3 नवंबर को मोराबादी स्थित बापू वाटिका से निकलेगी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और अधिकारों की आवाज
झारखंड की समृद्ध भाषाई विरासत, लोकसंस्कृति और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने तथा जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण व संवर्धन के उद्देश्य से आगामी 3 नवंबर 2026 को रांची में एक ऐतिहासिक पहल होने जा रही है। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा के बैनर तले आयोजित होने वाली इस ‘सांस्कृतिक भाषा आंदोलन यात्रा’ की तैयारियां अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं। इसी कड़ी में रविवार को राजधानी रांची स्थित रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (TRL) विभाग में यात्रा की रूपरेखा को अंतिम रूप देने के लिए एक विशेष अभ्यास सत्र आयोजित किया गया।
इस अभ्यास सत्र के दौरान झारखंड की विभिन्न भाषाओं, पारंपरिक लोकगीतों, लोकनृत्यों, संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का पूर्वाभ्यास किया गया, ताकि आगामी 3 नवंबर को मोराबादी स्थित बापू वाटिका से निकलने वाली यह यात्रा अत्यंत अनुशासित, प्रभावशाली और जनभागीदारी से परिपूर्ण हो सके।
इस महत्वपूर्ण अभ्यास सत्र में झारखंड के पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की, सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. खलीक अहमद, डॉ. वृंदावन महतो, डॉ. दिनेश मणि, डॉ. सरस्वती गगराई और नौ भाषाओं के मुख्य संयोजक पप्पू कुमार महतो सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मौजूद शिक्षाविदों, भाषा प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक स्वर में इस बात पर जोर दिया कि झारखंड की भाषाई विविधता ही राज्य की असली और विशिष्ट पहचान है। इस पहचान को सहेज कर भावी पीढ़ी तक पहुंचाना आज के समय की सबसे बड़ी मांग है।
आयोजकों के अनुसार, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा के तत्वावधान में निकाली जाने वाली यह सांस्कृतिक भाषा आंदोलन यात्रा राज्य की नौ प्रमुख भाषाओं—कुड़माली/कुडमाली, नागपुरी, खोरठा, कुड़ुख, हो, मुंडारी, खड़िया, संताली और पंचपरगनिया—और उनसे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं को एक साझा मंच पर लाने का एक अनूठा प्रयास है। इस पहल का उद्देश्य केवल भाषाओं के शाब्दिक महत्व को रेखांकित करना भर नहीं है, बल्कि इनके शैक्षणिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और संस्थागत विकास के प्रति समाज में व्यापक जनजागरूकता पैदा करना है।
झारखंड की भाषाएं यहां के समुदायों के इतिहास, लोकज्ञान, रीति-रिवाजों, पर्व-त्योहारों, लोकगीतों, लोककथाओं और जीवन-दर्शन की सच्ची वाहक हैं। इन भाषाओं में पीढ़ियों का संचित ज्ञान और अनुभव निहित है, इसलिए इनका संरक्षण केवल बोलियों को बचाने का कार्य नहीं, बल्कि झारखंड की सांस्कृतिक विरासत, सामुदायिक स्मृति और ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने का एक बड़ा दायित्व है।
TRL विभाग में हुए रविवार के अभ्यास सत्र में यात्रा के दौरान प्रस्तुत किए जाने वाले पारंपरिक कार्यक्रमों और सामूहिक भागीदारी पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि विभिन्न भाषाई समूहों के प्रतिनिधि अपनी अनूठी सांस्कृतिक पहचान के साथ इस यात्रा का हिस्सा बनें और समाज तक एकता का एक मजबूत संदेश पहुंचाएं। उपस्थित वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से माना कि भाषाओं के संरक्षण के लिए केवल सरकारी नीतियां और योजनाएं कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकतीं।
इसके लिए समाज के हर वर्ग—शिक्षण संस्थानों, विश्वविद्यालयों, साहित्यकारों, कलाकारों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। जब तक इन भाषाओं का निरंतर प्रयोग घर-परिवार, विद्यालयों, महाविद्यालयों, साहित्य और सामाजिक संवाद में नहीं होगा, तब तक इनका दीर्घकालीन संरक्षण एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।
पूर्व शिक्षा मंत्री बंधु तिर्की की उपस्थिति ने भाषा और शिक्षा के अंतर्संबंधों पर संवाद को एक नई गहराई प्रदान की। वहीं, अन्य शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं की सहभागिता ने अकादमिक अध्ययन और सांस्कृतिक हस्तांतरण के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। नौ भाषाओं के मुख्य संयोजक पप्पू कुमार महतो और मोर्चा के अन्य प्रतिनिधियों ने सभी भाषाई समूहों के बीच बेहतर तालमेल और समन्वय स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई है।
भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं यहां की प्रकृति, कृषि, जंगल, जल, जमीन, पारंपरिक चिकित्सा और स्थानीय इतिहास के लोकज्ञान की मजबूत आधारशिला हैं। आधुनिकता की दौड़ और बदलती परिस्थितियों के बीच मातृभाषा आधारित शिक्षा, डिजिटल माध्यमों पर पाठ्यसामग्री के प्रसार और साहित्यिक सृजन को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
इस यात्रा के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया जा रहा है कि किसी भी एक भाषा का सम्मान या विकास किसी अन्य भाषा के विरोध में नहीं है, बल्कि सभी भाषाओं को समान गरिमा और अवसर देने में ही सबका हित निहित है।
अंततः, जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा बचाओ मोर्चा ने आगामी 3 नवंबर 2026 को रांची के मोराबादी स्थित बापू वाटिका में जुटने का आह्वान किया है। राज्यभर के साहित्यकारों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, कलाकारों और आम नागरिकों से अपील की गई है कि वे इस आंदोलन यात्रा में भारी संख्या में शामिल होकर झारखंड की भाषाई एकजुटता और सांस्कृतिक गौरव को एक नई ऊंचाई प्रदान करें।
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