दिशोम गुरु के पद्म भूषण : गोटे झारखंड ले गरब कर बात

झारखंड आंदोलन कर अमर पुरोधा आउर जन-जन कर श्रद्धेय ‘गुरुजी’ श्री शिबू सोरेन जी के देस कर तीसर सउब से बड़ नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से अलंकृत करल जायेक गोटा झारखंडी अस्मिता, संस्कृति आउर जन-चेतना कर एकठो ऐतिहासिक जीत आहे। रास्ट्रपति भवन कर भब्य दरबार हॉल में रास्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू जी बट से उनकर घरवइया (धर्मपत्नी) श्रीमती रूपी सोरेन के ई सम्मान देवेक कर दिरिस खाली भावुक करेक वाला नी रहे, बलकि राइज कर हर नागरिक ले बड़ कृतज्ञता आउर गरब कर बेरा आहे।
दिशोम गुरु कर गोटा जिनगी खली राजनीतिक दांव-पेच कर हिस्सा नी रहलक, बलकि ई जबर जन-संघर्स, अनोखा बेक्तिगत तेयाग आउर एगो मजबूत बैचारिक धरातल में टिकल महाजातरा आहे।
शिबू सोरेन जी कर जन-नायक बनेक कोनो अचके होवल राजनीतिक घटना कर फल नी रहे, बलकि इकर पाछे उनकर दसकों लंबा सउब कुछ कर तेयाग रहे। सूदखोर मनक आउर महाजनी प्रथा कर खिलाफ लड़ाई में उनकर परिवार के भारी बेक्तिगत नोकसान उठायेक पड़लक, मुदा ऊ बदला लेवेक छोइड़ के सोसित मनक मुक्ति के आपन जिनगी कर लछ बनाय लेलयं।
साठ आउर सत्तर कर दसक में जखन छोटानागपुर आउर संथाल परगना कर जंगल में आदिवासी मनक जमीन के छल-बल से हड़पल जात रहे, तब गुरुजी आपन सुख-चैन, पारिवारिक जिनगी आउर भौतिक आसा मनके एकदम से भुलाय देलयं। ऊ महीनो तक दूर-दराज कर जंगल आउर पहाड़ मन में भूखल-पियासल रइह के भटकलयं, लाठी खायलयं, अनगिनत मुकदमा कर सामना करलयं आउर कतई धांव तो जेलो गेलयं। ‘जल, जंगल, जमीन’ कर रछा कर संकलप ले ऊ आपन जिनगी कर हर घड़ी के खपाय देलयं। उनकर एहे बिना थाकेक वाला आउर निस्वारथ तेयाग रहे जे उनके जनता कर हीया में बसालक आउर एकठो साधारन इंसान से ‘दिशोम गुरु’ बनाय देलक।
अइसने तो जन-आंदोलन कर नेता मनके खाली एगो जुझारू चेहरा माइन लेल जाइला, मकिल गुरुजी ठिन झारखंड कर नवनिरमान के लेइ के एगो बड़ परिपक्व आउर दूरदरसी बैचारिक सोच रहे। इकर एगो जिंदा आउर ऐतिहासिक नमूना 6 आउर 7 मई 1978 के रांची कर बेथेसदा गर्ल्स हाई इस्कूल में आयोजित ‘झारखंड क्षेत्रीय बुद्धिजीवी सम्मेलन’ में उनकर देल भासन से मिलेला। झारखंड मुक्ति मोर्चा कर ऊ बेरा कर महासचिव कर रूप में ‘झारखंड के समाज, संस्कृति और शिक्षा के विकास का सवाल’ बिसय उपरे ऊ जे बेवहारिक आउर क्रांतिकारी बिचार राखलयं, ऊ उनकर बैचारिक कद के देखायला। भासन कर सुरू में ऊ सफा कहलयं कि ऊ कोनो पुरना परिया कर बुद्धिजीवी नखयं, बलकि झारखंड कर जनता आउर उनकर जीबन-संघर्स कर बीच रईह के ऊ जे तीता-कसा आउर सच अनुभव पाय हयं, ओहे आधार में आपन बात राखत हयं। ऊ एकदम सुपट तरीका से बतालयं कि संथाल, मुंडा, हो, उरांव, खड़िया, कुर्मी, सदान, हिंदू आउर मुसलमान नियर जुदा-जुदा समाज मनक बीच एगो समायल बुनियादी आउर सामाजिक एकता आहे, जेके ‘झारखंडी एकता’ कहेक चाही।
