“मैं मश्त-हसन नहीं हूं, मैं मश्त-हसन की गाय हूं!”

एकबारगी विश्वास करना कठिन है कि ईरान में वर्ष 1969 में एक ऐसी फ़िल्म बनाई गई थी, जिसमें एक देहाती अपनी गाय से बेइंतहा प्यार करता है, और उसकी अकाल-मृत्यु हो जाने पर उसके वियोग में प्राण गंवा देता है। किंतु यह सच है। इस फ़िल्म का नाम है- “गाव।” ग़ुलाम-हुसैन सईदी की कहानी पर आधारित यह फ़िल्म दारिउश मेहरजुई ने निर्देशित की थी और फ़िल्म में मुख्य भूमिका इज़ातोल्ला इंतेज़ामी ने निभाई थी।

फ़िल्म की कहानी कुछ इस प्रकार है। ईरान के एक देहात में एक मश्त-हसन ही है, जिसके पास गाय है। पूरे गांव को इसी गाय से दूध मिलता है। मश्त-हसन की एक बीवी है, लेकिन उसके कोई बच्चा नहीं है। वह अपनी गाय को दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करता है। वह बड़े स्नेह से उसे पोखर में नहलाता है, उसे अपने हाथों से चारा खिलाता है, शहर से उसके लिए घंटियां ख़रीदकर लाता है। वह किसी और को अपनी गाय को हाथ लगाने नहीं देता। जब ख़बर मिलती है कि आस-पड़ोस में डाकुओं का गिरोह सक्रिय हो गया है और वे पशुओं को चुराकर ले जा रहे हैं तो अपनी गाय को खोने के डर से वह उसके बाड़े में ही सोने लगता है।

एक बार मश्त-हसन को किसी काम से शहर जाना होता है। इधर गांव में अनहोनी घटित हो जाती है। मश्त-हसन की गाय की अज्ञात परिस्थितियों में मृत्यु हो जाती है। उसकी बीवी रोना-पीटना शुरू कर देती है। लोग एकजुट होते हैं। मश्त-हसन लौटेगा तो हम उसे क्या बताएंगे, यह खुसरपुसुर होने लगती है। तब सब देहाती मिलकर गाय को एक कुंए में दफ़ना देते हैं और यह निर्णय लेते हैं कि मश्त-हसन को बतलाएंगे कि उसकी गाय बाड़े से फ़रार हो गई है और देहाती उसकी खोज में जंगल गए हैं।

मश्त-हसन लौटता है तो अपनी प्यारी गाय को बाड़े में नहीं पाकर बदहवास हो जाता है। वो देहातियों की कहानी पर विश्वास नहीं करता। वो कहता है, मेरी गाय कभी मुझे छोड़कर ऐसे जा नहीं सकती। उसकी मानसिक दशा इतनी व्यग्र हो जाती है कि वह स्वयं को अपनी गाय समझने लगता है। वह गाय के बाड़े में रहने लगता है और गाय का चारा ही खाता है। गाय ही की तरह बां-बां की पुकार लगाता है और दीवारों से सिर भिड़ाता है।

फ़िल्म का सबसे मार्मिक दृश्य अंत में आता है, जब गांव के लोग मश्त-हसन का दिमाग़ी इलाज कराने के लिए उसे रस्सियों से बांधकर शहर ले जा रहे होते हैं। रास्ते में एक टीले पर जाकर वह आगे बढ़ने से इनकार कर देता है। बारिश हो रही होती है। इस मुसीबत से तंग आकर गांव का एक व्यक्ति उसे मवेशियों की तरह छड़ी से पीटने लगता है। वह ग़ुस्से में मश्त-हसन से कहता है- “जानवर कहीं का!” मश्त-हसन को यह सुनकर जैसे सुख मिलता है। उसे लगता है कि अब जाकर वह अपनी प्रिय गाय के साथ पूरी तरह एकाकार हो गया है। वह रस्सी छुड़ाकर दौड़ लगाता है और एक पोखर में कूदकर जान दे देता है।

यह फ़िल्म जब मैंने देखी तो सन्न रह गया। चेतना की किस दशा से यह सम्भव हुआ होगा, इस पर देर तक सोचता रहा। आख़िर यह एक व्यक्ति का आकस्मिक कृतित्व नहीं था, इसके निर्माण की प्रक्रिया में अनेक लोग सम्मिलित थे। अगर फ़िल्म की वस्तुनिष्ठ व्याख्या करें तो आप कह सकते हैं कि चिकित्सा-विज्ञान की एक शाखा का नाम है बोनथ्रोपी, जिसमें मनुष्य स्वयं को मवेशी समझने लगता है। ग्यारहवीं सदी में फ़ारस में मज्द-उद-दवला नाम का एक बुयिद शहज़ादा हुआ था, जो स्वयं को गाय समझता था। बाद में उसका उपचार किया गया। बहुत सम्भव है कि यह फ़िल्म उसी से प्रेरित हो।

किंतु एक अधिक संवेदनशील विश्लेषण हमें इन सम्भावनाओं को रद्द करने को बाध्य करता है। दारिउश मेहरजुई की यह फ़िल्म किसी मनोरोगी का वृत्तांत नहीं है। यह एक ऐसे देहाती की कहानी है, जो अपने गोवंश से अपनी संतानों की तरह अनुराग रखता है, और उसके बिना अपने जीवन की कल्पना नहीं कर सकता। जब मैं इस फ़िल्म के पश्चिमी समालोचकों द्वारा किए गए रिव्यू देखता हूं तो पाता हूं कि वो इसके अंतर्भाव को बूझ नहीं पा रहे हैं। पश्चिम में किसी के लिए भी यह समझ सकना कठिन है कि भला कोई अपनी गाय को इस तरह कैसे प्यार कर सकता है। कोई भी भारतीय किसान इस बात को उनसे कहीं बेहतर ढंग से समझ सकता है। किंतु मेरे लिए बेबूझ पहेली तो यही है कि यह फ़िल्म भारत में नहीं ईरान में बनाई गई है।

तब मैं सोचने को विवश हो जाता हूं कि मनुष्यता आख़िर एक इतना गहरा रहस्य है कि उसकी व्याख्या कभी भी सरल परिभाषाओं से नहीं की जा सकती।

ईरान की तत्कालीन शाह पहलवी हुकूमत ने इस फ़िल्म पर पाबंदी लगा दी थी। वो दुनिया के सामने अपना विकसित चेहरा रखना चाहती थी और उसे लगता था कि गाय की तरह चारा चरने वाले देहाती की यह कहानी उन्हें पिछड़ा साबित करती है। किंतु फ़िल्म-तस्करों की कृपा से यह यूरोप पहुंची और विभिन्न फ़िल्म-समारोहों में दिखाई गई। वेनिस फ़िल्म समारोह में इसने प्रतिष्ठित फ़िप्रेस्ची पुरस्कार जीता। शिकागो और बर्लिन फ़िल्म समारोहों में भी यह पुरस्कृत हुई। यह पहली बार नहीं था, जब किसी फ़िल्म पर उसके ही देश के लोग उदासीन रहे हों और दुनिया ने उसे सिर-आंखों पर बैठाया हो। सत्यजित राय की “पथेर पांचाली” से लेकर अंद्रेइ तारकोव्स्की की “अंद्रेइ रूब्ल्योफ़” तक- सभी की यही कहानी रही है।

दारिउश मेहरजुई की इस फ़िल्म ने ईरानी सिनेमा में एक नई धारा का सूत्रपात किया था। जो लोग सिनेमा की दुनिया से सरोकार रखते हैं, वे जानते हैं कि आज की तारीख़ में ईरानी सिनेमा की क्या हैसियत है। कोमल, सजल और गहरी मानवीय भावनाओं को व्यक्त करने वाला जैसा एशियाई सिनेमा भारत में बनना चाहिए था किंतु समांतर सिनेमा के तमाम आत्मसजग सामाजिक यथार्थवाद के बावजूद नहीं बनाया जा सका, वह ईरान में बनाया गया है और हाजिर दारिउश, अब्बास कियारोस्तामी, मोहसिन मख़मलबाफ़, माजिद माजिदी, जफ़र पनाही, असग़र फ़रहदी, बहमान घोबादी जैसे फ़िल्मकारों का कृतित्व इसका प्रमाण है। मैं कभी समझ नहीं सका कि जिस क्रूरता के लिए इस्लाम दुनिया में कुख्यात है, उसके हृदयस्थल से ऐसा कोमल सिनेमा भला कैसे सम्भव हुआ है।

क्या इसे अरब-फ़ारस द्वैत और प्रकारांतर से सुन्नी-शिया विभेद की तरह देखा जाए? फ़ारस ने हमेशा से ही स्वयं को अरब की तुलना में अधिक आधुनिक, प्रगतिशील और सुसंस्कृत माना है। दारिउश मेहरजुई की इस फ़िल्म के रिलीज़ के दस साल बाद ईरान में क्रांति हुई थी और अयातोल्ला ख़ोमैनी के नेतृत्व में वहां शिया इस्लामिक रिपब्लिक की स्थापना की गई थी। पूर्ववर्ती पहलवी हुक़ूमत के उलट अयातोल्ला ख़ोमैनी को दारिउश मेहरजुई की यह फ़िल्म बेहद पसंद थी। थोड़ी और छानबीन करने पर मालूम होता है कि ईरान में गोक़शी पर पाबंदी लगाई गई थी, और शायद अभी भी वहां यह प्रभावी है। इंडो-इरानियन और वेद-अवेस्ता सम्बंध तब ज़ेहन में गूंज जाते हैं। ईरान शब्द की उत्पत्ति ही आर्यन से हुई है। अरबी-वहाबी संस्कृति की तुलना में यह फ़ारसी-संस्कृति भारत के अधिक निकट रही है। तब मैं सोचने लगता हूं कि एक गाय के वियोग में प्राण गंवा देने वाले देहाती की यह कहानी अगर ईरान में रची गई है, तो यह पूरी तरह से अकारण नहीं हो सकता है।

लहीम-शहीम क़दकाठी वाले इज़ातोल्ला इंतेज़ामी ने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई है। उनकी पौरुषपूर्ण शख़्सियत के उलट फ़िल्म में उनका अभिनय इतनी स्त्रियोचित कोमलता से भरा हुआ है कि अचरज होता है। उनकी घनेरी मूंछें देखकर एकबारगी फ्रेडरिक नीत्शे की याद आती है, जो तूरीन में एक घोड़े को चाबुक़ से पिटता देखकर उससे लिपटकर रोने लगा था। पशुओं की आंखों में वैसी ही कुछ निर्दोष-कातरता होती है, जो हमारे हृदय को बरबस ही बेध देती है। पशुओं के प्रति करुणा का प्रदर्शन करना वृहत्तर-मनुष्यता का एक बड़ा दायित्व है, इसमें मुझे तो कोई संदेह नहीं। फ्रांत्स काफ़्का का कथा-साहित्य पशुओं के संसार से गहरे लगाव की उत्पत्ति है। मिलान कुन्देरा के एक नॉवल में एक श्वान की मृत्यु का अत्यंत मार्मिक विवरण मिलता है। रॉबेर ब्रेसां की एक फ़िल्म एक गदहे पर केंद्रित है। किंतु एक पशु के प्रति वैसे प्रेम और अनुराग का प्रदर्शन मैंने तो कभी किसी कलाकृति में इससे पहले नहीं देखा था।

और चूंकि वह पशु एक गाय है और वह फ़िल्म ईरान में बनाई गई है, इसलिए मैं हरेक भारतीय से अनुरोध करूंगा कि दारिउश मेहरजुई की यह फ़िल्म “गाव” अवश्य देखें। इति।

