RTC महाविद्यालय में हुई अखरा क्लास की सुरुआतRTC महाविद्यालय में हुई अखरा क्लास की सुरुआत

महाविद्यालय में हुई अखरा क्लास की सुरुआत

रांची (ओरमांझी): दड़दाग स्थित रामटहल चौधरी महाविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग ने झारखंड की समृद्ध माटी की खुशबू और पारंपरिक ज्ञान को सहेजने के लिए एक बेहद खूबसूरत व जीवंत पहल की है। महाविद्यालय परिसर में ‘अखरा क्लास’ की शुरुआत की गई है, जहाँ अब अध्ययन-अध्यापन केवल किताबों के पन्नों और बंद कमरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विद्यार्थी लोकगीत, लोकनृत्य और मांदर-ढोल की पारंपरिक थाप पर अपनी विरासत का व्यावहारिक पाठ सीखेंगे।

झारखंडी समाज में ‘अखरा’ महज एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि सदियों से सामूहिक चेतना, सामाजिक संवाद, गीत-संगीत और खुशियों की अभिव्यक्ति का जीवंत केंद्र रहा है। इसी सांस्कृतिक धड़कन को आधुनिक शिक्षा से जोड़ते हुए विभाग ने इसे एक रचनात्मक मंच का रूप दिया है। इस अनूठी क्लास में विद्यार्थियों को नागपुरी, खोरठा और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के लोकसाहित्य, लोककथाओं व लोकगाथाओं के साथ-साथ प्रकृति, कृषि, पर्व-त्योहारों और सामाजिक ताने-बाने की उस गहराई को समझने का अवसर मिलेगा, जो हमारी समृद्ध परंपरा का आधार हैं।

शुभारंभ के इस खास अवसर पर पूरा परिसर सांस्कृतिक उत्साह से सराबोर नजर आया। नागपुरी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर पप्पू कुमार महतो व प्रेमनाथ मुंडा, और खोरठा विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर टिकेश्वर चौधरी की गरिमामयी मौजूदगी ने विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया। प्रशिक्षक के तौर पर सोनू सपवार, प्रीतम महतो और राम बिहारी महतो ने पारंपरिक विधाओं की बारीकियों से अवगत कराया, वहीं पूजा, गायत्री, कंचन और माया समेत बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ अपनी लोक-संस्कृति को सीखने का संकल्प लिया।

इस मौके पर शिक्षकों ने बेहद भावुक और विचारणीय बात कही कि हमारी जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं केवल संवाद का साधन नहीं हैं, बल्कि इनके भीतर हमारे पूर्वजों का इतिहास, लोकज्ञान और सामूहिक स्मृतियां सुरक्षित हैं।

तेजी से बदलती आधुनिक जीवनशैली के बीच जहाँ कई मौखिक परंपराएं और लोककलाएं धुंधली पड़ रही हैं, ऐसे में यह पहल नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का एक सशक्त प्रयास है। विद्यार्थियों का भी मानना है कि जब किताबों में पढ़ी गई बातें गीत, संगीत और नृत्य के माध्यम से सामने आती हैं, तो सीखना न केवल आसान बल्कि अत्यंत आनंददायक हो जाता है।

भविष्य में इस मंच पर गांव-देहात के पारंपरिक कलाकारों, लोकगायकों और वाद्ययंत्र के उस्तादों को भी आमंत्रित किया जाएगा, जिससे स्थानीय कलाकारों को सम्मान और मंच मिलेगा तथा विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष रूप से कला सीखने का सौभाग्य प्राप्त होगा। निश्चित रूप से रामटहल चौधरी महाविद्यालय की यह पहल आने वाले समय में लोकभाषा और लोकसंस्कृति के अध्ययन का एक प्रेरणादायी और जीवंत केंद्र बनकर उभरेगी।

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