लेखक – स्वास्थ्य विभाग में उप निदेशक हैं और आईईसी(प्रचार प्रसार) कोषांग के राज्य नोडल पदाधिकारी हैं।*

मान लीजिए आप दस-पंद्रह हजार रुपये का एक नया मोबाइल खरीदते हैं, तो उसे बॉक्स से निकालते ही सबसे पहले आप क्या करते हैं। हां, सबसे पहले उसके स्क्रीन पर टेम्पर्ड ग्लास लगवाते हैं और एक अच्छा सा मजबूत कवर ढूंढते हैं। पर क्यों? इसका उत्तर आप सबको बहुत अच्छे से पता है—मोबाइल की सुरक्षा के लिए, ताकि कहीं गलती से गिरकर मोबाइल के कीमती पार्ट्स डैमेज न हो जाएं और स्क्रीन पर कोई स्क्रैच न आ जाये। ठीक इसी तरह आप अपनी गाड़ी में पेट्रोल भरवाते समय हमेशा एक विश्वसनीय पेट्रोल पंप का चुनाव करते हैं। गाड़ी में इंजन ऑयल डलवाते समय ऑयल की क्वालिटी को लेकर कितना गूगल सर्च करते हैं, सारी जानकारी इकट्ठा करते हैं और तब जाकर किसी अच्छी कंपनी का ऑयल चुनते हैं। क्या आप कभी कोई घटिया या कचरा वाला इंजन ऑयल अपनी गाड़ी में डाल सकते हैं? इन सभी प्रश्नों का एक झटके में आपका उत्तर होगा नहीं। तो फिर सोचिए, जिस गाड़ी और मोबाइल की कीमत महज कुछ हजार या लाख रुपये है, उसकी सुरक्षा के लिए आप इतने सजग हैं, लेकिन ईश्वर ने जो आपको इतना बहुमूल्य और अनमोल शरीर दिया है, उसमें आप हर दिन तंबाकू और तंबाकू जनित जहरीला पदार्थ कैसे डाल देते हैं? गाड़ियों के पार्ट्स तो बाजार में दोबारा मिल जाएंगे, लेकिन इस इंसानी शरीर का कोई स्पेयर पार्ट नहीं मिलता। इसलिए मेरे देश के युवाओं, तुम जिंदगी चुनो—तम्बाकू नहीं।
हम सबको पता है कि हर साल 31 मई को पूरी दुनिया में विश्व तंबाकू निषेध दिवस यानी वर्ल्ड नो टोबैको डे मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साल 1987 में की थी। इस दिन का असली मकसद लोगों को तंबाकू के जानलेवा खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें इस लत को छोड़ने के लिए प्रेरित करना है। तंबाकू असल में एक पौधा है जिसकी पत्तियों में निकोटीन नाम का बेहद जहरीला पदार्थ होता है। यह निकोटीन दिमाग को बहुत तेज और झूठा नशा देता है, जिसकी एक बार आदत लग जाने पर इसे छोड़ना बेहद मुश्किल हो जाता है। हमारे देश में तंबाकू सिगरेट, बीड़ी, गुटखा, खैनी, जर्दा, हुक्का और पान मसाले के रूप में धड़ल्ले से खाया और पिया जाता है। आज के कई युवा इसे शुरुआत में महज एक स्टाइल या शौक समझकर अपनाते हैं, पर धीरे-धीरे यह उनकी जानलेवा लत बन जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में हर साल 80 लाख से ज्यादा लोग तंबाकू की वजह से मरते हैं। सबसे दुखद बात यह है कि इनमें से करीब 10 लाख लोग पैसिव स्मोकिंग यानी खुद धूम्रपान न करके भी दूसरों के छोड़े हुए धुएं की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं। तंबाकू मुंह, गले, फेफड़ों के कैंसर के साथ-साथ दिल का दौरा, ब्रेन स्ट्रोक, टीबी और सांस की गंभीर बीमारियों का सबसे बड़ा कारण है। आंकड़े गवाह हैं कि सिगरेट पीने वाले व्यक्ति की उम्र औसतन 10 साल कम हो जाती है, जबकि गुटखा-खैनी खाने से मुंह के अंदर ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस नामक सफेद दाग हो जाता है, जो आगे चलकर सीधे कैंसर में बदल जाता है। महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान तंबाकू के सेवन से बच्चे का वजन कम होने और समय से पहले जन्म का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।
