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रांची, 9 सितंबर 2026: रांची विश्वविद्यालय के 39वें दीक्षांत समारोह में उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए बुधवार का दिन उपलब्धि और नए संकल्प का दिन रहा। इस अवसर पर झारखंड के राज्यपाल-सह-राज्य के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति संतोष कुमार गंगवार ने सभी उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों को बधाई और शुभकामनाएं दीं। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि विश्वविद्यालय से प्राप्त ज्ञान और अपनी प्रतिभा का इस्तेमाल केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित न रखें, बल्कि समाज और राष्ट्र के विकास में भी योगदान दें।
राज्यपाल ने अपने संबोधन में ‘विकसित भारत@2047’ के संकल्प का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में विश्वविद्यालयों और युवाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक समृद्धि हासिल करना नहीं है, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, नवाचार, शिक्षा, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से सशक्त राष्ट्र का निर्माण करना है।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे केवल नौकरी या अवसर तलाशने वाले युवा न बनें, बल्कि नए अवसर पैदा करने वाले युवा बनें। उनके अनुसार विश्वविद्यालयों में होने वाला शोध, नए विचारों का विकास और युवाओं की रचनात्मक क्षमता देश के भविष्य की मजबूत नींव तैयार करती है।
रांची विश्वविद्यालय झारखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण संस्थान रहा है और विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर इसके दीक्षांत समारोहों से संबंधित सूचनाएं और दस्तावेज भी उपलब्ध हैं।
39वें दीक्षांत समारोह में विद्यार्थियों को मिली नई दिशा
दीक्षांत समारोह किसी भी विद्यार्थी के शैक्षणिक जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव होता है। वर्षों की पढ़ाई, मेहनत, परीक्षाओं और विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों के बाद जब विद्यार्थी उपाधि प्राप्त करता है तो उसके जीवन में एक नया अध्याय शुरू होता है।
रांची विश्वविद्यालय के 39वें दीक्षांत समारोह में भी उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए यही अवसर रहा। समारोह के दौरान विद्यार्थियों को उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया और उन्हें भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी गईं।
राज्यपाल ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए उन्हें यह समझाने का प्रयास किया कि विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी करना मंजिल नहीं बल्कि आगे की यात्रा की शुरुआत है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं है, बल्कि ज्ञान का उपयोग समाज के लिए करना भी है।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि उनके पास जो ज्ञान, कौशल और प्रतिभा है, उसका उपयोग देश और समाज की आवश्यकताओं को समझने तथा उनके समाधान खोजने में किया जाना चाहिए।
विकसित भारत@2047 के लक्ष्य में युवाओं की अहम भूमिका
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने अपने संबोधन में विकसित भारत@2047 के संकल्प को विशेष रूप से रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत आज विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और इस यात्रा में युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का लक्ष्य केवल सरकारों के प्रयास से पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए देश के विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों, उद्यमियों और युवाओं को मिलकर काम करना होगा।
