रांची | झारखंड | निर्माण एवं औद्योगिक विकास
रांची: निर्माण कार्यों में प्राकृतिक बालू की बढ़ती मांग और इसकी उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों के बीच अब वैकल्पिक निर्माण सामग्री के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) रांची में बॉटम ऐश (Bottom Ash) को बालू के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर विशेष चर्चा की गई। इस दौरान उद्योग जगत के अधिकारियों, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपर्स, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, सरकारी एजेंसियों, निर्माण सामग्री आपूर्तिकर्ताओं और तकनीकी विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
बैठक का मुख्य उद्देश्य यह समझना था कि बिजली उत्पादन के दौरान निकलने वाली बॉटम ऐश का निर्माण क्षेत्र में किस प्रकार उपयोग किया जा सकता है। चर्चा में इस बात पर विशेष ध्यान दिया गया कि क्या बॉटम ऐश को पारंपरिक निर्माण सामग्री के विकल्प के रूप में व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल करना संभव है। इसके लिए इसकी गुणवत्ता, तकनीकी मानकों, प्रसंस्करण, लागत और आपूर्ति व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार-विमर्श किया गया।
आईआईएम रांची में आयोजित इस यूजर मीट एवं फोकस ग्रुप डिस्कशन में विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव और सुझाव रखे। बैठक में यह समझने का प्रयास किया गया कि बॉटम ऐश के उपयोग से प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता कम करने, औद्योगिक अपशिष्ट का बेहतर प्रबंधन करने और निर्माण क्षेत्र को अधिक टिकाऊ बनाने में किस प्रकार मदद मिल सकती है।
यह चर्चा ऐसे समय में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जब देश में सड़क, भवन, आवास, औद्योगिक परिसर और अन्य आधारभूत संरचनाओं के निर्माण का काम लगातार बढ़ रहा है। निर्माण गतिविधियों के विस्तार के साथ बालू और अन्य प्राकृतिक निर्माण सामग्री की मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में वैकल्पिक सामग्री की तलाश करना पर्यावरण संरक्षण और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
आईआईएम रांची में आयोजित हुआ यूजर मीट एवं फोकस ग्रुप डिस्कशन
आईआईएम रांची में आयोजित इस कार्यक्रम में निर्माण क्षेत्र और औद्योगिक जगत से जुड़े कई महत्वपूर्ण संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कंपनियों, सरकारी निर्माण एजेंसियों, रेडी मिक्स कंक्रीट (RMC) संचालकों और निर्माण सामग्री की आपूर्ति करने वाली कंपनियों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
कार्यक्रम में आईआईएम रांची के कार्यकारी शिक्षा एवं परामर्श विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर मनीष बंसल, संकाय सदस्य प्रोफेसर कुशाग्र शरण और पतरातू विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (PVUNL) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अशोक कुमार सहगल शामिल हुए। इसके अलावा एनटीपीसी, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL), इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड, झारखंड इंडस्ट्रियल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कंपनी लिमिटेड, सीपीडब्ल्यूडी, मेकॉन और एनबीसीसी सहित कई संस्थानों के अधिकारी मौजूद रहे।
कार्यक्रम में शामिल प्रतिनिधियों ने बॉटम ऐश के संभावित उपयोगों को लेकर अपने विचार साझा किए। चर्चा के दौरान यह समझने का प्रयास किया गया कि निर्माण कंपनियां इस सामग्री को अपनाने के लिए किन बातों को प्राथमिकता देती हैं और इसके इस्तेमाल में उन्हें किस तरह की तकनीकी या व्यावसायिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
बैठक में केवल बॉटम ऐश के तकनीकी पहलुओं पर ही चर्चा नहीं हुई, बल्कि इसके व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए बाजार की जरूरतों को भी समझने का प्रयास किया गया। इसमें निर्माण कंपनियों की मांग, सामग्री की उपलब्धता, परिवहन खर्च, प्रसंस्करण और नियमित आपूर्ति जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहे।
कार्यक्रम का उद्देश्य उद्योग जगत और बिजली उत्पादन से जुड़े संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना भी था, ताकि बिजली संयंत्रों से निकलने वाले औद्योगिक उप-उत्पादों का उपयोगी और जिम्मेदार तरीके से इस्तेमाल किया जा सके।
क्या है बॉटम ऐश और यह कैसे बनती है?
