करना रहा।

मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम करना स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकता

मातृ एवं शिशु मृत्यु दर किसी भी राज्य की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति का महत्वपूर्ण संकेतक है। गर्भावस्था, प्रसव और प्रसव के बाद महिलाओं को समय पर उचित चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना मातृ मृत्यु के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी तरह जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशुओं की देखभाल और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता शिशु स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।

झारखंड में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए स्वास्थ्य संस्थानों, चिकित्सा पदाधिकारियों, सामुदायिक स्वास्थ्यकर्मियों और जिला स्तर के अधिकारियों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता है। गर्भवती महिलाओं की समय पर पहचान, नियमित जांच, जोखिम वाली गर्भावस्था की निगरानी और सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

सुमन रोडमैप 2030 पर आयोजित कार्यशाला में इसी प्रकार की सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए रणनीतिक योजना तैयार करने पर जोर दिया गया। स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती यह है कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं को भी समय पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो सके।

गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच से उच्च रक्तचाप, एनीमिया और अन्य संभावित जटिलताओं की पहचान करने में सहायता मिलती है। यदि किसी गर्भवती महिला की स्थिति जोखिमपूर्ण पाई जाती है, तो उसे समय पर उचित स्वास्थ्य संस्थान में रेफर करना आवश्यक होता है। प्रसव के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता और आपातकालीन चिकित्सा सुविधाएं भी महत्वपूर्ण हैं।

नवजात शिशुओं के मामले में जन्म के तुरंत बाद उचित देखभाल, स्तनपान की शुरुआत, शरीर का तापमान बनाए रखना और संक्रमण के लक्षणों की पहचान महत्वपूर्ण माने जाते हैं। किसी भी गंभीर समस्या की स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध होना आवश्यक है।

वर्ष 2030 तक स्वास्थ्य संबंधी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इन सभी सेवाओं की गुणवत्ता, उपलब्धता और नियमित निगरानी पर विशेष ध्यान देना होगा।

गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित और नि:शुल्क स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने पर जोर

कार्यशाला में सुरक्षित मातृत्व आश्वासन कार्यक्रम के तहत राज्य की प्रत्येक गर्भवती महिला को गुणवत्तापूर्ण, सुरक्षित और नि:शुल्क स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का रोडमैप साझा किया गया। इसका उद्देश्य गर्भावस्था से लेकर प्रसव और प्रसव के बाद तक महिलाओं को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ना है।

गर्भवती महिलाओं को समय पर स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचाना, जांच की सुविधा उपलब्ध कराना और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ चिकित्सा सहायता प्रदान करना सुरक्षित मातृत्व की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। इसके लिए आशा कार्यकर्ताओं, सहिया, एएनएम, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों और चिकित्सा पदाधिकारियों की भूमिका अहम होती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार परिवहन की समस्या, स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता, जानकारी की कमी और आर्थिक कठिनाइयों के कारण महिलाएं समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाती हैं। ऐसी परिस्थितियों में स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों के बीच बेहतर समन्वय से गर्भवती महिलाओं को समय पर सहायता मिल सकती है।

कार्यशाला में मातृत्व स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए विभागीय स्तर पर जिम्मेदारी तय करने और योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया गया। स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध संसाधनों का उचित उपयोग और मरीजों को समय पर सेवा देना भी महत्वपूर्ण विषय रहा।

सुरक्षित मातृत्व केवल अस्पताल में प्रसव कराने तक सीमित नहीं है। इसमें गर्भावस्था के दौरान नियमित स्वास्थ्य जांच, पोषण संबंधी परामर्श, प्रसव के समय प्रशिक्षित कर्मियों की उपलब्धता और प्रसव के बाद मां तथा बच्चे की निगरानी शामिल है।

यदि इन सभी चरणों में स्वास्थ्य सेवाएं समय पर और प्रभावी ढंग से उपलब्ध कराई जाती हैं, तो गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य परिणामों में सुधार लाने में मदद मिल सकती है।

नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए बेहतर व्यवस्था की जरूरत

नवजात शिशु का जीवन के शुरुआती दिनों में विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है। जन्म के बाद शुरुआती अवधि में संक्रमण, सांस लेने में परेशानी, कम वजन और शरीर का तापमान बनाए रखने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। ऐसे में समय पर पहचान और उचित चिकित्सा सहायता महत्वपूर्ण होती है।

कार्यशाला में मातृत्व स्वास्थ्य के साथ नवजात शिशु देखभाल को भी प्रमुख विषय बनाया गया। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवाओं के उस हिस्से को मजबूत करना है, जो बच्चे के जन्म के तुरंत बाद से शुरू होता है।

नवजात शिशुओं के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता, आवश्यक उपकरणों का इस्तेमाल, संक्रमण नियंत्रण और गंभीर स्थिति में उच्च स्तरीय चिकित्सा केंद्र तक रेफरल जैसी व्यवस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

परिवारों को भी नवजात शिशुओं की देखभाल के संबंध में सही जानकारी मिलनी चाहिए। जन्म के बाद स्तनपान, साफ-सफाई, बच्चे को गर्म रखना और खतरे के संकेतों को पहचानना आवश्यक है। यदि बच्चा दूध नहीं पी रहा है, सांस लेने में परेशानी हो रही है या असामान्य रूप से सुस्त दिखाई देता है, तो तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी चाहिए।

स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं का लाभ तभी व्यापक रूप से मिल सकता है, जब स्वास्थ्य संस्थानों के साथ परिवारों को भी जरूरी जानकारी उपलब्ध हो। इसके लिए सामुदायिक स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम और स्वास्थ्यकर्मियों की नियमित भागीदारी महत्वपूर्ण है।

सुमन रोडमैप 2030 के तहत मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की दिशा में प्रभावी निगरानी और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन को महत्वपूर्ण माना गया।

टीबी मरीजों के लंबित भुगतान पर अभियान निदेशक सख्त

कार्यशाला के दौरान टीबी मरीजों को मिलने वाली वित्तीय सहायता का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, झारखंड के अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने भुगतान में हो रही देरी पर नाराजगी जताई और अधिकारियों को लंबित मामलों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने का निर्देश दिया।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य में निक्षय पोषण योजना के तहत सहायता के पात्र टीबी मरीजों को निर्धारित वित्तीय सहायता का भुगतान त्योहार से पहले सुनिश्चित किया जाए। प्रेस विज्ञप्ति में इस सहायता राशि का उल्लेख प्रति माह 1,000 रुपये के रूप में किया गया है।

टीबी के उपचार के दौरान मरीजों को नियमित दवा, समय पर जांच और चिकित्सकीय सलाह की आवश्यकता होती है। बीमारी के कारण कुछ मरीजों की काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में पोषण संबंधी सहायता उनके उपचार के दौरान सहयोगी साबित हो सकती है।

निक्षय पोषण योजना का उद्देश्य टीबी मरीजों को उपचार के दौरान पोषण संबंधी सहायता प्रदान करना है। निर्धारित नियमों के अनुसार पात्र लाभार्थियों तक सहायता राशि समय पर पहुंचना जरूरी है, ताकि उन्हें अनावश्यक आर्थिक परेशानी का सामना न करना पड़े।

अभियान निदेशक ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि भुगतान से संबंधित लंबित मामलों की समीक्षा की जाए और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करके राशि जारी की जाए। उन्होंने इस विषय को सर्वोच्च प्राथमिकता देने पर जोर दिया।

हालांकि, प्रत्येक मरीज को मिलने वाली वास्तविक राशि और भुगतान की पात्रता संबंधित योजना के वर्तमान नियमों, लाभार्थी की स्थिति तथा लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्धारित होती है। मरीजों को अपने भुगतान की स्थिति के लिए संबंधित स्वास्थ्य केंद्र या जिला टीबी कार्यालय से संपर्क करना चाहिए।

त्योहार से पहले भुगतान पूरा करने का निर्देश

त्योहारों के समय परिवारों के खर्च बढ़ जाते हैं। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों और बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए सहायता राशि का समय पर मिलना महत्वपूर्ण हो सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुए अभियान निदेशक ने टीबी मरीजों के लंबित भुगतान को त्योहार से पहले पूरा करने का निर्देश दिया।