उनके अनुसार भारत का विकास केवल GDP, उद्योग या आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं होना चाहिए। एक विकसित राष्ट्र वह होगा जहां ज्ञान और विज्ञान मजबूत हों, तकनीक का उपयोग जनहित में हो, शिक्षा गुणवत्तापूर्ण हो, नवाचार को बढ़ावा मिले और नागरिकों में मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता बनी रहे।
युवाओं को इसी व्यापक सोच के साथ अपने भविष्य की योजना बनाने की जरूरत है।
विकसित भारत केवल आर्थिक समृद्धि का नाम नहीं
राज्यपाल ने कहा कि विकसित भारत की अवधारणा को केवल आर्थिक समृद्धि के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
एक विकसित भारत में ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, नवाचार, शिक्षा, संस्कृति और मानवीय मूल्य सभी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

यदि देश आर्थिक रूप से मजबूत है लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनशीलता के क्षेत्र में पीछे है तो विकास अधूरा माना जाएगा।
इसीलिए उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे अपने ज्ञान का इस्तेमाल व्यापक उद्देश्यों के लिए करें।
विश्वविद्यालयों में होने वाला शोध नई तकनीक और नए समाधान तैयार कर सकता है। विद्यार्थियों की रचनात्मकता नई सोच को जन्म दे सकती है। इसी तरह युवाओं की ऊर्जा और प्रतिभा सामाजिक समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने का संस्थान नहीं
राज्यपाल ने रांची विश्वविद्यालय की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां से कितने विद्यार्थी डिग्री लेकर निकले।
विश्वविद्यालय की वास्तविक पहचान इस बात से भी बनती है कि वहां से कितने नए विचार, शोध और सकारात्मक पहल समाज तक पहुंचती हैं।
यह संदेश उच्च शिक्षा की बदलती भूमिका को भी सामने रखता है।
आज विश्वविद्यालयों से केवल पारंपरिक शिक्षा प्रदान करने की अपेक्षा नहीं की जाती। उनसे शोध, नवाचार, उद्यमिता, सामाजिक जिम्मेदारी और स्थानीय समस्याओं के समाधान में योगदान की भी अपेक्षा की जाती है।
रांची विश्वविद्यालय जैसे पुराने और महत्वपूर्ण संस्थान के लिए यह जिम्मेदारी और भी बड़ी हो जाती है।
रांची विश्वविद्यालय की भूमिका को बताया महत्वपूर्ण
राज्यपाल ने कहा कि रांची विश्वविद्यालय झारखंड की शैक्षणिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण संस्थान है।
विश्वविद्यालय ने लंबे समय से राज्य में शिक्षा के विकास में योगदान दिया है। इसके साथ ही सामाजिक और बौद्धिक विकास में भी विश्वविद्यालय की भूमिका रही है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में रांची विश्वविद्यालय शिक्षा, शोध, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में अपनी भूमिका को और मजबूत करेगा।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा को नई दिशा देने में अग्रणी भूमिका निभाएगा।
यह संदेश विश्वविद्यालय के लिए केवल प्रशंसा नहीं बल्कि भविष्य की जिम्मेदारियों की ओर संकेत भी है।
युवाओं से अवसर तलाशने के बजाय अवसर बनाने की अपील
राज्यपाल ने विद्यार्थियों को विशेष रूप से कहा कि वे केवल अवसर तलाशने वाले न बनें, बल्कि अवसर सृजित करने वाले बनें।
आज रोजगार और करियर के क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। नई तकनीक, स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था और नवाचार ने युवाओं के सामने रोजगार के पारंपरिक विकल्पों के अलावा नए रास्ते भी खोले हैं।
ऐसे समय में विद्यार्थी यदि केवल सरकारी या निजी नौकरी की तलाश तक सीमित रहते हैं तो उनके विकल्प सीमित हो सकते हैं।
