रांची/झारखंड: त्योहारों का मौसम आते ही बाजारों में खरीदारी की रौनक बढ़ जाती है। दिवाली जैसे बड़े त्योहारों पर लोग अपने घरों के लिए टीवी, फ्रिज, फर्नीचर, मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने की योजना बनाते हैं। इसी दौरान ऑनलाइन शॉपिंग और सोशल मीडिया पर मिलने वाले आकर्षक ऑफर्स भी लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। कंपनियों और दुकानदारों की ओर से भारी छूट, कैशबैक और मुफ्त उपहार के विज्ञापन देखकर ग्राहक कम कीमत में बेहतर सामान खरीदने की उम्मीद करते हैं। लेकिन इसी उम्मीद का फायदा अब साइबर अपराधी उठा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर 70 से 80 प्रतिशत तक छूट, मुफ्त गिफ्ट, कैशबैक और बेहद कम कीमत पर महंगे सामान देने का लालच देकर लोगों को साइबर ठगी का शिकार बनाया जा रहा है। अपराधी फर्जी विज्ञापन और नकली वेबसाइट के माध्यम से ग्राहकों को अपने जाल में फंसाते हैं। इसके बाद उन्हें व्हाट्सऐप पर APK फाइल भेजी जाती है या किसी अनजान लिंक पर क्लिक करने के लिए कहा जाता है। जैसे ही व्यक्ति उस फाइल को डाउनलोड करता है या संदिग्ध लिंक के निर्देशों का पालन करता है, उसके मोबाइल की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। कुछ मामलों में साइबर अपराधी मोबाइल में मौजूद बैंकिंग से जुड़ी जानकारी तक पहुंच बनाकर खाते से रकम निकाल लेते हैं।
अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, झारखंड में दिवाली ऑफर के नाम पर साइबर ठगी के कई मामले सामने आए हैं। एक मामले में APK फाइल भेजकर पीड़ित के बैंक खाते से लगभग 2.99 लाख रुपये की अवैध निकासी कर ली गई। वहीं, दूसरे मामलों में लोगों को टीवी, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर भारी छूट तथा मुफ्त उपहार देने का झांसा दिया गया।
इन घटनाओं ने एक बार फिर ऑनलाइन खरीदारी करने वाले ग्राहकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। साइबर अपराधी अब केवल बैंक अधिकारी या सरकारी कर्मचारी बनकर ही लोगों को निशाना नहीं बना रहे, बल्कि त्योहारों की खरीदारी और आकर्षक ऑफर्स को भी ठगी का माध्यम बना रहे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि फर्जी विज्ञापन इतने आकर्षक तरीके से तैयार किए जाते हैं कि आम ग्राहक और असली ऑफर के बीच अंतर नहीं कर पाते। कई बार विज्ञापन में प्रसिद्ध कंपनियों के नाम, उत्पादों की तस्वीरें और आकर्षक डिस्काउंट का इस्तेमाल किया जाता है। ग्राहक को लगता है कि उसे किसी बड़ी कंपनी की ओर से विशेष त्योहार ऑफर दिया जा रहा है, जबकि वास्तव में उसके पीछे साइबर अपराधियों का नेटवर्क सक्रिय होता है।
दिवाली ऑफर के नाम पर कैसे चल रहा है साइबर ठगी का खेल?
त्योहारों के दौरान साइबर अपराधी लोगों की खरीदारी की आदतों और उनकी जरूरतों को समझकर ठगी की योजना बनाते हैं। दिवाली पर ज्यादातर परिवार नए इलेक्ट्रॉनिक सामान और घरेलू उपयोग की वस्तुएं खरीदना चाहते हैं। इसी वजह से अपराधी टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन, मोबाइल, लैपटॉप और फर्नीचर पर भारी छूट देने वाले विज्ञापन तैयार करते हैं।
इन विज्ञापनों में 50, 60, 70 और यहां तक कि 80 प्रतिशत तक छूट का दावा किया जाता है। कुछ विज्ञापनों में कहा जाता है कि सीमित समय के लिए विशेष ऑफर उपलब्ध है। वहीं, कुछ में मुफ्त गिफ्ट और कैशबैक देने की बात कही जाती है।
ग्राहक जब इस विज्ञापन को देखते हैं, तो कम कीमत पर महंगा सामान मिलने की उम्मीद में दिए गए लिंक पर क्लिक कर देते हैं। कई बार उन्हें एक ऐसी वेबसाइट पर भेजा जाता है, जो देखने में किसी प्रसिद्ध ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म जैसी लगती है।
वेबसाइट पर उत्पाद की तस्वीर, कीमत, ऑफर और भुगतान का विकल्प भी दिया जाता है। इससे ग्राहक को भरोसा हो जाता है कि वह किसी वास्तविक कंपनी की वेबसाइट पर खरीदारी कर रहा है।
इसके बाद ग्राहक से नाम, मोबाइल नंबर, पता और भुगतान से संबंधित जानकारी मांगी जाती है। कुछ मामलों में व्हाट्सऐप के माध्यम से APK फाइल भेजी जाती है और उसे इंस्टॉल करने के लिए कहा जाता है।
जैसे ही ग्राहक बिना जांच किए फाइल इंस्टॉल करता है, उसके मोबाइल में खतरनाक सॉफ्टवेयर सक्रिय हो सकता है। यह सॉफ्टवेयर मोबाइल की कुछ संवेदनशील जानकारियों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर सकता है।