सुशोभित

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed

जीआई के क्षेत्र में झारखंड ने मजबूत की अपनी उपस्थिति; राज्य के 11 नए उत्पादों को मिला जीआई टैग======*झारखंड सरकार राज्य की अनूठी कला, शिल्प, कृषि उत्पादों और पारंपरिक वस्तुओं को पहचान दिलाने, उन्हें सुरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसी दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए, जीआई रजिस्ट्री ने हाल ही में राज्य के 11 और महत्वपूर्ण उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया है।  इन पहलों का मुख्य उद्देश्य झारखंड के पारंपरिक उत्पादों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना, बाजार में उनकी पहचान बढ़ाना और उन्हें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर स्थापित करना है।  *ये हैं जीआई क्लब में शामिल**झारखंड के ये उत्पाद हुए जीआई (GI) क्लब में शामिल*हाल ही में जिन उत्पादों को जीआई दर्जा दिया गया है, उनमें कुचाई सिल्क साड़ी और कपड़े, भगैया साड़ी और कपड़े, दुमका चादर बदोनी पुतुल (कठपुतली), झारखंड पंछी परहान पंछी साड़ी और कपड़े, झारखंड की टसर सिल्क साड़ियाँ और कपड़े, झारखंड डोकरा क्राफ्ट (धातु शिल्प)   झारखंड के आदिवासी आभूषण (Tribal Jewellery), झारखंड के बांस शिल्प (Bamboo Crafts), केसरिया कलाकंद, झारखंड बेनाम और झारखंड जादुपटुआ पेंटिंग् शामिल हैं। इन सभी नए जीआई टैगों का आधिकारिक प्रकाशन अगले कुछ दिनों में कर दिया जाएगा। वर्ष 2019 तक झारखंड के पास केवल एक जीआई-टैग उत्पाद (सोहराई और खोवर पेंटिंग) था, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 12 हो गई है, जो जीआई परिदृश्य में राज्य की बढ़ती ताकत को दर्शाता है।*झारक्राफ्ट की बड़ी उपलब्धि*उद्योग विभाग, झारखंड सरकार के तहत कार्यरत झारक्राफ्ट और मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड वर्ष 2019 से ही जीआई पंजीकरण गतिविधियों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहे हैं। इसी प्रयास के तहत एक उल्लेखनीय मील का पत्थर तब हासिल हुआ, जब झारक्राफ्ट ने एक साथ तीन उत्पादों झारखंड की टसर सिल्क साड़ियाँ और कपड़े, झारखंड के आदिवासी आभूषण और झारखंड के बांस शिल्प  के लिए जीआई पंजीकरण सुरक्षित किया है। ये पंजीकरण झारखंड के कारीगरों और पारंपरिक समुदायों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों की दृश्यता, प्रामाणिकता और बाजार क्षमता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएंगे। *अन्य उत्पाद भी हैं कतार में*झारखंड की यह जीआई यात्रा राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर चुकी है। इसके अतिरिक्त, कई अन्य अनूठे उत्पादों के आवेदन भी जीआई रजिस्ट्री में जमा किए गए हैं, इनमें मांदर, प्यतकर पेंटिंग, निमुचा/करनी शॉल, लाह की चूड़ियाँ, देवघर पेड़ा, रागी, रुगड़ा, धुस्का, कुसुमी लाहा, साल के बीज, महुआ का फूल और करंज के बीज शामिल हैं। राज्य में अभी भी कई और स्वदेशी उत्पादों को जीआई ढांचे के तहत लाने और राष्ट्रीय व वैश्विक बाजारों में उन्हें सही पहचान दिलाने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।===========================