इसके विपरीत यदि वे अपनी शिक्षा और कौशल का इस्तेमाल नए व्यवसाय, स्टार्टअप, शोध परियोजना, सामाजिक उद्यम या तकनीकी समाधान तैयार करने में करें तो वे स्वयं के साथ दूसरों के लिए भी अवसर पैदा कर सकते हैं।
राज्यपाल का यह संदेश दीक्षांत समारोह में मौजूद विद्यार्थियों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
ज्ञान के साथ विवेक जरूरी
राज्यपाल ने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में केवल ज्ञान पर्याप्त नहीं है। ज्ञान के साथ विवेक भी जरूरी है।
आज इंटरनेट और डिजिटल तकनीक के कारण लोगों के पास जानकारी के अनगिनत स्रोत उपलब्ध हैं। विद्यार्थी कुछ ही सेकंड में किसी भी विषय पर हजारों जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन चुनौती यह है कि इनमें से कौन-सी जानकारी सही है, कौन-सी उपयोगी है और किस जानकारी का इस्तेमाल किस दिशा में किया जाना चाहिए।
ऐसे समय में विवेक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
राज्यपाल ने विद्यार्थियों को सही विकल्प चुनने और अपनी क्षमता का उचित दिशा में इस्तेमाल करने की सलाह दी।
सफलता में विनम्रता, असफलता में धैर्य रखें
दीक्षांत समारोह के मंच से राज्यपाल ने विद्यार्थियों को जीवन के व्यावहारिक पक्ष के बारे में भी संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि जीवन की परिस्थितियां हमेशा हमारी योजनाओं के अनुसार नहीं चलतीं। हर विद्यार्थी को जीवन में सफलता के साथ-साथ असफलता का सामना भी करना पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में सफलता मिलने पर अहंकार से बचना और असफलता आने पर निराश न होना जरूरी है।
उन्होंने विद्यार्थियों को सफलता में विनम्रता और असफलता में धैर्य बनाए रखने की सलाह दी।
उनके अनुसार गलतियों से सीखना और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध रहना ही आगे बढ़ने का रास्ता है।
यह संदेश विद्यार्थियों के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विश्वविद्यालय से निकलने के बाद उनके सामने प्रतिस्पर्धा और चुनौतियों का नया दौर शुरू होगा।
गलतियों से सीखने की आदत विकसित करें
राज्यपाल ने कहा कि व्यक्ति की सफलता केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि उसने कितनी बार सफलता हासिल की। महत्वपूर्ण यह भी है कि असफलताओं और गलतियों से उसने क्या सीखा।
यदि किसी प्रयास में सफलता नहीं मिलती है तो उसके कारणों को समझना जरूरी है।
गलती को छिपाने या उससे निराश होने के बजाय उससे सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए।
उन्होंने विद्यार्थियों से लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध रहने की अपील की। इसका मतलब यह नहीं है कि लक्ष्य पाने के लिए एक ही रास्ते पर अड़े रहना है, बल्कि आवश्यकता के अनुसार अपनी रणनीति बदलते हुए लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहना है।
शिक्षा में शोध और नवाचार को बढ़ावा जरूरी
राज्यपाल ने विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध और नवाचार को प्राथमिकता देने की बात कही।
आज किसी भी देश की प्रगति में शोध और innovation की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। नई तकनीक, चिकित्सा, कृषि, उद्योग, पर्यावरण, शिक्षा और सामाजिक विज्ञान जैसे क्षेत्रों में नए समाधान शोध से ही सामने आते हैं।
विश्वविद्यालय विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को ऐसा वातावरण प्रदान कर सकते हैं जहां वे नई समस्याओं की पहचान कर सकें और उनके समाधान विकसित कर सकें।
इसीलिए राज्यपाल ने विश्वविद्यालयों में ऐसे अकादमिक वातावरण की आवश्यकता बताई, जहां विद्यार्थी केवल विषयगत ज्ञान प्राप्त न करें बल्कि अपनी रचनात्मकता और नवाचार क्षमता भी विकसित करें।
विद्यार्थियों की रचनात्मक क्षमता को मिले प्रोत्साहन
हर विद्यार्थी की प्रतिभा अलग होती है। कोई शोध में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है, कोई तकनीक में, कोई कला-संस्कृति में तो कोई सामाजिक कार्य में।
विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी केवल पाठ्यक्रम पूरा करवाना नहीं है। विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा पहचानने और उसे विकसित करने के अवसर देना भी जरूरी है।
राज्यपाल ने इसी दिशा में विश्वविद्यालयों में बेहतर अकादमिक वातावरण विकसित करने पर जोर दिया।
ऐसे वातावरण में विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने, नए विचार रखने, प्रयोग करने और अपनी सोच विकसित करने का अवसर मिलना चाहिए।
पारदर्शिता और विद्यार्थी हित को सर्वोच्च प्राथमिकता
राज्यपाल ने कहा कि कुलाधिपति के रूप में उनका निरंतर प्रयास रहा है कि राज्य के विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक गुणवत्ता, शोध, पारदर्शिता और विद्यार्थियों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले।
यह विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण संदेश है।
उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता का अर्थ केवल प्रशासनिक प्रक्रिया को स्पष्ट रखना नहीं है। इसमें प्रवेश, परीक्षा, परिणाम, शोध, नियुक्ति, छात्र सुविधाओं और शिकायतों के समाधान जैसी प्रक्रियाओं में भी स्पष्टता और निष्पक्षता शामिल है।
विद्यार्थियों के हित को प्राथमिकता देने से विश्वविद्यालय में उनका विश्वास मजबूत होता है।
आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृति से जुड़े रहना जरूरी
राज्यपाल ने आधुनिक तकनीक और शिक्षा को अपनाने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, परंपराओं और मानवीय मूल्यों से जुड़े रहने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता विकास की गति देती है, जबकि हमारी संस्कृति और मूल्य हमें सही दिशा प्रदान करते हैं।

इसलिए आधुनिक तकनीक और परंपरागत मूल्यों के बीच संतुलन जरूरी है।
आज विद्यार्थी AI, डिजिटल तकनीक, इंटरनेट और नई वैज्ञानिक प्रणालियों से जुड़ रहे हैं। यह आधुनिक दुनिया की आवश्यकता है। लेकिन इसके साथ ईमानदारी, संवेदनशीलता, सम्मान, जिम्मेदारी और सामाजिक मूल्यों को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
आधुनिकता और मूल्यों के संतुलन से सार्थक विकास
राज्यपाल के अनुसार आधुनिकता और संस्कृति को एक-दूसरे का विरोधी नहीं समझना चाहिए।
तकनीक जीवन को आसान बना सकती है, लेकिन उसका उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाएगा, यह मानवीय मूल्यों से तय होता है।
इसी तरह आर्थिक विकास आवश्यक है, लेकिन उसका लाभ समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचना भी महत्वपूर्ण है।
इसलिए विकास की प्रक्रिया में तकनीकी क्षमता के साथ मानवीय संवेदनशीलता का होना जरूरी है।
राज्यपाल ने विद्यार्थियों को इसी संतुलित सोच के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया।
समाज के प्रति जिम्मेदारी को प्राथमिकता दें
दीक्षांत समारोह में राज्यपाल ने विद्यार्थियों को केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों पर ध्यान केंद्रित न करने की सलाह दी।
उन्होंने कहा कि जीवन में व्यक्तिगत सफलता महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।
एक डॉक्टर का दायित्व केवल अपनी पेशेवर सफलता तक सीमित नहीं होता। एक इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, वकील, उद्यमी या प्रशासनिक अधिकारी की भी समाज के प्रति जिम्मेदारी होती है।
इसी तरह अन्य क्षेत्रों में जाने वाले युवाओं को भी अपनी विशेषज्ञता का इस्तेमाल व्यापक जनहित में करने की कोशिश करनी चाहिए।
