रांची। जिंदगी जिंदाबाद

रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में आज ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाव मोर्चा’ के निमंत्रण पर “जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा कॉन्क्लेव – 2026” का आयोजन किया गया।

इस महासंगम में झारखंड की नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं—कुड़ुख, नागपुरी, पंचपरगनिया, खोरठा, मुण्डारी, खड़िया, संथाली, कुरमाली एवं हो—के संरक्षण, संवर्धन और उनके भविष्य की दिशा तय करने को लेकर व्यापक विचार-विमर्श हुआ।

क्लस्टर सिस्टम का विरोध और सरकार से मांगइस ऐतिहासिक सम्मेलन में वक्ताओं और भाषा प्रेमियों ने ‘क्लस्टर सिस्टम’ का पुरजोर विरोध किया। मंच से सरकार से पुरजोर मांग की गई कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के स्वाभाविक विकास और अस्तित्व को बचाए रखने के लिए क्लस्टर सिस्टम से जुड़े फैसले को तत्काल वापस लिया जाए। वक्ताओं ने चेताया कि इस प्रकार की व्यवस्थाओं से स्थानीय भाषाओं के पठन-पाठन और विकास पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।डॉ. सरोज शर्मा, डॉ. हरि उरांव समेत कई गणमान्य अतिथियों की उपस्थितिशनिवार सुबह 11 बजे से शुरू हुए इस वैचारिक और सांस्कृतिक महासंगम में मुख्य रूप से बन्धु तिर्की (निवेदक, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाव मोर्चा) और डॉ. हरि उरांव उपस्थित थे।उनके अलावा रांची विश्वविद्यालय की कुलपति (VC) डॉ. सरोज शर्मा, भाषा संकाय की डीन डॉ. अर्चना दुबे, कोलेबिरा विधायक, और अजय नाथ शाहदेव ने भी कार्यक्रम में शिरकत की। साथ ही, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के सभी विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं बड़ी संख्या में भाषा प्रेमी इस ऐतिहासिक मंच का हिस्सा बने।भाषाई पुनरुद्धार के लिए प्रमुख संकल्पकार्यक्रम के दौरान झारखंड की भाषाई विरासत को अक्षुण्ण रखने के लिए निम्नलिखित प्रमुख एजेंडों पर सरकार और समाज का ध्यान आकर्षित किया गया:क्लस्टर व्यवस्था की वापसी: भाषाओं के विकास में बाधक बन रहे क्लस्टर सिस्टम के फैसले को वापस लेना।स्पष्ट नीति की घोषणा: राज्य की सभी नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण के लिए स्पष्ट सरकारी नीति का निर्माण।मातृभाषा आधारित प्राथमिक शिक्षा: प्राथमिक विद्यालयों में मातृभाषा आधारित शिक्षण व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करना।शिक्षकों की नियमित नियुक्ति: जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के तहत शिक्षकों के रिक्त पदों पर नियमित बहाली।कार्यालयों में उपयोग: सरकारी कामकाज और जनसेवाओं में स्थानीय और क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग को प्राथमिकता देना।डिजिटल और शोध को बढ़ावा: साहित्य, लोककला, शोध, प्रकाशन और डिजिटल माध्यमों पर इन भाषाओं को विशेष प्रोत्साहन देना।संस्कृति केंद्रों की स्थापना: राज्य के प्रत्येक जिले में भाषा एवं संस्कृति केंद्र स्थापित करना ताकि युवाओं को अपनी जड़ों से जोड़ा जा सके।सम्मेलन के समापन पर उपस्थित सभी बुद्धिजीवियों, शोधार्थियों और भाषा प्रेमियों ने झारखंड की गौरवशाली विरासत को फिर से जीवित करने और अपनी मातृभाषा को सम्मान दिलाने के आंदोलन को और तेज करने का सामूहिक संकल्प लिया।

देखें कार्यक्रम का वीडियो

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed