युवाओं के कण्ठ में गूंजा झारखंड का लोक-स्वर: 'अखरा क्लास' में गूंजे अंगनई और करम के गीतयुवाओं के कण्ठ में गूंजा झारखंड का लोक-स्वर: 'अखरा क्लास' में गूंजे अंगनई और करम के गीत

रांची (ओरमांझी)। रामटहल चौधरी महाविद्यालय (दड़दाग) का जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग इन दिनों मिट्टी की सोंधी महक और लोक-संस्कृति की स्वर-लहरियों से सराबोर है। कॉलेज में चल रही ‘अखरा क्लास’ के तीसरे सप्ताह सैकड़ों विद्यार्थियों ने अपनी पारंपरिक धरोहर को करीब से जाना, समझा और जीया। इस विशेष सत्र में युवाओं को अंगनई और करम लोकगीतों का गहन व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।

कलाकारों से मिला लोक-विद्या का व्यावहारिक पाठ

प्रशिक्षण के दौरान जब बांसुरी की तान छिड़ी और मांदर की थाप गूंजी, तो पूरा परिसर झूम उठा।

  • गीतों का मर्म: प्रसिद्ध लोक गायिका जानकी देवी ने विद्यार्थियों को सुर-ताल की बारीकियां सिखाते हुए कहा, लोकगीत सिर्फ बहलाने या मनोरंजन का ज़रिया नहीं हैं; इनमें हमारी प्रकृति, कृषि, प्रेम, उत्सव और सामूहिकता की आत्मा बसती है।”
  • लय और ताल का समन्वय: लोक वादक व नर्तक दीनबंधु ठाकुर ने छात्र-छात्राओं को पारंपरिक लोकनृत्य, ताल-मात्रा और शारीरिक मुद्राओं (बॉडी लैंग्वेज) का अभ्यास कराया।
  • संगीत की जुगलबंदी: बांसुरी पर प्रीतम महतो और मांदर पर राम बिहारी महतो की जुगलबंदी ने पूरे माहौल में सांस्कृतिक ऊर्जा भर दी।

किताबी ज्ञान के साथ सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव जरूरी

महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. भीम महतो ने इस पहल को युवाओं को उनकी जड़ों से जोड़ने वाला ऐतिहासिक कदम बताया। उन्होंने कहा कि भावी पीढ़ी तक लोक-परंपराओं को सही रूप में पहुँचाने के लिए पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक कला-साधना बेहद आवश्यक है।

उत्साह का माहौल और सामूहिक अभ्यास

नागपुरी, खोरठा और कुड़माली विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर पप्पू कुमार महतो, टिकेश्वर चौधरी और प्रेमनाथ मुंडा के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने सामूहिक गायन और नृत्य का अभ्यास किया। छात्र-छात्राएँ (गायत्री, पूजा, कंचन, सुदेश, माया आदि) पूरे उत्साह के साथ अखरा के मैदान में पारंपरिक विधाओं को आत्मसात करते दिखे।

भविष्य की राह: अतीत की विरासत, कल की पहचान

अखरा क्लास का मूल संदेश यही है कि झारखंड की लोक-संस्कृति केवल पुरानी यादों का हिस्सा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की अस्मिता है। विभाग ने संकल्प दोहराया है कि आगामी सत्रों में अन्य लोकगीतों, नृत्यों और वाद्य-यंत्रों की कार्यशालाएँ आयोजित कर इस सांस्कृतिक यात्रा को और विस्तार दिया जाएगा।

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