*मुख्यमंत्री श्री हेमन्त सोरेन की अध्यक्षता में 15 जून 2026 को आयोजित मंत्रिपरिषद की बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय :-*==================*★ पथ प्रमण्डल, राँची अंतर्गत “नामकुम से डोरण्डा पथ (MDR-002) (कुल लंबाई-6. 70 कि०मी०) के चार लेन में चौड़ीकरण एवं मजबूतीकरण कार्य (भू-अर्जन एवं Utility Shifting सहित)” हेतु रू० 162,82,22,100/- (एक सौ बासठ करोड़ बयासी लाख बाईस हजार एक सौ) मात्र की द्वितीय पुनरीक्षित प्रशासनिक स्वीकृति दी गई।**★  श्री मुरारी भगत, सेवानिवृत अभियंता प्रमुख द्वारा सेवा काल में धारित उच्चतर प्रभारी पदों के विरूद्ध वेतन एवं अन्य लाभ देय करने की स्वीकृति दी गई।**★ Widening and Reconstruction to 4 Lane/4 Lane With Service Road including structures from Pokharia More at km 47.600 (Ex. Km 50.230) to Govindpur at km 62.949 (Ex. Km 65.325) of NH-419 में अपयोजित होने वाली भूमि के एवज में धनबाद जिला अंतर्गत पूर्वी टुण्डी अंचलांतर्गत मौजा-बलारडीह में कुल रकबा-5.84 एकड़ पुरानी परती गैर आबाद भूमि क्षतिपूरक वनरोपण हेतु वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, झारखण्ड, राँची को स्थायी हस्तांतरण की स्वीकृति दी गई।**★ राज्य सरकार के विभिन्न कार्यालयों में कम्प्यूटर ऑपरेटर के सृजित पद का वेतनमान तथा संविदा राशि भुगतान की स्वीकृति दी गई।**★ झारखण्ड सरकार के अन्तर्गत सरकारी कर्मचारियों के लिए क्रेडिट सुविधायें, अग्रिम वेतन, बीमा उत्पाद एवं अन्य मूल्यवर्धित सेवाओं की स्वीकृति दी गई।**★  Jharkhand State Wide Area Network (JharNet 2.0) परियोजना की अवधि को वित्तीय वर्ष 2023-24 (दिनांक 01.01.2024) से वित्तीय वर्ष 2026-27 (दि. 31.07.2026 तक) के लिए विस्तारित करने तथा वित्तीय वर्ष 2026-27 (दि. 31.07.2026 तक) में रु. 65.50 करोड़ व्यय की स्वीकृति दी गई।**★ गोड्डा समाहरणालय एवं सम्बद्ध कार्यालय में अनियमित रूप से नियुक्त/कार्यरत 05 (पाँच) कर्मियों की सेवा नियमितीकरण की स्वीकृति दी गई।**★  झारखण्ड राज्य में जंगली जानवरों द्वारा क्षति के फलस्वरूप मुआवजा भुगतान संबंधी आदेश में संशोधन की स्वीकृति दी गई।**★ बोकारो जिला अन्तर्गत चन्दनकियारी अंचल के पर्वतपुर कोल ब्लॉक के मौजा-केन्दुलिया, डिबरदा, बिराजडीह, नावाडीह, तेलगड़िया, देवग्राम, पर्बतपुर, तिलटाँड़, अमलाबाद, करमाटाँड, नयावन, सिलफोर, फतेहपुर के रकवा-2174.52 एकड़ (880 हे०) क्षेत्र पर धारित कोयला खनिज के खनन पट्टा की स्वीकृति दी गई।**★ केन्द्र प्रायोजित मिशन शक्ति (सम्बल) के तहत् संचालित महिला हेल्पलाईन 181 के निर्बाध कार्यशीलता हेतु तत्समय के सेवा प्रदाता एजेंसी MICA Educational Comp (P) Ltd. के अनुबंध को दिनांक-31.10.2025 तक के अवधि विस्तार दिनांक-21.12.2024 के भूतलक्षी प्रभाव से निर्गमण की घटनोत्तर स्वीकृति दी गई।**★ पलामू जिलान्तर्गत अमानत बराज योजना का यथाप्रस्तावित पद्धति से क्रियान्वयन हेतु रू० 947.2671 करोड़ (रूपये नौ सौ सैंतालिस करोड़ छब्बीस लाख इकहत्तर हजार) मात्र के तृतीय पुनरीक्षित प्राक्कलन की प्रशासनिक स्वीकृति दी गई।**★ भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का झारखण्ड में प्रधानमंत्री आवास योजना- ग्रामीण के क्रियान्वयन पर प्रतिवेदन, वर्ष 2026 की प्रतिवेदन संख्या-2 (निष्पादन लेखा परीक्षा) को झारखण्ड विधान सभा के पटल पर आगामी सत्र में उपस्थापन की स्वीकृति दी गई।