आपकी असली पहचान आपके कार्यों से बनेगी
राज्यपाल ने विद्यार्थियों से कहा कि भविष्य में उनकी पहचान केवल उनकी डिग्री या पद से नहीं बनेगी।
उनकी वास्तविक पहचान उनके कार्य, चरित्र, ईमानदारी, क्षमता और समाज के प्रति जिम्मेदारी से बनेगी।
एक अच्छी डिग्री करियर के लिए अवसर दे सकती है, लेकिन लंबे समय तक सम्मान बनाए रखने के लिए अच्छे कार्य और मजबूत चरित्र की आवश्यकता होती है।
इसीलिए उन्होंने विद्यार्थियों को जीवन में नैतिक मूल्यों को बनाए रखने का संदेश दिया।
डिग्री के बाद शुरू होती है वास्तविक जिम्मेदारी
दीक्षांत समारोह को आमतौर पर विद्यार्थी जीवन के अंत और पेशेवर जीवन की शुरुआत के रूप में देखा जाता है।
लेकिन राज्यपाल के संदेश में यह बात स्पष्ट रही कि डिग्री प्राप्त करना अंतिम लक्ष्य नहीं है।
अब विद्यार्थियों के सामने वास्तविक जीवन की चुनौतियां होंगी। उन्हें अपने निर्णय खुद लेने होंगे, अपने कौशल को लगातार विकसित करना होगा और बदलते समय के साथ खुद को तैयार करना होगा।
ऐसे में विश्वविद्यालय से मिली शिक्षा का वास्तविक उपयोग अब शुरू होगा।
युवाओं को लगातार सीखते रहने की जरूरत
आज तकनीक और रोजगार का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। एक विद्यार्थी जो कौशल आज सीखता है, संभव है कि कुछ वर्षों बाद उसी क्षेत्र में नई तकनीक आ जाए।
इसलिए विश्वविद्यालय से निकलने के बाद सीखने की प्रक्रिया समाप्त नहीं होनी चाहिए।
युवाओं को लगातार नई तकनीक, नई जानकारी और नए कौशल सीखते रहना होगा।
राज्यपाल का ज्ञान, विवेक, रचनात्मकता और नवाचार पर जोर इसी व्यापक सोच से जुड़ा है।
शोध से समाज को मिल सकते हैं नए समाधान
विश्वविद्यालयों में होने वाले शोध को समाज की वास्तविक समस्याओं से जोड़ना भी महत्वपूर्ण है।
झारखंड जैसे राज्य में कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, आदिवासी समाज, पर्यावरण, खनन, जल संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे कई क्षेत्रों में शोध की व्यापक संभावनाएं हैं।
यदि विश्वविद्यालयों में किए जाने वाले शोध स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हैं तो उनका सीधा लाभ समाज को मिल सकता है।
इसी कारण राज्यपाल ने विश्वविद्यालयों के शोध और नए विचारों को विकसित भारत की आधारशिला बताया।
रांची विश्वविद्यालय से भविष्य की अपेक्षाएं
राज्यपाल ने रांची विश्वविद्यालय से शिक्षा, शोध, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में अपनी भूमिका और मजबूत करने की अपेक्षा जताई।
यह विश्वविद्यालय के लिए एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है।
विश्वविद्यालय आने वाले समय में अपने अकादमिक कार्यक्रमों, शोध गतिविधियों, उद्योग-अकादमिक सहयोग, नवाचार और विद्यार्थियों के कौशल विकास पर अधिक ध्यान देकर राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान दे सकता है।
इसके साथ ही विश्वविद्यालय से निकलने वाले विद्यार्थियों को रोजगार योग्य बनाने के साथ उन्हें समाज की जरूरतों से जोड़ना भी महत्वपूर्ण होगा।
दीक्षांत समारोह केवल उत्सव नहीं, संकल्प का अवसर
दीक्षांत समारोह में डिग्री और उपाधि प्राप्त करना विद्यार्थियों के लिए उत्सव का अवसर होता है। लेकिन यह समारोह भविष्य के लिए संकल्प लेने का अवसर भी है।
उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए अब यह तय करना महत्वपूर्ण होगा कि वे अपनी शिक्षा का उपयोग किस दिशा में करेंगे।
क्या वे केवल व्यक्तिगत करियर पर ध्यान देंगे या अपने ज्ञान से समाज को भी कुछ देंगे?
क्या वे नौकरी की तलाश करेंगे या रोजगार पैदा करने के रास्ते तलाशेंगे?
क्या वे तकनीक को केवल व्यक्तिगत सुविधा के लिए इस्तेमाल करेंगे या सामाजिक समस्याओं के समाधान में भी उसका उपयोग करेंगे?