बॉटम ऐश को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि ताप विद्युत संयंत्रों में बिजली उत्पादन किस प्रकार होता है। कोयले से चलने वाले ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले को जलाकर भाप तैयार की जाती है। इस भाप की सहायता से टरबाइन चलती है और बिजली का उत्पादन होता है।
कोयले के जलने के बाद अलग-अलग प्रकार की राख और अवशेष उत्पन्न होते हैं। इनमें मुख्य रूप से फ्लाई ऐश और बॉटम ऐश शामिल हैं।
फ्लाई ऐश बहुत महीन कणों वाली राख होती है, जो दहन के दौरान गैसों के साथ ऊपर की ओर जाती है और विशेष उपकरणों की मदद से एकत्र की जाती है। दूसरी ओर बॉटम ऐश अपेक्षाकृत मोटे कणों वाली राख होती है, जो बॉयलर के निचले हिस्से में जमा होती है।
दोनों का निर्माण कोयले के दहन के दौरान होता है, लेकिन इनके भौतिक और रासायनिक गुण अलग-अलग हो सकते हैं। इसी वजह से इनके इस्तेमाल की तकनीक और उपयोग के क्षेत्र भी अलग हो सकते हैं।
बॉटम ऐश को केवल सामान्य राख समझना उचित नहीं है। उचित प्रसंस्करण और गुणवत्ता परीक्षण के बाद इसका इस्तेमाल कुछ निर्माण संबंधी कार्यों में किया जा सकता है। हालांकि, इसका उपयोग किस काम में और कितनी मात्रा में किया जा सकता है, यह इसकी गुणवत्ता तथा संबंधित तकनीकी मानकों पर निर्भर करता है।
पतरातू विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के लिए यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिजली उत्पादन की प्रक्रिया में निकलने वाली बॉटम ऐश का उपयोग बढ़ाने से औद्योगिक अपशिष्ट के प्रबंधन को बेहतर बनाया जा सकता है।
प्राकृतिक बालू की बढ़ती मांग के बीच क्यों तलाशे जा रहे हैं विकल्प?
भारत में निर्माण क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में सड़कें, पुल, आवासीय भवन, औद्योगिक परिसर, सरकारी कार्यालय, रेलवे परियोजनाएं और अन्य आधारभूत संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है।
इन सभी निर्माण गतिविधियों में बालू एक महत्वपूर्ण सामग्री है। कंक्रीट, मोर्टार और कई अन्य निर्माण कार्यों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। निर्माण कार्यों के विस्तार के साथ प्राकृतिक बालू की मांग भी बढ़ रही है।
प्राकृतिक बालू मुख्य रूप से नदियों और अन्य प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होती है। हालांकि, इसका अनियंत्रित खनन पर्यावरण और नदी तंत्र के लिए चुनौती बन सकता है। नदी के तल से अत्यधिक बालू निकालने से नदी की प्राकृतिक संरचना, जल प्रवाह और आसपास के पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इसके अलावा कई क्षेत्रों में बालू की उपलब्धता, खनन से जुड़े नियम, परिवहन और लागत भी निर्माण कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य में भी निर्माण क्षेत्र को पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण निर्माण सामग्री उपलब्ध कराना जरूरी है। राज्य में शहरी विकास, औद्योगिक निवेश, सड़क निर्माण और आवासीय परियोजनाओं के विस्तार के साथ निर्माण सामग्री की मांग बनी रहती है।
ऐसी स्थिति में यदि औद्योगिक उप-उत्पादों का सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जा सके तो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
बॉटम ऐश को बालू के संभावित विकल्प के रूप में देखने के पीछे यही सोच है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक बालू को हर प्रकार के निर्माण कार्य से पूरी तरह हटाना नहीं, बल्कि जहां तकनीकी रूप से उपयुक्त हो वहां वैकल्पिक सामग्री के इस्तेमाल की संभावनाओं को विकसित करना है।
पीवीयूएनएल की पहल से बढ़ सकती है औद्योगिक अपशिष्ट के उपयोग की संभावना
पतरातू विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (PVUNL) की ओर से बॉटम ऐश के उपयोग को प्रोत्साहित करने की पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कंपनी का उद्देश्य बिजली उत्पादन के दौरान निकलने वाली राख का अधिक उपयोग सुनिश्चित करना और इसे निर्माण क्षेत्र के लिए उपयोगी संसाधन के रूप में विकसित करना है।
पीवीयूएनएल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अशोक कुमार सहगल ने इस विषय पर चर्चा करते हुए टिकाऊ निर्माण सामग्री के रूप में बॉटम ऐश की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने इसके उपयोग को बढ़ाने के लिए उद्योगों और निर्माण क्षेत्र के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
उनका मानना है कि यदि बॉटम ऐश का व्यावसायिक उपयोग बढ़ता है तो इससे औद्योगिक अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन के साथ-साथ निर्माण क्षेत्र को एक वैकल्पिक सामग्री भी उपलब्ध हो सकती है।