**★ भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का वर्ष 2024-25 के लिए राज्य वित्त पर प्रतिवेदन, झारखण्ड सरकार, वर्ष 2026 की प्रतिवेदन संख्या 03 (राज्य वित्त लेखा परीक्षा प्रतिवेदन ) को झारखण्ड विधान सभा के पटल पर आगामी सत्र में उपस्थापन की स्वीकृति दी गई।**★ झारखण्ड सेवा नियमितीकरण नियमावली, 2015 के तहत बोकारो समाहरणालय एवं सम्बद्ध कार्यालय में अनियमित रूप से नियुक्त / कार्यरत 02 (दो) कर्मियों की सेवा नियमितीकरण की स्वीकृति दी गई।**★  बाँध सुरक्षा अधिनियम, 2021 के तहत झारखण्ड राज्य में वृहद् एवं मध्यम सिंचाई योजनाओं के अंतर्गत विनिर्दिष्ठ बाँधों तथा उनके जलाशयों की स्थिति अवधारित करने के प्रयोजन के निमित विशेषज्ञों का स्वतंत्र पैनल (Independent Panel of Experts) के गठन की स्वीकृति दी गई।**★ वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अन्तर्गत कार्यों के कार्यान्वयन हेतु हाईब्रिड मॉडल (विभागीय / पीस वेजेज एवं ठेकेदार पद्धति लागू किये जाने) को अंगीकृत करने की स्वीकृति दी गई।**★ झारखण्ड राज्य के महाधिवक्ता के पद पर श्री रोहितश्य रॉय, अधिवक्ता की नियुक्ति की घटनोत्तर स्वीकृति दी गई।**★ झारखण्ड राज्य के विभिन्न विभागों द्वारा क्षतिपूरक वनरोपण के निमित्त वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, झारखण्ड को सरकारी भूमि / गैरमजरूआ Deemed Forest (जंगल-झाड़ी, जंगल-सखुआ, जंगल-साल, जंगल इत्यादि) किस्म की भूमि के निःशुल्क स्थायी हस्तांतरण एवं इससे संबंधित सभी मामलों के निस्तार की शक्ति उपायुक्त को प्रत्यायोजित करने की स्वीकृति दी गई।**★ बोकारो जिला के चन्दनकियारी अंचल अंतर्गत सीतानाला कोल ब्लॉक के मौजा-सीतानाला, डकबेरा, पत्थरगढ़ा, शिवबाबुडीह, बनसारा, भौंरा के Cadastral Survey के अनुसार कुल रकवा-792.568 एकड़ एवं Revisional Survey के अनुसार कुल रकवा-792.1434 एकड़ तथा Georeference Cadastral Map के अनुसार कुल रकबा 316.94 हे0 क्षेत्र पर धारित कोयला खनिज के खनन पट्टा की स्वीकृति दी गई।**★ पूर्वी सिंहभूम जिलान्तर्गत हरियान, बारूनमूति, चडरीबुरू एवं गुड़ाबांधा एमराल्ड खनिज ब्लॉक के रकबा 24.47 वर्ग कि०मी० को MMDR Act, 1957 (यथा संशोधित) की धारा 17 (A) (2) के आलोक में आरक्षित करने हेतु केन्द्र सरकार का अनुमोदन प्राप्त करने की स्वीकृति दी गई।**★ गोड्डा जिला के सुन्दरपहाड़ी अंचल अन्तर्गत जीतपुर कोल ब्लॉक के रकवा 497.10 हेक्टेयर क्षेत्र पर M/s Terri Mining Pvt. Ltd. को कोयला खनन पट्टा की स्वीकृति दी गई।**★  श्री अच्युत केशव, अपर महाधिवक्ता संख्या-V, झारखण्ड उच्च न्यायालय, राँची के पद को उत्कमित करते हुए वरीय अपर महाधिवक्ता, झारखण्ड उच्च न्यायालय, राँची के पद पर नियुक्त करने की स्वीकृति दी गई।**★ माननीय उच्च न्यायालय, झारखण्ड, राँची द्वारा Cont. Case (Civil) No.-997 of 2024 ज्योति लाल महतो बनाम राज्य सरकार एवं अन्य, Cont. Case (Civil) No.-999 of 2024 अरूण कुमार दास बनाम राज्य सरकार एवं अन्य, Cont. Case (Civil) No.-977 of 2024 मृणाल कुमार राय बनाम राज्य सरकार एवं अन्य, Cont. Case (Civil) No.-1056 of 2024 अजय कुमार बनाम राज्य सरकार एवं अन्य तथा Cont. Case (Civil) No.-1076 of 2025 चन्द्र प्रकाश सिंह बनाम राज्य सरकार वादों में पारित आदेश के अनुपालन में झारखण्ड कर्मचारी चयन आयोग का विज्ञापन सं०-18/2016 अंतर्गत अनुशंसित अभ्यर्थियों/वादियों को मोटरयान निरीक्षक के पद पर नियुक्ति प्रदान किये जाने की स्वीकृति दी गई।**###*==============

