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रांची/चाईबासा।
कहते हैं कि किसी मंजिल तक पहुंचने के लिए आंखों से ज्यादा जरूरी हौसला होता है। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले के दो दृष्टिबाधित युवाओं ने इस बात को सिर्फ साबित ही नहीं किया, बल्कि अपनी मेहनत और दृढ़ इच्छाशक्ति से इसे एक मिसाल में बदल दिया है। दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर शेखर गोप और धीरज कुम्हार ने हिमालय की कठिन ऊंचाइयों को चुनौती दी। दोनों जन्म से ही पूर्ण रूप से दृष्टिबाधित हैं, लेकिन उनकी राह में दृष्टिबाधिता दीवार नहीं बन सकी।
24 वर्षीय शेखर गोप ने लद्दाख स्थित झो जोंगो चोटी की करीब 20,472 फीट की ऊंचाई तक पहुंचकर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की। वहीं 23 वर्षीय धीरज कुम्हार ने भी कठिन परिस्थितियों के बीच 16,732 फीट की ऊंचाई तक स्थित बेस कैंप तक पहुंचकर अपनी क्षमता और हिम्मत का परिचय दिया। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के कारण धीरज को अंतिम चढ़ाई रोकनी पड़ी, लेकिन उनका सफर किसी भी मायने में कम उपलब्धि वाला नहीं है।
यह कहानी केवल दो युवाओं के पर्वत चढ़ने की कहानी नहीं है। यह कहानी है अवसर मिलने पर बदलती जिंदगी की, प्रशिक्षण से पैदा हुए आत्मविश्वास की और इस विश्वास की कि किसी व्यक्ति की क्षमता को उसकी शारीरिक स्थिति से नहीं आंका जा सकता।
पश्चिमी सिंहभूम के गांवों से हिमालय तक का सफर
शेखर गोप और धीरज कुम्हार पश्चिमी सिंहभूम जिले के ग्रामीण इलाके से आते हैं। अखबार की रिपोर्ट के अनुसार दोनों टोडानहातू गांव से जुड़े हैं। ऐसे क्षेत्र में पले-बढ़े इन युवाओं के लिए शुरुआती जिंदगी आसान नहीं थी। दृष्टिबाधिता के कारण रोजमर्रा के सामान्य कामों में भी उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था।
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों के शुरुआती जीवन में ऐसे संसाधनों की कमी थी जो उन्हें आत्मनिर्भर बनने में मदद कर सकें। लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें रोकने के बजाय धीरे-धीरे मजबूत किया। बाद में उन्हें ऐसा मंच मिला, जिसने उनकी क्षमताओं को पहचानने और उन्हें विकसित करने का अवसर दिया।
यहीं से उनके जीवन में बदलाव की शुरुआत हुई।
2022 में ‘सबल’ से जुड़े, बदली जिंदगी
शेखर और धीरज के जीवन में बड़ा बदलाव वर्ष 2022 में आया, जब वे टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘सबल’ दिव्यांग समावेशन पहल से जुड़े।
इस पहल के माध्यम से उन्हें सिर्फ किसी एक क्षेत्र में प्रशिक्षण नहीं दिया गया, बल्कि आत्मनिर्भर जीवन के लिए कई जरूरी कौशल सिखाए गए। दोनों ने ब्रेल लिपि सीखी, स्वतंत्र रूप से आने-जाने का प्रशिक्षण लिया और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करना सीखा। इससे उनके आत्मविश्वास में बड़ा बदलाव आया।
दृष्टिबाधिता के बावजूद स्वतंत्र रूप से दैनिक जीवन के काम करना उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी। धीरे-धीरे यह आत्मनिर्भरता खेल और साहसिक गतिविधियों तक पहुंची।
‘सबल’ के जरिए प्रशिक्षण ने उन्हें यह महसूस कराया कि उनके सामने अवसरों की कमी हो सकती है, लेकिन उनकी क्षमताओं की कोई तय सीमा नहीं है।
फुटबॉल से पर्वतारोहण तक पहुंची कहानी
शेखर और धीरज पहले से ही खेल गतिविधियों से जुड़े हुए थे। दोनों झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम का हिस्सा भी रहे हैं। खेल ने उनके भीतर अनुशासन, टीमवर्क, शारीरिक क्षमता और कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने का आत्मविश्वास विकसित किया।
फुटबॉल के मैदान से शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर पहाड़ों की ऊंचाइयों तक पहुंच गया।