यदि ग्राहक को मोबाइल में बैंकिंग से संबंधित कोई संदिग्ध गतिविधि दिखाई नहीं देती, तो भी उसके खाते से पैसे निकलने का खतरा बना रह सकता है।
यही वजह है कि साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ लगातार सलाह देते हैं कि किसी भी अनजान व्यक्ति या वेबसाइट की ओर से भेजी गई APK फाइल को डाउनलोड नहीं करना चाहिए।
चार मामलों से समझें साइबर ठगी का पूरा तरीका
अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट में चार अलग-अलग घटनाओं के माध्यम से बताया गया है कि साइबर अपराधी किस तरह त्योहारों के ऑफर का इस्तेमाल करके लोगों को ठगी का शिकार बना रहे हैं।
इन मामलों में टीवी, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक सामान और कैशबैक जैसे लालच का इस्तेमाल किया गया। हर मामले में ठगी का तरीका थोड़ा अलग था, लेकिन सभी में ग्राहकों को आकर्षक ऑफर के माध्यम से अपने जाल में फंसाने की कोशिश की गई।
केस-1: 80 प्रतिशत छूट का ऑफर देकर खाते से उड़ाए पैसे
पहले मामले में एक व्यक्ति को दिवाली के दौरान सोशल मीडिया पर आकर्षक ऑफर का विज्ञापन दिखाई दिया। विज्ञापन में टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान पर भारी छूट देने का दावा किया गया था।
विज्ञापन में कहा गया था कि ग्राहकों को सामान्य बाजार कीमत की तुलना में काफी कम रकम में सामान खरीदने का अवसर मिल सकता है।
पीड़ित को यह ऑफर वास्तविक लगा। उसने विज्ञापन में दिए गए लिंक पर क्लिक किया और ऑनलाइन खरीदारी करने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
इसके बाद उससे भुगतान करने के लिए कहा गया। ग्राहक ने ऑफर का लाभ लेने की उम्मीद में ऑनलाइन भुगतान कर दिया।
लेकिन भुगतान करने के बाद भी उसे सामान नहीं मिला। कुछ समय बाद संबंधित वेबसाइट और सोशल मीडिया पेज से संपर्क करना मुश्किल हो गया। ग्राहक को तब समझ आया कि वह फर्जी विज्ञापन के जाल में फंस चुका है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि साइबर अपराधियों ने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए 80 प्रतिशत तक छूट का दावा किया था।
आमतौर पर किसी बड़े ब्रांड के महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामान पर इतनी भारी छूट देखकर ग्राहकों को सावधान हो जाना चाहिए। विशेषकर तब, जब विज्ञापन किसी अनजान सोशल मीडिया अकाउंट या व्हाट्सऐप नंबर से आया हो।
केस-2: इलेक्ट्रॉनिक सामान के साथ ऑफर ने लगाया चूना
दूसरे मामले में एक महिला दिवाली के लिए नया टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने की योजना बना रही थी।
इसी दौरान उसे सोशल मीडिया पर एक आकर्षक विज्ञापन दिखाई दिया। इसमें ब्रांडेड सामान पर भारी छूट देने का दावा किया गया था।
विज्ञापन में सीमित समय के लिए ऑफर उपलब्ध होने की बात कही गई थी। ग्राहक को बताया गया कि यदि वह जल्दी ऑर्डर करती है, तो उसे कम कीमत पर सामान मिल सकता है।
महिला ने विज्ञापन में दिए गए नंबर पर संपर्क किया। बातचीत के दौरान उसे बताया गया कि ऑफर का लाभ लेने के लिए ऑनलाइन भुगतान करना होगा।
उसने बताए गए खाते में लगभग 9 हजार रुपये ट्रांसफर कर दिए।
लेकिन भुगतान करने के बाद न तो उसे सामान मिला और न ही पैसे वापस किए गए। कुछ समय बाद संबंधित व्यक्ति ने संपर्क करना बंद कर दिया।
इस घटना से स्पष्ट होता है कि साइबर अपराधी केवल बड़ी रकम पर ही निशाना नहीं साधते। वे छोटी-छोटी खरीदारी के नाम पर भी लोगों से पैसे ठगते हैं।
कई बार ग्राहक सोचते हैं कि केवल कुछ हजार रुपये का ही भुगतान करना है, इसलिए ज्यादा जांच करने की जरूरत नहीं है। अपराधी इसी मानसिकता का फायदा उठाते हैं।
केस-3: फर्नीचर खरीदने के साथ महंगे गिफ्ट का लालच
तीसरे मामले में साइबर अपराधियों ने फर्नीचर खरीदने की योजना बना रहे एक व्यक्ति को निशाना बनाया। त्योहार के समय घर को नया रूप देने के लिए लोग सोफा, बेड, डाइनिंग टेबल, अलमारी और अन्य फर्नीचर खरीदते हैं। इसी जरूरत का फायदा उठाकर अपराधियों ने आकर्षक ऑफर तैयार किया।
पीड़ित को सोशल मीडिया पर एक विज्ञापन दिखाई दिया, जिसमें फर्नीचर खरीदने पर महंगे गिफ्ट देने का दावा किया गया था। विज्ञापन में बताया गया था कि ग्राहक को खरीदारी के साथ एक आकर्षक टीवी भी मुफ्त दिया जाएगा।
यह ऑफर देखने में काफी फायदेमंद लग रहा था। पीड़ित ने विज्ञापन में दिए गए नंबर पर संपर्क किया और सामान की बुकिंग कराने की बात कही।