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, उन्होंने अधिकारियों से कहा कि भुगतान में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। पात्र लाभार्थियों की जानकारी की जांच, बैंक खाते से जुड़े विवरण और भुगतान प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं को समय पर दूर किया जाना चाहिए।

लंबित भुगतान के कई संभावित कारण हो सकते हैं, जैसे लाभार्थी के विवरण में त्रुटि, बैंक खाते की जानकारी में अंतर, पोर्टल पर रिकॉर्ड अपडेट नहीं होना या प्रशासनिक स्तर पर प्रक्रिया पूरी होने में देरी। ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी को समस्या की पहचान करके उसका समाधान करना चाहिए।

स्वास्थ्य योजनाओं की प्रभावशीलता का आकलन केवल पंजीकरण या रिपोर्ट तैयार करने से नहीं किया जा सकता। यह देखना भी जरूरी है कि पात्र लाभार्थियों को योजना का वास्तविक लाभ मिला या नहीं।

अभियान निदेशक ने इसी बात पर जोर देते हुए कहा कि अधिकारियों को जमीनी स्तर पर ठोस परिणाम दिखाने होंगे। भुगतान संबंधी मामलों की नियमित समीक्षा और समयबद्ध कार्रवाई से पात्र मरीजों को राहत मिल सकती है।

स्वास्थ्य विभाग के लिए यह भी आवश्यक है कि लाभार्थियों को भुगतान की स्थिति के बारे में उचित जानकारी दी जाए, ताकि उन्हें बार-बार कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।

काम में लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी: अभियान निदेशक

कार्यशाला में अधिकारियों की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने स्पष्ट संदेश दिया कि केवल काम होने का दावा करना पर्याप्त नहीं है। योजनाओं का लाभ जमीन पर दिखाई देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि स्वास्थ्यकर्मी और विभागीय तंत्र ईमानदारी और जिम्मेदारी से कार्य करें, तो निर्धारित स्वास्थ्य लक्ष्यों को एक से दो वर्षों के भीतर पूरा करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की जा सकती है। उन्होंने स्वास्थ्य व्यवस्था में शिथिलता बरतने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध सख्त प्रशासनिक कार्रवाई की चेतावनी भी दी।

इस संदेश का मुख्य उद्देश्य स्वास्थ्य योजनाओं के क्रियान्वयन में जवाबदेही बढ़ाना और लंबित कार्यों को समय पर पूरा करना है। जिला स्तर पर अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि योजनाओं के क्रियान्वयन, लाभार्थियों के रिकॉर्ड और भुगतान जैसी प्रक्रियाओं की निगरानी में उनकी जिम्मेदारी रहती है।

यदि किसी योजना का लाभ पात्र व्यक्ति तक नहीं पहुंच रहा है, तो संबंधित समस्या का कारण पता करना और समाधान सुनिश्चित करना जरूरी है। केवल रिपोर्ट में कार्य पूरा दिखाने से स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति में सुधार नहीं होता।

अधिकारियों को निर्धारित लक्ष्यों के अनुसार काम करने, नियमित समीक्षा करने और जमीनी स्तर से प्राप्त जानकारी के आधार पर आवश्यक कार्रवाई करने की जरूरत है।

प्रशासनिक जवाबदेही स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे कर्मचारियों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति अधिक सजग रहने और लाभार्थियों की समस्याओं का समय पर समाधान करने में सहायता मिल सकती है।

टीबी उन्मूलन अभियान को गति देने पर जोर

कार्यशाला में टीबी उन्मूलन को भी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया गया। टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जिसका समय पर निदान और पूरा उपचार अत्यंत महत्वपूर्ण है। बीमारी की पहचान में देरी होने या उपचार बीच में छोड़ने से मरीज और उसके आसपास के लोगों के लिए जोखिम बढ़ सकता है।