पर्वतारोहण किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं होता। इसमें शारीरिक क्षमता के साथ मानसिक मजबूती, धैर्य, अनुशासन और जोखिम से निपटने की क्षमता की जरूरत होती है। दृष्टिबाधित व्यक्ति के लिए यह चुनौती और भी अलग स्तर की हो सकती है।
लेकिन शेखर और धीरज ने इस चुनौती को स्वीकार किया।
झो जोंगो चोटी के लिए शुरू हुई तैयारी
जब दोनों को झो जोंगो चोटी के अभियान के लिए चुना गया, तब उनके सामने एक नई परीक्षा थी। यह सामान्य ट्रेकिंग नहीं थी। ऊंचाई बढ़ने के साथ ऑक्सीजन की उपलब्धता कम होती जाती है और शरीर पर दबाव बढ़ता है।
इस चुनौती के लिए दोनों ने अभियान से पहले विशेष प्रशिक्षण लिया। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने दलमा पहाड़ियों में प्री-एक्सपीडिशन ट्रेनिंग की। इस दौरान शारीरिक क्षमता, सहनशक्ति और मानसिक मजबूती पर काम किया गया।
पर्वतारोहण में केवल पैरों की ताकत पर्याप्त नहीं होती। लंबे समय तक कठिन परिस्थितियों में खुद को संभालना पड़ता है। रास्ते की बनावट समझनी होती है, मौसम के बदलाव से निपटना पड़ता है और टीम के साथ तालमेल बनाकर चलना होता है।
शेखर और धीरज के लिए इसमें एक अतिरिक्त चुनौती थी—दृष्टि के बिना कठिन भूभाग पर आगे बढ़ना।
25 अगस्त से शुरू हुआ अभियान
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार दोनों युवाओं का अभियान 25 अगस्त से 31 अगस्त 2026 के बीच चला। इस दौरान उन्होंने लद्दाख के कठिन पहाड़ी वातावरण का सामना किया।
लद्दाख की ऊंचाई, ठंड और कठिन रास्ते किसी भी पर्वतारोही के लिए बड़ी परीक्षा होते हैं। ऊंचाई बढ़ने पर शरीर को कम ऑक्सीजन वाले वातावरण के अनुकूल बनाना पड़ता है।
शेखर और धीरज ने इस चुनौती का सामना करते हुए आगे बढ़ना जारी रखा।
उनके सामने सिर्फ ऊंचाई नहीं थी। मौसम, ठंड, कठिन रास्ते और शारीरिक थकान भी लगातार परीक्षा ले रहे थे।

फिर भी दोनों ने अपने अभियान को जारी रखा।
20,472 फीट पर शेखर ने रचा इतिहास
इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि शेखर गोप के नाम रही। उन्होंने करीब 20,472 फीट ऊंची झो जोंगो चोटी तक पहुंचने में सफलता हासिल की। वहां पहुंचकर उन्होंने तिरंगा फहराया।
एक ऐसे युवा के लिए यह उपलब्धि बेहद खास है, जिसने जन्म से ही दुनिया को देखने की क्षमता नहीं पाई। जहां अधिकांश लोगों के लिए इतनी ऊंचाई पर पहुंचना बड़ी चुनौती होती है, वहीं शेखर ने दृष्टिबाधिता को अपनी मंजिल के बीच नहीं आने दिया।
उनकी उपलब्धि ने यह संदेश दिया कि किसी व्यक्ति की सफलता केवल उसकी शारीरिक क्षमता से तय नहीं होती। सही प्रशिक्षण, उचित सहयोग और खुद पर विश्वास हो तो कठिन से कठिन लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है।
धीरज भी पहुंचे 16,732 फीट तक
दूसरी ओर धीरज कुम्हार ने भी अभियान में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। वह 16,732 फीट की ऊंचाई तक स्थित बेस कैंप तक पहुंचे। लेकिन स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों के कारण उन्हें आगे की चढ़ाई रोकनी पड़ी।
किसी पर्वतारोहण अभियान में स्वास्थ्य को नजरअंदाज करके आगे बढ़ना जोखिमपूर्ण हो सकता है। इसलिए धीरज का अंतिम चढ़ाई रोकने का निर्णय उनकी उपलब्धि को कम नहीं करता।
उन्होंने जिस ऊंचाई तक पहुंच बनाई, वह भी अपने आप में बड़ी उपलब्धि है।
उनका अभियान यह बताता है कि सफलता केवल शिखर तक पहुंचने का नाम नहीं है। कई बार कठिन परिस्थिति में सही फैसला लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
दृष्टिबाधिता को कमजोरी नहीं, क्षमता में बदला
शेखर और धीरज की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि उन्होंने अपनी दृष्टिबाधिता को अपनी पहचान की सीमा नहीं बनने दिया।