ऊ चेतालयं कि बाहर से आवल कुछ अदमीमन हियां ऊंच-नीच आउर अइसन बेबस्था थोपेक चहयंना जे झारखंड कर समतामूलक समाज कर उलटा आहे। संगे-संगे, ऊ अइसन पढ़ल-लिखल स्थानीय युबक मन उपरे भी कड़ा परहार करलयं जे आपन भाखा आउर संस्कृति के छोइड़ के बाहरी चकाचौंध कर परभाब में अपन जइर के भुलात हयं। उनकर मानेक रहे कि सरकार बट से बांटल दारू कर लाइसेंस समाज के भीतर से तोड़े लाइग हे, जेकर से अदमीमन आपन जमीन बेचेक आउर आपस कर कझिया में बरबाद होवेक ले मजबूर आहयं। इकर संगे-संगे ठेकेदार मनक बट से जंगल कर बेदरदी से कटाई आदिवासी मनक आत्मनिर्भर अरथबेबस्था के नास कर देलक, जेकर से पलायन बढ़लक।
ऊ चेताय रहयं कि कोनो भी समाज के गुलाम बनाएक ले सउबसे पहिले उकर संस्कृति उपरे हमला करल जाइला। ऊ अइसन जनप्रतिनिधि मनक बिधायक-सांसद मनक भी खिंचाई करलयं जे पटना-दिल्ली जाय के आपन संस्कृति भुलाय जायंना। ऊ से बेरा कर सिछा के ‘ढकोसला’ बताते कहलयं कि देहाती इलाका मन में इस्कूल खाली दिखावा आहे, जहां मास्टर मन गायब रहयंना चाहे स्थानीय भाखा नी जानयंना। ऊ अइसन सिछा कर पछधर रहयं जे छउआ मनके खाली बाबू बनाय के सारीरिक मेहनइत से नफरत करेक नी सिखाए, बलकि ‘उत्पादन’ से जोइड़ के स्वावलम्बी बनाय। ऊ काम करेक वाला छउआ मन ले ‘रात-पाठसाला’ आउर सउबले एक समान सिछा परनाली कर मजबूत वकालत करलयं।
1978 कर उ बुद्धिजीवी सम्मेलन में शिबू सोरेन जी हुवां जुमल बिद्वान, समाजशास्त्री आउर इतिहासकार मन से भावुक गोहार लगालयं कि ऊ मन एकठो अइसन नीति आउर कारजकरम तैयार करयं जे आम जनता कर आसा-भरोसा कर अनरूप होवे आउर समाज के सोझ डहर देखाय सके। ई बात कर गवाही आहे कि उनकर संघर्स खाली उकर बेरा कर बेबस्था कर बिरोध नी रहे, बलकि उनकर ठीन अबइय्या यानी भविष्य कर मजबूत झारखंड कर एकठो बैचारिक खाका रहे।
आइज जब उनके मरनोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित करल जाए हे, तो ई सचे उनकर एहे तेयाग आउर गजब कर बैचारिक साफ-सफाई देस बट से देवल गेल एकठो सरबोच आदर आहे।
दिशोम गुरु भले आइज हमिन कर बीच भौतिक रूप से नखयं, मकिल उनकर बट से करल गेल लोक-कल्यानकारी संघर्स, सामाजिक सुधार कर संदेस आउर आपन माटी ले अगाध पिरेम झारखंड कर वादी मन में सउब दिन जीयत रही। ई पुरसकार खाली इतिहास कर एकठो कागज लखे नखे, बलकि ई उ बिचार कर लखे आहे जे सोसित मनके मुड़ उठाय के जिएक सिखालक। दिशोम गुरु शिबू सोरेन जी कर जिनगी आउर दरसन झारखंड कर सुनहरा अबइय्या यानी कि भविष्य ले सदाय एकठो प्रेरनापुंज बनल रही।

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