बातचीत के दौरान उससे ऑनलाइन भुगतान करने के लिए कहा गया। ग्राहक ने बताए गए तरीके से भुगतान कर दिया। लेकिन भुगतान के बाद सामान की डिलीवरी नहीं हुई।
जब उसने संबंधित व्यक्ति से दोबारा संपर्क करने की कोशिश की, तो उसका फोन बंद मिला। इसके बाद पीड़ित को समझ आया कि मुफ्त टीवी और फर्नीचर का ऑफर केवल उसे ठगने के लिए तैयार किया गया था।
इस तरह के मामलों में अपराधी ग्राहक को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उसे एक खरीदारी में दो फायदे मिल रहे हैं। ग्राहक को लगता है कि वह फर्नीचर भी खरीद रहा है और साथ में महंगा गिफ्ट भी प्राप्त कर रहा है।
लेकिन वास्तव में ऐसे विज्ञापनों का उद्देश्य केवल ग्राहक से पैसे लेना होता है।
केस-4: कैशबैक के लिए APK फाइल भेजकर खाते से 2.99 लाख रुपये निकाले
चौथे मामले में साइबर ठगी का तरीका और भी गंभीर बताया गया है। इस घटना में दिवाली स्पेशल ऑफर और कैशबैक का लालच देकर एक व्यक्ति को निशाना बनाया गया।
अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, बेंड़ो के शिव कच्छप को व्हाट्सऐप पर दिवाली स्पेशल ऑफर का संदेश मिला था। संदेश में खरीदारी पर भारी छूट और कैशबैक देने का दावा किया गया था।
साथ ही ऑफर का लाभ लेने के लिए एक APK फाइल भेजी गई थी। पीड़ित ने लिंक पर क्लिक करके फाइल डाउनलोड कर ली। इसके बाद उसके मोबाइल की सुरक्षा प्रभावित हुई और साइबर अपराधियों ने उसके बैंक खाते तक पहुंच बनाने की कोशिश की।
रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर अपराधियों ने पीड़ित के बैंक खाते से 2.99 लाख रुपये की अवैध निकासी कर ली।
इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि एक अनजान फाइल डाउनलोड करना कितना महंगा पड़ सकता है। कई बार लोग सोचते हैं कि किसी ऑफर की जानकारी देखने या कैशबैक प्राप्त करने के लिए मोबाइल में एक ऐप इंस्टॉल करना सामान्य बात है। लेकिन यदि वह ऐप किसी अज्ञात स्रोत से आया है, तो वह खतरनाक साबित हो सकता है।
APK फाइल एंड्रॉयड मोबाइल में ऐप इंस्टॉल करने का एक पैकेज होता है। हर APK फाइल वायरस नहीं होती, लेकिन अनजान वेबसाइट या व्यक्ति से मिली फाइल में मैलवेयर हो सकता है। ऐसा सॉफ्टवेयर मोबाइल के संवेदनशील डेटा तक पहुंचने का प्रयास कर सकता है।
इसीलिए किसी भी अनजान नंबर से आई APK फाइल को डाउनलोड नहीं करना चाहिए।
साइबर अपराधियों का नया हथियार बन रहा है APK फाइल
ऑनलाइन ठगी के तरीकों में APK फाइल का इस्तेमाल तेजी से चिंता का विषय बन रहा है। पहले साइबर अपराधी लोगों को फोन करके बैंक अधिकारी, बिजली विभाग का कर्मचारी या सरकारी अधिकारी होने का दावा करते थे। वे लोगों से बैंक खाते की जानकारी और ओटीपी मांगते थे।
लेकिन अब अपराधियों ने मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से ठगी करने के तरीके भी अपना लिए हैं।
APK का पूरा नाम Android Package Kit है। यह एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम में एप्लिकेशन इंस्टॉल करने के लिए इस्तेमाल होने वाला फाइल फॉर्मेट है।
जब कोई व्यक्ति गूगल प्ले स्टोर से ऐप डाउनलोड करता है, तो सामान्य तौर पर ऐप की स्थापना एक नियंत्रित प्रक्रिया के माध्यम से होती है। लेकिन इंटरनेट या व्हाट्सऐप से APK फाइल डाउनलोड करके इंस्टॉल करने पर अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है।
साइबर अपराधी फर्जी ऐप बनाकर उन्हें बैंकिंग अपडेट, सरकारी योजना, त्योहार के ऑफर, शादी के निमंत्रण, बिजली बिल और अन्य सेवाओं के नाम से भेज सकते हैं।
यदि व्यक्ति बिना जांच किए ऐप इंस्टॉल कर लेता है और उसे संवेदनशील अनुमतियां दे देता है, तो मोबाइल में मौजूद जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है।
कुछ खतरनाक ऐप एसएमएस पढ़ने, नोटिफिकेशन देखने, स्क्रीन की गतिविधियों तक पहुंच बनाने और अन्य संवेदनशील सुविधाओं का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।
इससे बैंकिंग ओटीपी और निजी जानकारी चोरी होने का खतरा बढ़ जाता है।
इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) से संबंधित सरकारी साइबर सुरक्षा सलाह में भी संदिग्ध APK और सोशल मीडिया विज्ञापनों के माध्यम से फैलाए जा रहे मैलवेयर के खतरों को लेकर चेतावनी दी गई है। Technology News – The Indian Express+1
मोबाइल हैक होने के बाद साइबर अपराधी कैसे निकालते हैं पैसे?