दृष्टिबाधिता के कारण उन्हें जीवन के शुरुआती दौर में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन प्रशिक्षण और अवसर मिलने के बाद उन्होंने अपनी क्षमताओं को लगातार विकसित किया।
पहले ब्रेल सीखा।
फिर स्वतंत्र गतिशीलता का प्रशिक्षण लिया।
डिजिटल तकनीक सीखी।
खेलों से जुड़े।
फुटबॉल खेला।
और आखिरकार पर्वतारोहण जैसे कठिन क्षेत्र में कदम रखा।
यह क्रम बताता है कि किसी भी व्यक्ति में क्षमता पैदा करने के लिए केवल सहायता देना पर्याप्त नहीं है। उसे सही अवसर, प्रशिक्षण और अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता भी देनी होती है।
‘सबल’ ने दिया आत्मनिर्भरता का आधार
टाटा स्टील फाउंडेशन की ‘सबल’ पहल इस कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार शेखर और धीरज 2022 में इस पहल से जुड़े थे। यहां उन्हें ब्रेल, मोबिलिटी, डिजिटल तकनीक और आत्मनिर्भर जीवन से संबंधित प्रशिक्षण मिला।
टाटा स्टील फाउंडेशन की आधिकारिक सामग्री में भी ‘सबल’ को दिव्यांगजनों के लिए अधिक समावेशी वातावरण तैयार करने वाली पहल के रूप में दिखाया गया है।
इस तरह की पहल का महत्व सिर्फ प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहता। इससे दिव्यांग युवाओं को समाज में बराबरी के साथ अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच मिलता है।
शेखर और धीरज की सफलता इसी बदलाव का उदाहरण बनकर सामने आई है।
गांव के युवाओं से प्रेरणा के प्रतीक बने
शेखर और धीरज का सफर खास इसलिए भी है क्योंकि यह किसी बड़े शहर से शुरू नहीं हुआ।
वे झारखंड के ग्रामीण क्षेत्र से आते हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जो देशभर में चर्चा का विषय बन गई है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले दिव्यांग युवाओं के सामने अक्सर शिक्षा, प्रशिक्षण, रोजगार, खेल और तकनीक तक पहुंच जैसी कई चुनौतियां होती हैं।
ऐसे में शेखर और धीरज की कहानी उन्हें यह संदेश देती है कि अवसर मिलने पर वे भी बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं।
पर्वतारोहण से कहीं बड़ी है यह उपलब्धि
शेखर के लिए 20,472 फीट की चोटी तक पहुंचना केवल एक पर्वतारोहण उपलब्धि नहीं है।
यह उनके जीवन के उन सभी संघर्षों का जवाब है, जिनका सामना उन्होंने बचपन से किया।
धीरज के लिए 16,732 फीट तक पहुंचना भी इसी संघर्ष की कहानी है।
दोनों ने दिखाया कि ऊंचाई सिर्फ पहाड़ की नहीं होती। किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास, सपनों और सोच की ऊंचाई भी महत्वपूर्ण होती है।
उनका अभियान इस बात का उदाहरण है कि जब समाज किसी व्यक्ति की कमी देखने के बजाय उसकी क्षमता को पहचानता है, तब परिणाम असाधारण हो सकते हैं।
कम ऑक्सीजन और कठिन रास्तों के बीच परीक्षा
लद्दाख की ऊंचाइयों पर चढ़ाई के दौरान कम ऑक्सीजन, ठंड और दुर्गम रास्ते जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। रिपोर्टों में भी इस अभियान के दौरान इन परिस्थितियों को कठिन परीक्षा के रूप में बताया गया है।
ऐसी परिस्थितियों में पर्वतारोहियों को अपनी गति नियंत्रित करनी पड़ती है। शरीर की प्रतिक्रिया पर लगातार नजर रखनी होती है और टीम के निर्देशों का पालन करना होता है।
दृष्टिबाधित पर्वतारोहियों के लिए यह अनुभव अलग तरह की तैयारी मांगता है। उन्हें अपने साथियों की आवाज, स्पर्श, दिशा-निर्देश और प्रशिक्षण पर भरोसा करना पड़ता है।
यही कारण है कि ऐसे अभियान में टीमवर्क की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
शेखर की सफलता ने बढ़ाया झारखंड का गौरव
झारखंड की पहचान खनिज संपदा, जंगल और आदिवासी संस्कृति के साथ-साथ खेल और प्रतिभा के लिए भी रही है।
अब शेखर और धीरज जैसे युवा राज्य की एक और पहचान मजबूत कर रहे हैं—दृढ़ इच्छाशक्ति और समावेशी विकास की पहचान।