टीबी नियंत्रण के लिए मरीजों की समय पर जांच, निदान के बाद उपचार शुरू करना, नियमित दवा सेवन और उपचार पूरा होने तक निगरानी आवश्यक है। इसके साथ ही मरीजों को बीमारी से संबंधित सही जानकारी देना और सामाजिक भेदभाव को कम करना भी महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत राज्य में टीबी से संबंधित कार्यक्रमों को प्रभावी बनाने के लिए विभागीय समन्वय, मरीजों के रिकॉर्ड का सही रखरखाव और पात्र लाभार्थियों को निर्धारित सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है।

कार्यशाला में टीबी मरीजों की सहायता राशि में हो रही देरी पर विशेष चिंता जताई गई। यह स्पष्ट किया गया कि मरीजों के भुगतान संबंधी मामलों को प्राथमिकता से पूरा किया जाना चाहिए।

टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए केवल सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की भूमिका पर्याप्त नहीं है। समुदाय की भागीदारी, बीमारी के लक्षणों के बारे में जागरूकता और समय पर जांच कराने की प्रवृत्ति भी आवश्यक है।

यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक खांसी, बुखार, वजन कम होने या अन्य संदिग्ध लक्षणों की समस्या हो, तो उसे स्वास्थ्यकर्मी से परामर्श लेना चाहिए। टीबी की पुष्टि केवल उचित चिकित्सकीय जांच के आधार पर की जाती है।

नियमित टीकाकरण और यू-विन पोर्टल पर भी समीक्षा

कार्यशाला में नियमित प्रतिरक्षण और यू-विन पोर्टल पर लाभार्थियों की जानकारी दर्ज करने का विषय भी उठाया गया। नियमित टीकाकरण बच्चों और गर्भवती महिलाओं को विभिन्न गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

टीकाकरण कार्यक्रम को प्रभावी बनाने के लिए पात्र लाभार्थियों की पहचान, टीकाकरण सत्रों की योजना, निर्धारित समय पर टीके उपलब्ध कराना और टीकाकरण के रिकॉर्ड को सही तरीके से दर्ज करना आवश्यक है।

यू-विन पोर्टल का उपयोग टीकाकरण सेवाओं के डिजिटल रिकॉर्ड और संबंधित प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने के लिए किया जाता है। लाभार्थियों की जानकारी सही और समय पर दर्ज होने से टीकाकरण की स्थिति की निगरानी करने में सहायता मिल सकती है।

यदि किसी बच्चे का टीकाकरण रिकॉर्ड अधूरा है या किसी लाभार्थी की जानकारी दर्ज नहीं हुई है, तो संबंधित स्वास्थ्यकर्मियों को निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसे ठीक करना चाहिए।

डिजिटल रिकॉर्ड की गुणवत्ता स्वास्थ्य कार्यक्रमों की योजना और निगरानी के लिए महत्वपूर्ण होती है। गलत या अधूरी जानकारी के कारण लाभार्थियों की स्थिति समझने और आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने में कठिनाई हो सकती है।

कार्यशाला में यू-विन पोर्टल पर एंट्री और नियमित प्रतिरक्षण के कार्यों को गंभीरता से पूरा करने पर जोर दिया गया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पात्र लाभार्थियों को निर्धारित टीकाकरण सेवाएं मिलें और उनका रिकॉर्ड व्यवस्थित रहे।

एनएचएम कर्मियों के मानदेय भुगतान को समय पर पूरा करने की जरूरत

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत काम करने वाले कर्मियों का योगदान राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को संचालित करने में महत्वपूर्ण है। विभिन्न स्तरों पर कार्यरत कर्मचारी मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, टीकाकरण, रोग नियंत्रण, स्वास्थ्य जागरूकता और अन्य कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में भाग लेते हैं।

कार्यशाला में एनएचएम कर्मियों के मानदेय भुगतान को लेकर भी निर्देश दिए गए। समय पर मानदेय का भुगतान कर्मचारियों के लिए आवश्यक है, क्योंकि इससे उनकी आर्थिक स्थिरता और काम करने की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