किसी व्यक्ति का मोबाइल साइबर अपराधियों के नियंत्रण में पहुंचने के बाद कई तरह के नुकसान हो सकते हैं।
सबसे पहले अपराधी मोबाइल में मौजूद संवेदनशील जानकारी तक पहुंच बनाने का प्रयास करते हैं। इसमें निजी संदेश, संपर्क नंबर, बैंकिंग से जुड़े संदेश और अन्य जानकारी शामिल हो सकती है।
कुछ खतरनाक ऐप उपयोगकर्ता से Accessibility Permission यानी विशेष एक्सेस की अनुमति मांगते हैं। इस अनुमति का गलत इस्तेमाल करके अपराधी मोबाइल की स्क्रीन पर होने वाली गतिविधियों को देखने या कुछ कार्यों को नियंत्रित करने की कोशिश कर सकते हैं।
इसके बाद वे बैंकिंग एप्लिकेशन और डिजिटल भुगतान से संबंधित गतिविधियों को निशाना बना सकते हैं।
हालांकि, हर APK फाइल इंस्टॉल करने से बैंक खाता अपने आप खाली नहीं होता। ठगी का तरीका ऐप की क्षमता, मांगी गई अनुमतियों, मोबाइल की सुरक्षा और उपयोगकर्ता द्वारा साझा की गई जानकारी पर निर्भर करता है।
कई मामलों में अपराधी पीड़ित को स्वयं भुगतान करने के लिए भी तैयार कर लेते हैं। वे कैशबैक, रिफंड या ऑफर एक्टिवेट करने के नाम पर UPI PIN डालने के लिए कहते हैं।
लोगों को यह समझना जरूरी है कि UPI PIN पैसे प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि अपने खाते से भुगतान या अन्य अधिकृत लेनदेन करने के लिए दर्ज किया जाता है।
यदि कोई व्यक्ति कैशबैक देने के नाम पर UPI PIN मांगता है, तो उसे तुरंत संदिग्ध समझना चाहिए।
सोशल मीडिया विज्ञापन भी बन सकते हैं साइबर ठगी का माध्यम
आज फेसबुक, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल मनोरंजन के साधन नहीं रह गए हैं। इनका इस्तेमाल छोटे-बड़े व्यापारी अपने उत्पाद बेचने और ग्राहकों तक पहुंचने के लिए भी करते हैं।
यही वजह है कि लोग सोशल मीडिया पर मिलने वाले विज्ञापनों को खरीदारी का एक सामान्य माध्यम मानने लगे हैं।
साइबर अपराधी इसी विश्वास का फायदा उठाते हैं।
वे प्रसिद्ध कंपनियों के लोगो, उत्पादों की तस्वीरें और आकर्षक डिजाइन का इस्तेमाल करके नकली विज्ञापन तैयार करते हैं। कई बार फर्जी पेज का नाम भी वास्तविक कंपनी से मिलता-जुलता रखा जाता है।
विज्ञापन में लिखा जाता है कि दिवाली के अवसर पर सीमित समय के लिए विशेष छूट दी जा रही है। कुछ मामलों में मुफ्त गिफ्ट और कैशबैक की जानकारी देकर ग्राहकों को जल्दी भुगतान करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
ग्राहक जब ऑफर की जानकारी प्राप्त करने के लिए लिंक खोलता है, तो उसे नकली वेबसाइट पर भेज दिया जाता है।
ऐसी वेबसाइट पर उत्पाद की कीमत वास्तविक बाजार मूल्य से काफी कम दिखाई जाती है। इससे ग्राहक को लगता है कि उसे बहुत अच्छा सौदा मिल रहा है।

लेकिन भुगतान के बाद न सामान मिलता है और न ही विक्रेता से संपर्क हो पाता है।
भारत में दिवाली 2026 के दौरान नकली शॉपिंग ऐप और फर्जी ऑफर के ऐसे मामलों को लेकर भी रिपोर्टें सामने आई हैं। इंडिया टुडे की 28 अक्टूबर 2026 की फैक्ट चेक रिपोर्ट में नकली Flipkart और Meesho ऐप के जरिए लोगों को आकर्षित करने के तरीकों का उल्लेख किया गया है। India Today+1
80 प्रतिशत तक छूट का दावा देखकर क्यों हो जाएं सतर्क?