*छात्रवृत्ति वितरण को पारदर्शी एवं समयबद्ध बनाने के लिए एक प्रभावी मैकेनिज्म विकसित करें : चमरा लिंडा, मंत्री**छात्रवृत्ति भुगतान दिसंबर से पहले सुनिश्चित करने का निर्देश, योजनाओं की समीक्षा में मंत्री चमरा लिंडा सख्त*रांची।  माननीय मंत्री चमरा लिंडा द्वारा विभिन्न विभागीय योजनाओं की विस्तृत समीक्षा की गई। बैठक में योजनाओं के क्रियान्वयन की गति और प्रभावशीलता को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए।समीक्षा के दौरान मंत्री ने छात्रवृत्ति योजना पर विशेष जोर देते हुए निर्देश दिया कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 में प्री-मैट्रिक एवं पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति का भुगतान दिसंबर माह से पूर्व हर हाल में सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही छात्रवृत्ति वितरण को पारदर्शी एवं समयबद्ध बनाने के लिए एक प्रभावी मैकेनिज्म विकसित करने का भी निर्देश दिया गया।बैठक में आदिवासी कल्याण आयुक्त ने जानकारी दी कि वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए ई-कल्याण पोर्टल 15 मई से ही खोल दिया गया है, जिससे आवेदन प्रक्रिया सुचारू रूप से चल रही है।साइकिल वितरण योजना की समीक्षा करते हुए मंत्री ने निर्देश दिया कि छात्र-छात्राओं के ड्रॉपआउट को कम करने के उद्देश्य से निर्धारित लक्ष्य के विरुद्ध कम से कम 50 प्रतिशत साइकिलों का वितरण अगले एक माह के भीतर सुनिश्चित किया जाए।वहीं मुख्यमंत्री रोजगार सृजन योजना की समीक्षा के दौरान मंत्री ने इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए गहन अध्ययन कर नई रूपरेखा के साथ विकसित करने तथा नए सिरे से आवेदन आमंत्रित करने का निर्देश दिया, ताकि अधिक से अधिक बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ा जा सके।बैठक में सचिव एवं विशेष सचिव, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग, आदिवासी कल्याण आयुक्त, प्रबंध निदेशक (आदिवासी सहकारी विकास निगम), राज्य परियोजना निदेशक (JTDS) एवं परियोजना निदेशक (ITDA), रांची सहित अन्य अधिकारी उपस्थित रहे।