एक ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर की पर्वतारोहण चुनौती का सामना करना आसान नहीं था। लेकिन दोनों युवाओं ने यह साबित किया कि झारखंड के छोटे गांवों में भी बड़े सपने जन्म लेते हैं।
खेल ने तैयार की मानसिक मजबूती
शेखर और धीरज का फुटबॉल से जुड़ाव भी उनकी पर्वतारोहण यात्रा में महत्वपूर्ण रहा।
दृष्टिबाधित फुटबॉल में खिलाड़ियों को आवाज और टीम के संकेतों के आधार पर खेलना पड़ता है। इससे सुनने की क्षमता, प्रतिक्रिया, टीमवर्क और मानसिक एकाग्रता विकसित होती है।
ऐसे खेलों में लगातार अभ्यास व्यक्ति को दबाव में निर्णय लेने की क्षमता देता है।
यही मानसिक मजबूती पर्वतारोहण जैसे क्षेत्र में भी काम आती है।
2025 में झारखंड की दृष्टिबाधित फुटबॉल टीम ने Greater Lions Vision Cup में भाग लिया था, जिसमें शेखर और धीरज समेत अन्य खिलाड़ियों को सम्मानित किया गया था।
युवाओं के लिए बड़ा संदेश
शेखर और धीरज की कहानी आज के युवाओं के लिए कई संदेश देती है।
पहला संदेश है कि सपने परिस्थितियों से बड़े होने चाहिए।
दूसरा संदेश है कि असफलता या कठिनाई अंतिम मंजिल नहीं होती।
तीसरा संदेश है कि सही प्रशिक्षण व्यक्ति की छिपी हुई क्षमता को सामने ला सकता है।
और सबसे बड़ा संदेश यह है कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति के सपनों की सीमा तय नहीं करती।
समाज अगर अवसर उपलब्ध कराए और व्यक्ति खुद मेहनत करने को तैयार हो, तो असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी संभव हो सकते हैं।
परिवार और समाज के लिए भी सीख
इस कहानी में परिवार और समाज की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दिव्यांग बच्चे को शुरुआत से ही केवल सुरक्षा देने के बजाय आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश जरूरी है। उसे अपनी क्षमता के अनुसार शिक्षा, खेल, तकनीक और अन्य गतिविधियों में आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
शेखर और धीरज का उदाहरण बताता है कि जब व्यक्ति को लगातार अवसर मिलते हैं, तो वह धीरे-धीरे अपनी सीमाओं को पार करता चला जाता है।
उपलब्धि के साथ जिम्मेदारी भी
इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद शेखर और धीरज की कहानी केवल व्यक्तिगत प्रेरणा नहीं रह जाती। यह समाज के लिए एक संदेश बन जाती है।
अब जरूरत है कि ऐसी प्रतिभाओं को आगे भी अवसर मिलें। दिव्यांग युवाओं के लिए खेल प्रशिक्षण, साहसिक गतिविधियों, रोजगार और तकनीकी शिक्षा के रास्ते और मजबूत किए जाएं।
क्योंकि हर शेखर और हर धीरज को पर्वत की चोटी तक पहुंचने के लिए शायद बहुत बड़े संसाधनों की जरूरत न हो, लेकिन एक मौके की जरूर जरूरत होती है।
निष्कर्ष: आंखों से नहीं, हौसले से दिखती है मंजिल
शेखर गोप और धीरज कुम्हार ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया को देखने के लिए आंखों की जरूरत होती है, लेकिन दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए हौसले की जरूरत होती है।
शेखर ने 20,472 फीट की झो जोंगो चोटी तक पहुंचकर तिरंगा फहराया। धीरज स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के बावजूद 16,732 फीट की ऊंचाई तक पहुंचे। दोनों का अभियान 25 से 31 अगस्त के बीच चला और इसने उनकी शारीरिक क्षमता के साथ-साथ मानसिक मजबूती की भी परीक्षा ली।
उनकी कहानी बताती है कि किसी व्यक्ति को उसकी कमजोरी से नहीं, उसकी क्षमता से पहचानना चाहिए।
पश्चिमी सिंहभूम के गांवों से शुरू हुई यह यात्रा अब पूरे झारखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है। यह उन सभी लोगों के लिए संदेश है जो किसी न किसी कारण से अपने सपनों को छोटा समझने लगते हैं।
मंजिल कितनी भी ऊंची हो, अगर कदम बढ़ाने का साहस हो तो रास्ता जरूर बनता है।