त्योहारों में ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियां वास्तव में छूट देती हैं। कई बार इलेक्ट्रॉनिक सामान, कपड़े, फर्नीचर और घरेलू उत्पादों पर अच्छे ऑफर मिलते हैं।
लेकिन हर छूट वास्तविक नहीं होती।
यदि किसी अनजान वेबसाइट पर महंगे टीवी, मोबाइल या लैपटॉप पर 80 प्रतिशत छूट का दावा किया जा रहा है, तो ग्राहक को तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए।
साइबर अपराधी जानते हैं कि लोग कम कीमत पर अच्छी चीज खरीदना चाहते हैं। इसी वजह से वे सामान्य बाजार मूल्य से बहुत कम कीमत दिखाते हैं।
ग्राहक को लगता है कि यदि उसने तुरंत खरीदारी नहीं की तो ऑफर समाप्त हो जाएगा। इस जल्दबाजी में वह वेबसाइट की जांच किए बिना भुगतान कर देता है।
इसलिए किसी भी आकर्षक ऑफर पर भरोसा करने से पहले कुछ जरूरी बातें जांचनी चाहिए।
- वेबसाइट का पूरा पता और डोमेन नाम देखें।
- कंपनी के आधिकारिक ऐप या वेबसाइट पर वही ऑफर उपलब्ध है या नहीं, जांचें।
- सोशल मीडिया पेज की वास्तविकता और उसकी गतिविधियों को देखें।
- विक्रेता का नाम, पता और संपर्क जानकारी जांचें।
- किसी अनजान व्यक्ति के बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर न करें।
- बहुत कम कीमत पर महंगा सामान मिलने के दावे से सावधान रहें।
- किसी अनजान लिंक से ऐप डाउनलोड न करें।
याद रखें कि असली कंपनियों के ऑफर भी उनकी आधिकारिक वेबसाइट और ऐप पर उपलब्ध होते हैं। इसलिए केवल सोशल मीडिया विज्ञापन देखकर भुगतान करना सुरक्षित नहीं है।
फ्री गिफ्ट और कैशबैक के नाम पर लोगों को कैसे फंसाया जाता है?
साइबर अपराधियों की ठगी का एक प्रमुख तरीका लोगों को बिना अतिरिक्त पैसे खर्च किए फायदा देने का लालच देना है।
उदाहरण के लिए, किसी ग्राहक को बताया जाता है कि यदि वह 5 हजार रुपये की खरीदारी करेगा, तो उसे 2 हजार रुपये का कैशबैक मिलेगा। किसी अन्य ग्राहक को बताया जाता है कि टीवी खरीदने पर मुफ्त स्मार्टफोन या फर्नीचर खरीदने पर महंगा गिफ्ट दिया जाएगा।
ऐसे ऑफर सुनने में काफी आकर्षक लगते हैं।
कई बार अपराधी ग्राहक को बताते हैं कि ऑफर का लाभ लेने के लिए एक विशेष ऐप डाउनलोड करना होगा। कुछ मामलों में कहा जाता है कि ऐप इंस्टॉल करने के बाद ही कैशबैक एक्टिवेट होगा।
इसके बाद ग्राहक को व्हाट्सऐप पर APK फाइल भेज दी जाती है।
कुछ लोग बिना किसी जांच के उस फाइल को डाउनलोड कर लेते हैं। यही गलती उनके लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है।
कैशबैक के नाम पर एक अन्य तरीका भी अपनाया जाता है। अपराधी ग्राहक को एक QR कोड भेजते हैं और कहते हैं कि इसे स्कैन करने से उसके खाते में पैसे आ जाएंगे। लेकिन कई बार QR कोड स्कैन करने के बाद ग्राहक को भुगतान करने की प्रक्रिया में डाल दिया जाता है।
इसलिए ग्राहकों को समझना चाहिए कि पैसे प्राप्त करने के लिए किसी को अपना UPI PIN बताने या संदिग्ध भुगतान अनुरोध स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होती।
व्हाट्सऐप पर आने वाले अनजान लिंक से रहें सावधान
व्हाट्सऐप आज लगभग हर परिवार और व्यवसाय में इस्तेमाल किया जाता है। लोग इस पर फोटो, वीडियो, दस्तावेज और शुभकामना संदेश भेजते हैं।
साइबर अपराधी इसी प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल करके लोगों को ठगने की कोशिश करते हैं।
वे किसी परिचित व्यक्ति के नाम से संदेश भेज सकते हैं या किसी हैक किए गए व्हाट्सऐप अकाउंट का इस्तेमाल कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति को उसके दोस्त के नंबर से दिवाली की शुभकामना मिलती है। संदेश के साथ एक APK फाइल भी होती है। व्यक्ति को लगता है कि उसके परिचित ने ही यह फाइल भेजी है, इसलिए वह बिना जांच किए उसे डाउनलोड कर लेता है।
लेकिन वास्तव में उस परिचित का व्हाट्सऐप अकाउंट किसी साइबर अपराधी के नियंत्रण में हो सकता है।
इसलिए किसी परिचित से भी APK फाइल मिलने पर उसकी पुष्टि फोन करके कर लेनी चाहिए।