मानदेय भुगतान में देरी होने पर कर्मचारियों को व्यक्तिगत और पारिवारिक खर्चों के प्रबंधन में परेशानी हो सकती है। इसलिए भुगतान से संबंधित रिकॉर्ड, स्वीकृति और प्रशासनिक प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करना जरूरी है।

जिला और प्रखंड स्तर पर संबंधित अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भुगतान संबंधी लंबित मामलों की पहचान हो और आवश्यक कार्रवाई की जाए। यदि किसी भुगतान में दस्तावेज या रिकॉर्ड से जुड़ी समस्या है, तो उसका समाधान संबंधित नियमों के अनुसार किया जाना चाहिए।

कार्यशाला में इस विषय को उठाए जाने से यह स्पष्ट हुआ कि स्वास्थ्य योजनाओं की प्रगति के साथ-साथ उन्हें संचालित करने वाले कर्मचारियों की प्रशासनिक समस्याओं का समाधान भी महत्वपूर्ण है।

सहिया इंसेंटिव भुगतान पर भी ध्यान

झारखंड में सहिया कार्यकर्ता समुदाय और स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करती हैं। वे गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य संस्थानों से जोड़ने, बच्चों के टीकाकरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और विभिन्न स्वास्थ्य कार्यक्रमों में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने में सहायता करती हैं।

सहिया कार्यकर्ताओं को निर्धारित कार्यक्रमों और नियमों के अनुसार प्रोत्साहन राशि दी जाती है। इस राशि के भुगतान में देरी होने पर उनके कार्य और आर्थिक स्थिति पर प्रभाव पड़ सकता है।

कार्यशाला में सहिया इंसेंटिव के भुगतान को लेकर भी निर्देश दिए गए। इसका उद्देश्य संबंधित भुगतान प्रक्रियाओं की समीक्षा करना और पात्र कार्यकर्ताओं को निर्धारित प्रोत्साहन राशि समय पर उपलब्ध कराने की दिशा में कार्रवाई करना है।

सहिया कार्यकर्ता गांवों और समुदायों में स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे गर्भवती महिलाओं को जांच के लिए प्रेरित करती हैं, बच्चों के टीकाकरण के बारे में परिवारों को जानकारी देती हैं और जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में मदद करती हैं।

उनके कार्यों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और प्रशासनिक सहयोग जरूरी है। भुगतान की प्रक्रिया स्पष्ट और समयबद्ध होने से स्वास्थ्य कार्यक्रमों के संचालन में भी सहायता मिल सकती है।

मातृत्व स्वास्थ्य के साथ कुष्ठ उन्मूलन पर भी चर्चा

कार्यशाला में मातृत्व स्वास्थ्य के अलावा टीबी और कुष्ठ जैसी बीमारियों के उन्मूलन के लिए विशेष अभियान चलाने पर भी बल दिया गया। इससे स्पष्ट है कि राज्य स्वास्थ्य विभाग मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के साथ अन्य प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है।

कुष्ठ रोग एक उपचार योग्य बीमारी है। इसकी समय पर पहचान और पूरा उपचार मरीज के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने तथा बीमारी से जुड़े सामाजिक भेदभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कई बार बीमारी को लेकर गलत धारणाओं के कारण लोग जांच कराने में देरी करते हैं। ऐसे में स्वास्थ्यकर्मियों और जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को सही जानकारी उपलब्ध कराना आवश्यक है।

टीबी और कुष्ठ जैसी बीमारियों के नियंत्रण के लिए समुदाय की भागीदारी, समय पर जांच, उचित उपचार और मरीजों के प्रति संवेदनशील व्यवहार जरूरी है।

विशेष अभियान के दौरान स्वास्थ्य विभाग को यह सुनिश्चित करना होता है कि लोगों तक जानकारी पहुंचे और जरूरतमंद मरीजों को उचित स्वास्थ्य सेवाएं मिलें। ग्रामीण तथा दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच मजबूत करना भी महत्वपूर्ण है।

कार्यशाला में इन बीमारियों के उन्मूलन को लेकर चर्चा का उद्देश्य स्वास्थ्य कार्यक्रमों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में काम करना रहा।