अगर भारत की स्थिति पर नजर डालें तो यहाँ 27 करोड़ से ज्यादा लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन कर रहे हैं। हमारा देश दुनिया में तंबाकू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता बन चुका है, जहाँ हर साल करीब 13.5 लाख भारतीय तंबाकू की वजह से अपनी जान गंवा देते हैं। इसमें सबसे चिंता की बात यह है कि अब 10 से 15 साल के स्कूली बच्चे भी गुटखा और सिगरेट के आदी हो रहे हैं। स्कूलों के बाहर बिकने वाले सस्ते गुटखे की पुड़िया ने हमारी एक पूरी युवा पीढ़ी को बीमार बना दिया है। यदि विशेष रूप से झारखंड राज्य की बात की जाए, तो यहाँ की स्थिति राष्ट्रीय औसत से भी अधिक डरावनी है। झारखंड के ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में खैनी, जर्दा, गुटखा और दांतों में घिसे जाने वाले गुल का चलन बेहद आम है। यहाँ के श्रमजीवी वर्ग से लेकर युवाओं और महिलाओं तक में यह लत गहराई से बैठी हुई है। रांची, धनबाद, जमशेदपुर और बोकारो जैसे बड़े शहरों में कोचिंग सेंटरों और कॉलेजों के आसपास सिगरेट और फ्लेवर्ड हुक्के का क्रेज युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है। रांची के रिम्स और अन्य बड़े कैंसर अस्पतालों के आंकड़े साफ बताते हैं कि यहाँ आने वाले मुंह और गले के कैंसर के मरीजों में 80 प्रतिशत से अधिक मामले सीधे तौर पर गुटखा, खैनी और बीड़ी के सेवन से जुड़े होते हैं। झारखंड का एक बहुत बड़ा वर्ग अपनी गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा तंबाकू से होने वाली बीमारियों के इलाज में फूंक रहा है, जिससे अनगिनत परिवार कर्ज के दलदल में डूब रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन हर साल इस मुहिम को एक नई दिशा देने के लिए एक विशेष थीम तय करता है, और इस वर्ष की थीम अनमास्किंग द अपील यानी तंबाकू कंपनियों के झूठे विज्ञापन और आकर्षक पैकेजिंग का पर्दाफाश करना है। तंबाकू कंपनियां भली-भांति जानती हैं कि उनके पुराने ग्राहक गंभीर बीमारियों के कारण धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं, इसलिए उन्हें नए ग्राहकों के रूप में हमारे देश के युवाओं की जरूरत है। इसके लिए वे आकर्षक पैकेजिंग, नए-नए फ्लेवर्स, ई-सिगरेट और वेप जैसी चीजों को पूरी तरह से सुरक्षित और मॉडर्न बताकर युवाओं को अपने जाल में फंसाती हैं, जबकि हकीकत यह है कि ये चीजें भी उतनी ही खतरनाक और जानलेवा हैं। हालांकि तंबाकू छोड़ना थोड़ा मुश्किल जरूर है, पर दृढ़ निश्चय और सही प्रयासों से यह बिल्कुल मुमकिन है। इसके लिए सबसे पहले एक मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। तंबाकू की तलब उठने पर निकोटीन पैच, निकोटीन च्युइंग गम और डॉक्टरों की सलाह से धीरे-धीरे इस लत से पूरी तरह छुटकारा पाया जा सकता है। सरकार ने भी कोटपा कानून बनाकर सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान को पूरी तरह प्रतिबंधित किया है और सिगरेट के पैकेटों पर छपने वाली डरावनी तस्वीरें भी इसी जागरूकता का एक हिस्सा हैं। इस विश्व तंबाकू निषेध दिवस पर हम सबको मिलकर यह संकल्प लेना होगा कि न तो हम खुद कभी तंबाकू खाएंगे और न ही अपने किसी परिचित या दोस्त को इसका सेवन करने देंगे। यदि कोई दोस्त या परिवार का सदस्य इसका आदी है, तो उसे डांटने या डांटने के बजाय प्यार से समझाएं और उसे अहसास दिलाएं कि उसकी जिंदगी उसके पूरे परिवार के लिए कितनी अनमोल है। हमेशा याद रखें कि एक दिन बिना तंबाकू के, आपकी जिंदगी के कई साल बढ़ा सकता है। हमारा स्वस्थ शरीर ही हमारी असली दौलत है, इसलिए तंबाकू छोड़ो और जीवन जोड़ो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You missed

*दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण, पत्नी श्रीमती रूपी सोरेन ने ग्रहण किया सम्मान*झारखंड की धरती के महान जननायक और आदिवासी अस्मिता के प्रतीक दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मरणोपरांत देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्म भूषण से नवाजा गया। यह सम्मान उनके दीर्घकालिक सामाजिक, राजनीतिक और आदिवासी अधिकारों के संघर्ष को मान्यता देता है। नई दिल्ली के राष्ट्रपति भवन  में आयोजित गरिमामय समारोह में उनकी पत्नी श्रीमती रूपी सोरेन ने यह सम्मान ग्रहण किया।