सिर्फ परिचित का नंबर देखकर किसी फाइल को सुरक्षित नहीं मानना चाहिए।
झारखंड में बढ़ती साइबर ठगी की घटनाएं चिंता का विषय
झारखंड लंबे समय से साइबर अपराध की घटनाओं को लेकर चर्चा में रहा है। राज्य के जामताड़ा, गिरिडीह, देवघर और अन्य क्षेत्रों से समय-समय पर साइबर अपराध से जुड़े मामले सामने आते रहे हैं।
हालांकि, यह समझना जरूरी है कि साइबर अपराध किसी एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बैठे अपराधी इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क के माध्यम से लोगों को निशाना बना सकते हैं।
अप्रैल 2026 में मुंबई पुलिस ने झारखंड से तीन लोगों को गिरफ्तार किया था। आरोप था कि वे फर्जी APK फाइल तैयार करने और उन्हें साइबर अपराधियों तक पहुंचाने के नेटवर्क से जुड़े थे। जांच में एलपीजी सिलेंडर अपडेट के नाम पर लोगों को फंसाने का तरीका सामने आया था। PTIFeed
मई 2026 में धनबाद से संबंधित एक अन्य मामले में पुलिस ने बताया था कि बड़ी संख्या में दुर्भावनापूर्ण APK फाइलों का इस्तेमाल करके लोगों को निशाना बनाया गया। जांच में मोबाइल फोन से डेटा और बैंकिंग संबंधी जानकारी चुराने के आरोप भी सामने आए थे। The Times of India
इन घटनाओं से स्पष्ट है कि साइबर अपराधी लगातार अपने तरीके बदल रहे हैं। कभी गैस कनेक्शन अपडेट, कभी शादी का निमंत्रण, कभी सरकारी योजना और कभी त्योहारों के ऑफर के नाम पर लोगों को निशाना बनाया जाता है।
इसलिए डिजिटल सुरक्षा को लेकर जागरूक रहना अब हर मोबाइल उपयोगकर्ता के लिए जरूरी हो गया है।
साइबर ठगी से बचने के लिए इन 12 बातों का रखें ध्यान
त्योहारों के दौरान ऑनलाइन खरीदारी करते समय थोड़ी सावधानी बरतकर बड़े आर्थिक नुकसान से बचा जा सकता है।
1. अनजान APK फाइल डाउनलोड न करें।
व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, एसएमएस या सोशल मीडिया पर किसी अनजान नंबर से आई APK फाइल को इंस्टॉल न करें। किसी भी ऐप को आधिकारिक स्रोत से ही डाउनलोड करें।
2. 80 प्रतिशत छूट के लालच में जल्दबाजी न करें।
यदि किसी अनजान वेबसाइट पर बहुत कम कीमत में महंगा सामान मिल रहा है, तो पहले उसकी सत्यता जांचें।
3. आधिकारिक वेबसाइट से खरीदारी करें।
टीवी, फ्रिज, मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने के लिए कंपनी की आधिकारिक वेबसाइट या भरोसेमंद शॉपिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें।
4. OTP किसी को न बताएं।
बैंक अधिकारी, दुकानदार या ग्राहक सेवा प्रतिनिधि होने का दावा करने वाला कोई भी व्यक्ति यदि आपसे OTP मांगता है, तो उसे साझा न करें।
5. UPI PIN गोपनीय रखें।
UPI PIN केवल अपने अधिकृत भुगतान के समय दर्ज करें। कैशबैक प्राप्त करने के नाम पर किसी के कहने पर PIN न डालें।
6. मोबाइल की परमिशन जांचें।
किसी ऐप को Accessibility, SMS, स्क्रीन कंट्रोल या अन्य संवेदनशील अनुमति देने से पहले उसकी जरूरत और विश्वसनीयता जांचें।
7. सोशल मीडिया विज्ञापन पर आंख बंद करके भरोसा न करें।
फेसबुक और इंस्टाग्राम पर दिखने वाला प्रत्येक विज्ञापन वास्तविक नहीं होता।
8. फर्जी ग्राहक सेवा नंबर से बचें।
किसी कंपनी का कस्टमर केयर नंबर खोजते समय केवल उसकी आधिकारिक वेबसाइट का इस्तेमाल करें।
9. बैंक खाते की गतिविधियों पर नजर रखें।
अपने बैंक खाते में होने वाले लेनदेन की नियमित जांच करें और SMS अलर्ट चालू रखें।
10. मोबाइल और ऐप अपडेट रखें।
मोबाइल का ऑपरेटिंग सिस्टम और ऐप समय-समय पर अपडेट करते रहें। Google Play Protect को भी सक्रिय रखें।
11. मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करें।
बैंकिंग, ईमेल और सोशल मीडिया अकाउंट के लिए अलग-अलग मजबूत पासवर्ड रखें। जहां उपलब्ध हो, दो-स्तरीय सुरक्षा चालू करें।
12. संदिग्ध संदेश को आगे न भेजें।
यदि किसी संदेश में फ्री गिफ्ट, कैशबैक या सरकारी लाभ का संदिग्ध दावा है, तो बिना पुष्टि उसे दूसरे लोगों तक न पहुंचाएं।
अगर गलती से APK फाइल डाउनलोड कर ली तो क्या करें?
