रामटहल चौधरी महाविद्यालय में अखरा क्लास का दूसरा सप्ताह अंगनइ-झूमर, ताल-मात्रा एवं करम गीत को समर्पितरामटहल चौधरी महाविद्यालय में अखरा क्लास का दूसरा सप्ताह अंगनइ-झूमर, ताल-मात्रा एवं करम गीत को समर्पित

दड़दाग, ओरमांझी, रांची। रामटहल चौधरी महाविद्यालय, दड़दाग, ओरमांझी, रांची के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग द्वारा शुरू किए गए अखरा क्लास के दूसरे सप्ताह का आयोजन लोकगीत, लोकनृत्य एवं पारंपरिक संगीत की समृद्ध परंपरा को केंद्र में रखकर किया गया। दूसरे सप्ताह का प्रशिक्षण विशेष रूप से अंगनइ-झूमर, ताल-मात्रा एवं करम गीत पर केंद्रित रहा। कार्यक्रम में नागपुरी की सुप्रसिद्ध लोक गायिका जानकी देवी एवं लोक वादक-नर्तक दिनबंधु ठाकुर की अगुवाई में छात्र-छात्राओं को झारखंड की लोक सांस्कृतिक परंपराओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।


अखरा क्लास का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रखकर लोकभाषा, लोकसाहित्य, लोकसंगीत और लोकनृत्य की जीवंत परंपरा से जोड़ना है। इसी क्रम में दूसरे सप्ताह के कार्यक्रम में विद्यार्थियों को अंगनइ-झूमर की गायन एवं नृत्य शैली, ताल-मात्रा की बारीकियों तथा करम गीतों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से परिचित कराया गया।


प्रशिक्षण के दौरान जानकी देवी ने विद्यार्थियों को नागपुरी लोकगायन की विभिन्न शैलियों की जानकारी देते हुए अंगनइ-झूमर के गीतों को पारंपरिक तरीके से प्रस्तुत करने का अभ्यास कराया। उन्होंने गीतों में स्वर, लय, भाव और सामूहिक गायन के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि इनमें समाज के जीवन, प्रकृति, प्रेम, श्रम, पर्व-त्योहार और सामुदायिक भावना की गहरी अभिव्यक्ति होती है।


वहीं लोक वादक एवं नर्तक दिनबंधु ठाकुर ने विद्यार्थियों को झूमर नृत्य की विभिन्न गतिविधियों के साथ ताल और मात्रा की व्यावहारिक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लोकनृत्य में शरीर की गति के साथ ताल और लय का संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। विद्यार्थियों ने उनके मार्गदर्शन में स्वयं नृत्य एवं ताल का अभ्यास किया। इस दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों के प्रयोग तथा उनके साथ गीत और नृत्य के सामंजस्य को भी समझाया गया।
कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा करम गीत रहा। विद्यार्थियों को करम पर्व से जुड़े लोकगीतों की सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्ता के बारे में बताया गया। करम गीतों में प्रकृति, कृषि, भाई-बहन के संबंध, सामुदायिक जीवन तथा लोकविश्वासों की अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। विद्यार्थियों ने करम गीतों को सामूहिक रूप से सीखते हुए उसके भाव और लय को समझने का प्रयास किया।


इस अवसर पर नागपुरी के असिस्टेंट प्रोफेसर पप्पू कुमार महतो, प्रेमनाथ मुंडा, खोरठा विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर टिकेश्वर चौधरी सहित विभाग के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। शिक्षकों ने कहा कि अखरा क्लास के माध्यम से विद्यार्थियों को झारखंड की लोक परंपराओं को नजदीक से समझने का अवसर मिल रहा है। यह पहल भाषा और साहित्य के अध्ययन को लोकजीवन से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास है।


असिस्टेंट प्रोफेसर पप्पू कुमार महतो ने कहा कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं को समझने के लिए उनके लोक-सांस्कृतिक परिवेश को समझना जरूरी है। नागपुरी भाषा का विशाल लोक साहित्य गीत, संगीत, नृत्य और मौखिक परंपराओं में संरक्षित है। इसलिए अखरा क्लास विद्यार्थियों के लिए भाषा अध्ययन के साथ-साथ सांस्कृतिक अध्ययन का भी महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।


कॉलेज के प्राचार्य डॉ भीम महतो ने कहा कि अखरा झारखंडी समाज की सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। अखरा के माध्यम से पीढ़ियों से लोकज्ञान और परंपराएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही हैं। आज आवश्यकता है कि इस परंपरा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था से जोड़ते हुए नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।


टिकेश्वर चौधरी ने कहा कि झारखंड की क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण के लिए भाषा के साथ लोककला और लोकसंस्कृति का संरक्षण भी आवश्यक है। विद्यार्थियों को जब लोकगीत और लोकनृत्य का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण मिलता है, तो वे अपनी संस्कृति को अधिक गहराई से समझ पाते हैं।
अखरा क्लास के दूसरे सप्ताह में छात्र-छात्राओं ने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया। विद्यार्थियों ने अंगनइ-झूमर के गीत एवं नृत्य, ताल-मात्रा तथा करम गीत का अभ्यास किया। कार्यक्रम के दौरान शिक्षक, कलाकार और विद्यार्थी एक साथ अखरा की सांस्कृतिक भावना में सहभागी बने।


विभाग का मानना है कि अखरा क्लास भविष्य में लोकगीत, लोकनृत्य, लोकवाद्य, लोककथा, लोकगाथा एवं झारखंड की मौखिक परंपराओं के संरक्षण और अध्ययन का महत्वपूर्ण मंच बन सकता है। इस प्रकार की गतिविधियों से विद्यार्थियों में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान एवं गौरव की भावना विकसित होगी।


रामटहल चौधरी महाविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग की यह पहल झारखंड की समृद्ध लोक विरासत को शिक्षा से जोड़ने की दिशा में एक सराहनीय कदम है। अखरा क्लास के दूसरे सप्ताह में अंगनइ-झूमर, ताल-मात्रा और करम गीत के माध्यम से विद्यार्थियों ने न केवल लोककला सीखी, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का अनुभव भी प्राप्त किया।


इस कार्यक्रम को सफल बनाने में मांदर वादक राम बिहारी महतो बांसुरी वादक प्रीतम महतो एवं रांची विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कॉलर छात्र-छात्राओं का बहुमूल्य योगदान रहा।

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