स्वास्थ्य अधिकारियों और जिला कार्यक्रम प्रबंधकों की महत्वपूर्ण भूमिका

राज्य स्तरीय कार्यशाला में राज्यभर से आए जिला प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य पदाधिकारी (डीआरसीएचओ), चिकित्सा पदाधिकारी, स्वास्थ्य विशेषज्ञ, जिला कार्यक्रम प्रबंधक, प्रखंड कार्यक्रम प्रबंधक और अन्य अधिकारी शामिल हुए।

राज्य स्तर पर तैयार की गई रणनीति को जमीनी स्तर पर लागू करने में जिला और प्रखंड स्तर के अधिकारियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्हें अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य योजनाओं की स्थिति की समीक्षा करनी होती है और संबंधित कर्मचारियों के साथ समन्वय बनाकर काम करना होता है।

मातृत्व स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में गर्भवती महिलाओं की पहचान, स्वास्थ्य जांच, संस्थागत प्रसव और प्रसव के बाद देखभाल जैसी प्रक्रियाओं पर ध्यान देना जरूरी है। टीबी कार्यक्रम में मरीजों का रिकॉर्ड, उपचार की स्थिति और पात्र लाभार्थियों के भुगतान की निगरानी महत्वपूर्ण होती है।

इसी तरह, नियमित टीकाकरण में निर्धारित सत्रों का आयोजन, लाभार्थियों की पहचान और डिजिटल रिकॉर्ड का रखरखाव आवश्यक है। इन सभी कार्यों में जिला और प्रखंड स्तर के अधिकारियों के बीच नियमित संवाद से योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिल सकती है।

कार्यशाला के दौरान अधिकारियों की जवाबदेही पर दिए गए संदेश का उद्देश्य योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी लाना और लंबित कार्यों को समय पर पूरा करना था।

स्वास्थ्य योजनाओं में जमीनी स्तर पर परिणाम जरूरी

स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं का वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है, जब पात्र लाभार्थियों को समय पर सुविधाएं मिलती हैं। किसी योजना के तहत लक्ष्य निर्धारित करना और रिपोर्ट तैयार करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि स्वास्थ्य सेवाएं जरूरतमंद लोगों तक पहुंचें।

सुमन रोडमैप 2030 के तहत सुरक्षित मातृत्व और नवजात शिशु देखभाल को मजबूत बनाने के लिए स्वास्थ्य संस्थानों में सुविधाओं की उपलब्धता और सेवा की गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा।

इसी तरह, टीबी मरीजों को निर्धारित वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना, नियमित टीकाकरण सुनिश्चित करना और स्वास्थ्यकर्मियों के भुगतान संबंधी मामलों का समय पर समाधान करना भी आवश्यक है।

अभियान निदेशक ने स्पष्ट किया कि टालमटोल की प्रवृत्ति स्वीकार नहीं की जाएगी। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्धारित काम समय पर पूरा हो और उसका लाभ संबंधित व्यक्ति तक पहुंचे।

जमीनी स्तर पर सुधार के लिए नियमित समीक्षा, जिम्मेदारी तय करना और लंबित मामलों का समाधान आवश्यक है। विभागीय समन्वय से ऐसी समस्याओं को समय पर पहचाना जा सकता है, जो योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा बनती हैं।

कार्यशाला में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने रखे विचार

इस राज्य स्तरीय कार्यशाला में स्वास्थ्य विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, राज्य प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ. अश्विनी, आईईसी के राज्य नोडल पदाधिकारी डॉ. राहुल किशोर सिंह, राज्य यक्ष्मा नियंत्रण पदाधिकारी डॉ. कमलेश, डॉ. विजय किशोर रजक, डॉ. प्रभात और डॉ. पुष्पा ने भी अपने विचार रखे।

कार्यक्रम में विभिन्न स्वास्थ्य कार्यक्रमों की प्रगति, योजनाओं के क्रियान्वयन और राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की जरूरत पर चर्चा हुई। मातृत्व स्वास्थ्य, नवजात शिशु देखभाल और रोग नियंत्रण जैसे विषयों पर विभिन्न स्तरों के अधिकारियों का अनुभव साझा करना ऐसी कार्यशालाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