राज्यपाल का संबोधन इन सभी सवालों पर विद्यार्थियों को सोचने की प्रेरणा देता है।
विकसित भारत के लिए शिक्षा की भूमिका
भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में शिक्षा की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में से एक है।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से कुशल मानव संसाधन तैयार होता है। शोध से नई तकनीक और नए समाधान सामने आते हैं। नवाचार से नए उद्योग और रोजगार पैदा होते हैं।
विश्वविद्यालय इन सभी क्षेत्रों को जोड़ने का काम कर सकते हैं।
इसलिए विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने वाली संस्था तक सीमित नहीं रह सकती। उन्हें ज्ञान और नवाचार के केंद्र के रूप में विकसित करना होगा।
युवाओं से राष्ट्र निर्माण में भागीदारी का आह्वान
राज्यपाल ने उपाधि प्राप्त विद्यार्थियों से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि युवाओं की ऊर्जा, प्रतिभा और रचनात्मकता देश के लिए महत्वपूर्ण संसाधन है।
यदि इस ऊर्जा को सही दिशा मिलती है तो युवा नए व्यवसाय शुरू कर सकते हैं, शोध कर सकते हैं, तकनीकी समाधान तैयार कर सकते हैं और सामाजिक बदलाव में योगदान दे सकते हैं।
इसीलिए युवाओं को अपने करियर के साथ-साथ देश और समाज के भविष्य के बारे में भी सोचना चाहिए।
सफलता का अर्थ केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं
आज के समय में सफलता को अक्सर नौकरी, वेतन, पद या व्यक्तिगत उपलब्धियों से जोड़कर देखा जाता है।
लेकिन राज्यपाल के संदेश का व्यापक अर्थ यह है कि वास्तविक सफलता में सामाजिक योगदान भी शामिल होना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति अपने क्षेत्र में सफल है और साथ ही समाज के लिए सकारात्मक काम करता है, तो उसकी सफलता का प्रभाव अधिक व्यापक होता है।
इसीलिए विद्यार्थियों से व्यक्तिगत उपलब्धियों के साथ सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की गई।
ईमानदारी और चरित्र को न भूलें
करियर की दौड़ में कई बार युवा केवल सफलता हासिल करने पर ध्यान देते हैं। लेकिन लंबे समय में व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसके चरित्र और ईमानदारी से बनती है।
राज्यपाल ने विद्यार्थियों को याद दिलाया कि उनकी वास्तविक पहचान उनके कार्यों और चरित्र से बनेगी।
यह संदेश खास तौर पर उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अब प्रशासन, शिक्षा, चिकित्सा, कानून, तकनीक, उद्योग और अन्य पेशेवर क्षेत्रों में प्रवेश करने जा रहे हैं।
निष्कर्ष
रांची विश्वविद्यालय के 39वें दीक्षांत समारोह में राज्यपाल-सह-कुलाधिपति संतोष कुमार गंगवार का संबोधन विद्यार्थियों के लिए केवल शुभकामना संदेश नहीं रहा, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला संदेश भी रहा।
उन्होंने उपाधि प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को बधाई देते हुए कहा कि वे अपने ज्ञान और प्रतिभा का उपयोग समाज और राष्ट्र के विकास में करें। उन्होंने ‘विकसित भारत@2047’ के लक्ष्य में विश्वविद्यालयों और युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया।
राज्यपाल ने स्पष्ट किया कि विकसित भारत केवल आर्थिक समृद्धि से नहीं बनेगा। इसके लिए ज्ञान, विज्ञान, तकनीक, नवाचार, शिक्षा, संस्कृति और मानवीय मूल्यों से सशक्त समाज जरूरी है।
उन्होंने रांची विश्वविद्यालय को झारखंड की शैक्षणिक यात्रा का महत्वपूर्ण संस्थान बताते हुए शिक्षा, शोध, नवाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में उसकी भूमिका को और मजबूत करने की अपेक्षा जताई।
विद्यार्थियों को उन्होंने केवल अवसर तलाशने के बजाय अवसर पैदा करने वाला बनने की प्रेरणा दी। साथ ही ज्ञान के साथ विवेक, सफलता के साथ विनम्रता और असफलता के समय धैर्य बनाए रखने की सलाह दी।
उन्होंने आधुनिक शिक्षा और तकनीक को अपनाने के साथ अपनी संस्कृति, परंपरा और मानवीय मूल्यों से जुड़े रहने को भी जरूरी बताया। उनके अनुसार आधुनिकता विकास की गति देती है, जबकि संस्कृति और मूल्य सही दिशा प्रदान करते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह रहा कि विद्यार्थियों की असली पहचान उनकी डिग्री, पद या व्यक्तिगत उपलब्धि से नहीं, बल्कि उनके कार्य, चरित्र, ईमानदारी, क्षमता और समाज के प्रति जिम्मेदारी से बनेगी।
रांची विश्वविद्यालय के इस दीक्षांत समारोह से निकलने वाले विद्यार्थी अब अपने जीवन के नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं। ऐसे में राज्यपाल का संदेश उनके लिए एक स्पष्ट दिशा तय करता है—ज्ञान को कौशल में, कौशल को नवाचार में और नवाचार को समाज एवं राष्ट्र के विकास में बदलना ही शिक्षा की वास्तविक सार्थकता है।