कई बार लोग अनजाने में संदिग्ध फाइल डाउनलोड कर लेते हैं। ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय तुरंत सावधानी बरतना जरूरी है।
यदि आपने फाइल डाउनलोड की है लेकिन इंस्टॉल नहीं की है, तो उसे न खोलें और डिलीट कर दें।
यदि आपने ऐप इंस्टॉल कर लिया है, तो निम्नलिखित कदम उठाएं:
- मोबाइल का इंटरनेट कनेक्शन बंद करें।
- संदिग्ध ऐप को दी गई संवेदनशील अनुमतियों की जांच करें।
- Accessibility और Device Administrator जैसी अनुमतियों को हटाएं।
- संदिग्ध ऐप को अनइंस्टॉल करने का प्रयास करें।
- अपने बैंक को तुरंत सूचना दें।
- सुरक्षित दूसरे डिवाइस से बैंकिंग और ईमेल के पासवर्ड बदलें।
- किसी अन्य डिवाइस से अपने बैंक खाते और लेनदेन की स्थिति जांचें।
- यदि मोबाइल से ऐप हट नहीं रहा है, तो साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ की मदद लें।
यदि मोबाइल में संदिग्ध गतिविधियां जारी रहती हैं, तो जरूरी डेटा का सुरक्षित बैकअप लेकर विशेषज्ञ की सलाह से फैक्टरी रीसेट किया जा सकता है।
सबसे जरूरी बात यह है कि यदि खाते से पैसे कट गए हैं, तो शिकायत करने में बिल्कुल देरी न करें।
साइबर ठगी होने पर 1930 पर करें शिकायत
यदि किसी व्यक्ति के बैंक खाते से धोखाधड़ी के माध्यम से पैसे निकाल लिए जाते हैं, तो उसे तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करना चाहिए।
इसके अलावा राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर भी शिकायत दर्ज की जा सकती है।
साइबर ठगी की शिकायत के आधिकारिक माध्यम
राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन
1930
नंबर कॉपी करें
ऑनलाइन शिकायत पोर्टलNational Cyber Crime Reporting Portal
पुलिस सहायता: नजदीकी साइबर क्राइम थाना या पुलिस स्टेशन में भी शिकायत दर्ज कराएं।
शिकायत करते समय बैंक ट्रांजेक्शन आईडी, भुगतान की तारीख, ठगी की रकम, संबंधित मोबाइल नंबर और उपलब्ध स्क्रीनशॉट सुरक्षित रखें।
शिकायत दर्ज होने के बाद प्राप्त शिकायत संख्या अपने पास रखें। तुरंत रिपोर्ट करने से धोखाधड़ी की रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की संभावना बढ़ सकती है। हालांकि, रकम वापस मिलने की गारंटी नहीं होती।
दुकानदारों और ऑनलाइन व्यापारियों को भी रहना होगा सतर्क
साइबर ठगी का खतरा केवल ग्राहकों तक सीमित नहीं है। छोटे दुकानदारों, ऑनलाइन विक्रेताओं और कारोबारियों को भी सावधान रहने की जरूरत है।
त्योहारों में दुकानदार सोशल मीडिया के माध्यम से अपने उत्पादों का प्रचार करते हैं। कई बार वे ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए डिस्काउंट और कैशबैक ऑफर देते हैं।
साइबर अपराधी इसी तरह के वास्तविक विज्ञापनों की नकल करके नकली पेज तैयार कर सकते हैं।
इससे ग्राहकों को नुकसान होने के साथ-साथ असली दुकानदारों की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है।
इसलिए दुकानदारों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट सुरक्षित रखने चाहिए। किसी अनजान व्यक्ति को अकाउंट का पासवर्ड नहीं देना चाहिए और दो-स्तरीय सुरक्षा का इस्तेमाल करना चाहिए।
यदि कोई फर्जी पेज उनके नाम और लोगो का इस्तेमाल कर रहा है, तो संबंधित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उसकी शिकायत करनी चाहिए।
ग्राहकों को भी किसी दुकान से ऑनलाइन खरीदारी करने से पहले उसके आधिकारिक संपर्क और भुगतान विवरण की पुष्टि करनी चाहिए।
त्योहारों के समय साइबर जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत
दिवाली जैसे त्योहारों के दौरान बाजारों में खरीदारी बढ़ने के साथ डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल भी बढ़ जाता है।
ऐसे समय में प्रशासन, पुलिस और बैंकिंग संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे लोगों को साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूक करें।
शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। खासकर बुजुर्गों, छोटे दुकानदारों, महिलाओं और पहली बार ऑनलाइन खरीदारी करने वाले लोगों को साइबर ठगी के नए तरीकों की जानकारी दी जानी चाहिए।