इस तरह के आयोजनों से राज्य स्तर पर तय की गई प्राथमिकताओं को जिला और प्रखंड स्तर तक पहुंचाने में मदद मिल सकती है। साथ ही, संबंधित अधिकारियों को योजनाओं की वर्तमान स्थिति और उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा करने का अवसर मिलता है।

कार्यशाला में अलग-अलग कार्यक्रमों से जुड़े अधिकारियों की उपस्थिति ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के साथ टीबी, कुष्ठ, टीकाकरण और प्रशासनिक भुगतान संबंधी विषयों को एक साझा मंच पर रखने का अवसर दिया।

वर्ष 2030 तक स्वास्थ्य लक्ष्यों को हासिल करने की चुनौती

सुमन रोडमैप 2030 के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि तय किए गए स्वास्थ्य लक्ष्यों को जमीनी स्तर पर किस तरह हासिल किया जाएगा। इसके लिए स्पष्ट कार्ययोजना, जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान, संसाधनों का उचित उपयोग और नियमित निगरानी जरूरी है।

मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के लिए गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं को समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करानी होगी। इसके साथ ही स्वास्थ्य संस्थानों में प्रशिक्षित कर्मचारियों और आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण है।

टीबी और कुष्ठ जैसी बीमारियों के नियंत्रण के लिए मरीजों की समय पर पहचान और उपचार की निरंतरता सुनिश्चित करनी होगी। नियमित टीकाकरण में पात्र लाभार्थियों तक पहुंचना और सही रिकॉर्ड बनाए रखना भी जरूरी है।

विभागीय योजनाओं में भुगतान संबंधी देरी दूर करने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं की नियमित समीक्षा करनी होगी। टीबी मरीजों की सहायता राशि, एनएचएम कर्मियों के मानदेय और सहिया इंसेंटिव जैसे मामलों को समय पर पूरा करने से लाभार्थियों और स्वास्थ्यकर्मियों को राहत मिल सकती है।

वर्ष 2030 तक निर्धारित लक्ष्यों की दिशा में प्रगति का आकलन करने के लिए स्पष्ट संकेतकों और नियमित रिपोर्टिंग की आवश्यकता होगी। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि कौन-से क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं और किन क्षेत्रों में अतिरिक्त प्रयास जरूरी हैं।

निष्कर्ष: स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और जवाबदेही पर जोर

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, झारखंड की ओर से नामकुम स्थित लोक स्वास्थ्य संस्थान में आयोजित सुमन रोडमैप 2030 की राज्य स्तरीय कार्यशाला में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार लाने पर व्यापक चर्चा हुई।

कार्यशाला में सुरक्षित मातृत्व, नवजात शिशु देखभाल, टीबी उन्मूलन, नियमित प्रतिरक्षण, यू-विन पोर्टल पर रिकॉर्ड दर्ज करने, एनएचएम कर्मियों के मानदेय और सहिया इंसेंटिव के भुगतान जैसे विषयों को प्रमुखता दी गई।

अभियान निदेशक शशि प्रकाश झा ने टीबी मरीजों की लंबित सहायता राशि को त्योहार से पहले पूरा करने का निर्देश देते हुए स्वास्थ्य अधिकारियों को स्पष्ट संदेश दिया कि योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचना चाहिए। उन्होंने काम में लापरवाही और टालमटोल के प्रति सख्त रुख अपनाते हुए प्रशासनिक कार्रवाई की चेतावनी भी दी।

वर्ष 2030 तक मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को न्यूनतम करने तथा स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन, अधिकारियों की जवाबदेही और जमीनी स्तर पर नियमित निगरानी महत्वपूर्ण होगी।

अब इस कार्यशाला में तय की गई प्राथमिकताओं को कितनी तेजी से लागू किया जाता है, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण रहेगा। यदि स्वास्थ्य विभाग की रणनीतियों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है और लंबित भुगतान सहित अन्य समस्याओं का समय पर समाधान होता है, तो राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और व्यवस्थित बनाने की दिशा में मदद मिल सकती है।

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