शिबू सोरेन ने झारखंड आंदोलन के प्रमुख वास्तुकार होने के साथ-साथ आदिवासी समाज के हक, जल-जंगल-जमीन की रक्षा और सामाजिक न्याय के लिए जीवनभर संघर्ष किया। उनके योगदान ने न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश में वंचित समुदायों को सशक्त करने की राह दिखाई।सम्मान ग्रहण करते हुए रूपी सोरेन भावुक दिखीं और उन्होंने इसे पूरे झारखंड एवं आदिवासी समाज के लिए गर्व का क्षण बताया। इस अवसर पर देशभर के राजनीतिक और सामाजिक नेताओं ने दिशोम गुरु को सम्मान अर्पित करते हुए उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।सम्मान समारोह में माननीय गन्दे विधायक श्रीमती कल्पना सोरेन भी मौजूद रहीं। यह सम्मान शिबू सोरेन के संघर्षमय जीवन और उनके आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बनेगा।

जीआई के क्षेत्र में झारखंड ने मजबूत की अपनी उपस्थिति; राज्य के 11 नए उत्पादों को मिला जीआई टैग======*झारखंड सरकार राज्य की अनूठी कला, शिल्प, कृषि उत्पादों और पारंपरिक वस्तुओं को पहचान दिलाने, उन्हें सुरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। इसी दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए, जीआई रजिस्ट्री ने हाल ही में राज्य के 11 और महत्वपूर्ण उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्रदान किया है।  इन पहलों का मुख्य उद्देश्य झारखंड के पारंपरिक उत्पादों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करना, बाजार में उनकी पहचान बढ़ाना और उन्हें राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर स्थापित करना है।  *ये हैं जीआई क्लब में शामिल**झारखंड के ये उत्पाद हुए जीआई (GI) क्लब में शामिल*हाल ही में जिन उत्पादों को जीआई दर्जा दिया गया है, उनमें कुचाई सिल्क साड़ी और कपड़े, भगैया साड़ी और कपड़े, दुमका चादर बदोनी पुतुल (कठपुतली), झारखंड पंछी परहान पंछी साड़ी और कपड़े, झारखंड की टसर सिल्क साड़ियाँ और कपड़े, झारखंड डोकरा क्राफ्ट (धातु शिल्प)   झारखंड के आदिवासी आभूषण (Tribal Jewellery), झारखंड के बांस शिल्प (Bamboo Crafts), केसरिया कलाकंद, झारखंड बेनाम और झारखंड जादुपटुआ पेंटिंग् शामिल हैं। इन सभी नए जीआई टैगों का आधिकारिक प्रकाशन अगले कुछ दिनों में कर दिया जाएगा। वर्ष 2019 तक झारखंड के पास केवल एक जीआई-टैग उत्पाद (सोहराई और खोवर पेंटिंग) था, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 12 हो गई है, जो जीआई परिदृश्य में राज्य की बढ़ती ताकत को दर्शाता है।*झारक्राफ्ट की बड़ी उपलब्धि*उद्योग विभाग, झारखंड सरकार के तहत कार्यरत झारक्राफ्ट और मुख्यमंत्री लघु एवं कुटीर उद्यम विकास बोर्ड वर्ष 2019 से ही जीआई पंजीकरण गतिविधियों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रहे हैं। इसी प्रयास के तहत एक उल्लेखनीय मील का पत्थर तब हासिल हुआ, जब झारक्राफ्ट ने एक साथ तीन उत्पादों झारखंड की टसर सिल्क साड़ियाँ और कपड़े, झारखंड के आदिवासी आभूषण और झारखंड के बांस शिल्प  के लिए जीआई पंजीकरण सुरक्षित किया है। ये पंजीकरण झारखंड के कारीगरों और पारंपरिक समुदायों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों की दृश्यता, प्रामाणिकता और बाजार क्षमता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएंगे। *अन्य उत्पाद भी हैं कतार में*झारखंड की यह जीआई यात्रा राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर चुकी है। इसके अतिरिक्त, कई अन्य अनूठे उत्पादों के आवेदन भी जीआई रजिस्ट्री में जमा किए गए हैं, इनमें मांदर, प्यतकर पेंटिंग, निमुचा/करनी शॉल, लाह की चूड़ियाँ, देवघर पेड़ा, रागी, रुगड़ा, धुस्का, कुसुमी लाहा, साल के बीज, महुआ का फूल और करंज के बीज शामिल हैं। राज्य में अभी भी कई और स्वदेशी उत्पादों को जीआई ढांचे के तहत लाने और राष्ट्रीय व वैश्विक बाजारों में उन्हें सही पहचान दिलाने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं।===========================