स्कूलों और कॉलेजों में भी डिजिटल सुरक्षा से संबंधित कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
विद्यार्थियों को बताया जाना चाहिए कि अनजान लिंक पर क्लिक करना, फर्जी ऐप डाउनलोड करना और OTP साझा करना कितना खतरनाक हो सकता है।
बैंकों को भी अपने ग्राहकों को नियमित रूप से सुरक्षा संबंधी संदेश भेजने चाहिए।
इसके अलावा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को फर्जी विज्ञापनों और नकली शॉपिंग पेज की पहचान करके उन पर कार्रवाई करने की जरूरत है।
सरकार और साइबर पुलिस के सामने बड़ी चुनौती
साइबर अपराधियों को पकड़ना आसान नहीं होता। कई बार अपराधी एक राज्य में बैठकर दूसरे राज्य के व्यक्ति को ठगते हैं। ठगी की रकम कई बैंक खातों से होते हुए अलग-अलग जगहों पर भेज दी जाती है।
कुछ मामलों में फर्जी बैंक खाते और दूसरे लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जाता है।
इस कारण पुलिस के लिए अपराधियों तक पहुंचना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
जांच के दौरान मोबाइल नंबर, बैंक खाते, इंटरनेट गतिविधियों और डिजिटल लेनदेन की जानकारी जुटानी पड़ती है।
यदि ठगी की रकम तुरंत दूसरे खातों में भेज दी जाती है, तो उसे रोकना और वापस प्राप्त करना अधिक कठिन हो सकता है।
इसीलिए समय पर शिकायत करना बेहद जरूरी है।
साइबर पुलिस को तकनीकी संसाधनों के साथ-साथ आम लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान देना चाहिए।
डिजिटल इंडिया के दौर में सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी
भारत में डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। आज लोग घर बैठे बिजली बिल भरते हैं, मोबाइल रिचार्ज करते हैं, टिकट बुक करते हैं और खरीदारी करते हैं।
इससे लोगों का समय बचता है और कई सुविधाएं आसानी से उपलब्ध होती हैं।
लेकिन डिजिटल सुविधाओं के बढ़ने के साथ साइबर अपराध के खतरे भी सामने आए हैं।
पहले किसी व्यक्ति को ठगने के लिए अपराधी को उसके पास जाना पड़ता था या सीधे संपर्क करना पड़ता था। अब मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी किसी व्यक्ति को निशाना बनाया जा सकता है।
इसलिए डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल करते समय सुरक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
सरकार की ओर से डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के साथ-साथ साइबर जागरूकता पर भी ध्यान देना जरूरी है।
लोगों को यह समझना होगा कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाली प्रत्येक जानकारी सही नहीं होती और हर आकर्षक ऑफर वास्तविक नहीं होता।
निष्कर्ष: दिवाली की खरीदारी में थोड़ी सी लापरवाही पड़ सकती है भारी
दिवाली खुशियों, रोशनी और खरीदारी का त्योहार है। इस अवसर पर हर परिवार अपने घर के लिए कुछ नया खरीदना चाहता है। ऑनलाइन शॉपिंग और सोशल मीडिया के माध्यम से मिलने वाले ऑफर लोगों के लिए सुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन इनके साथ साइबर ठगी का खतरा भी जुड़ा हुआ है।
झारखंड में सामने आए मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि साइबर अपराधी 80 प्रतिशत तक छूट, मुफ्त गिफ्ट, कैशबैक और सस्ते इलेक्ट्रॉनिक सामान का लालच देकर लोगों को निशाना बना रहे हैं।
सबसे गंभीर मामला APK फाइल से जुड़ा है, जिसमें अखबार की रिपोर्ट के अनुसार एक व्यक्ति के बैंक खाते से 2.99 लाख रुपये की अवैध निकासी की गई।
यह घटना सभी मोबाइल उपयोगकर्ताओं के लिए चेतावनी है कि किसी भी अनजान लिंक या फाइल पर भरोसा करने से पहले उसकी जांच जरूर करें।
दिवाली पर खरीदारी करते समय केवल कीमत और ऑफर नहीं, बल्कि वेबसाइट और विक्रेता की विश्वसनीयता को भी महत्व दें।
किसी अनजान व्यक्ति द्वारा भेजी गई APK फाइल डाउनलोड न करें। अपना OTP और UPI PIN किसी को न बताएं। बैंक खाते में संदिग्ध लेनदेन दिखाई देने पर तुरंत बैंक और साइबर पुलिस को सूचना दें।
याद रखें, 80 प्रतिशत छूट और मुफ्त गिफ्ट का लालच कुछ मिनटों में आपकी मेहनत की कमाई को खतरे में डाल सकता है। इसलिए इस दिवाली खरीदारी जरूर करें, लेकिन पूरी सावधानी के साथ।