इसके लिए जरूरी है कि संभावित उपभोक्ताओं को इस सामग्री की गुणवत्ता, उपयोगिता और उपलब्धता के बारे में सही जानकारी दी जाए। निर्माण कंपनियों को यह भरोसा होना चाहिए कि उन्हें निर्धारित मानकों के अनुरूप सामग्री नियमित रूप से उपलब्ध हो सकेगी।
पीवीयूएनएल की इस पहल में आईआईएम रांची की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। संस्थान अपने प्रबंधन और परामर्श संबंधी अनुभव के माध्यम से यह समझने में मदद कर रहा है कि बॉटम ऐश के उपयोग को बाजार में किस तरह बढ़ाया जा सकता है।
यह पहल बिजली उत्पादन करने वाले संस्थानों और निर्माण उद्योग के बीच सहयोग का एक उदाहरण भी है।
तकनीकी मानकों और गुणवत्ता परीक्षण पर हुआ विचार-विमर्श
बॉटम ऐश को निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल करने से पहले उसकी गुणवत्ता की जांच करना सबसे जरूरी है। किसी भी निर्माण परियोजना में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की मजबूती, टिकाऊपन और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है।
इसी वजह से आईआईएम रांची में आयोजित चर्चा के दौरान बॉटम ऐश के तकनीकी मानकों पर विशेष ध्यान दिया गया।
निर्माण क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली बालू की गुणवत्ता उसके कणों के आकार, ग्रेडेशन, नमी और अन्य भौतिक गुणों के आधार पर तय की जाती है। इसी तरह बॉटम ऐश की गुणवत्ता का भी परीक्षण करना आवश्यक है।
इसके अंतर्गत निम्नलिखित पहलुओं का मूल्यांकन महत्वपूर्ण हो सकता है:
- कणों का आकार: बॉटम ऐश के कणों का आकार और उनका वितरण किस प्रकार का है।
- ग्रेडेशन: सामग्री में अलग-अलग आकार के कणों का अनुपात कितना है।
- नमी की मात्रा: सामग्री में मौजूद नमी उसके प्रसंस्करण और उपयोग को किस तरह प्रभावित कर सकती है।
- रासायनिक संरचना: सामग्री में मौजूद विभिन्न रासायनिक तत्वों का अनुपात क्या है।
- हानिकारक तत्व: निर्माण और पर्यावरण की दृष्टि से किसी संभावित हानिकारक तत्व की मौजूदगी तो नहीं है।
- मजबूती और टिकाऊपन: इससे तैयार निर्माण सामग्री निर्धारित आवश्यकताओं को पूरा करती है या नहीं।
- जल अवशोषण: सामग्री पानी को कितनी मात्रा में अवशोषित करती है।
इन सभी पहलुओं का परीक्षण करने के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि किसी विशेष निर्माण कार्य में बॉटम ऐश का उपयोग उपयुक्त होगा या नहीं।
निर्माण सामग्री के रूप में किसी औद्योगिक उप-उत्पाद को अपनाने का निर्णय केवल उसकी उपलब्धता या कम कीमत के आधार पर नहीं किया जा सकता। उसके तकनीकी प्रदर्शन और लंबे समय तक टिकाऊ रहने की क्षमता को भी देखना जरूरी है।
एनसीसीबीएम के परीक्षण और प्रमाणन का महत्व
बॉटम ऐश के व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए उसकी तकनीकी स्वीकार्यता एक महत्वपूर्ण विषय है। कार्यक्रम में पीवीयूएनएल के सीईओ अशोक कुमार सहगल ने बताया कि नेशनल काउंसिल फॉर सीमेंट एंड बिल्डिंग मैटेरियल्स (NCCBM) की ओर से परीक्षण के बाद बॉटम ऐश को बालू के विकल्प के रूप में इस्तेमाल करने के लिए प्रमाणन प्राप्त हुआ है।
यह जानकारी इस पहल के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी वैकल्पिक निर्माण सामग्री को बाजार में स्वीकार्यता दिलाने के लिए उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता का प्रमाणित होना जरूरी है।
एनसीसीबीएम सीमेंट और भवन निर्माण सामग्री से जुड़े परीक्षण, अनुसंधान और तकनीकी मूल्यांकन के क्षेत्र में कार्य करने वाला संस्थान है। ऐसे संस्थानों के परीक्षण से निर्माण क्षेत्र में नई सामग्री के उपयोग को लेकर भरोसा विकसित करने में सहायता मिलती है।
हालांकि, किसी सामग्री को प्रमाणन मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसका उपयोग हर प्रकार के निर्माण कार्य में बिना किसी सीमा के किया जा सकता है। प्रत्येक परियोजना की जरूरत, सामग्री की गुणवत्ता और लागू मानकों के अनुसार उसका उपयोग तय किया जाना चाहिए।
इसी कारण आईआईएम रांची में हुई चर्चा में केवल प्रमाणन की जानकारी तक सीमित न रहकर व्यावहारिक उपयोग और व्यावसायिक संभावनाओं पर भी विचार किया गया।
बॉटम ऐश का इस्तेमाल किन निर्माण कार्यों में हो सकता है?
बॉटम ऐश के उपयोग की संभावनाएं कई प्रकार के निर्माण कार्यों में देखी जा रही हैं। हालांकि, इसका वास्तविक उपयोग सामग्री की गुणवत्ता, प्रसंस्करण और तकनीकी परीक्षण के बाद ही निर्धारित किया जा सकता है।
1. कंक्रीट निर्माण में संभावित उपयोग
कंक्रीट निर्माण में बालू का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में किया जाता है। यदि बॉटम ऐश के कणों का आकार और अन्य गुण निर्धारित मानकों के अनुकूल हों तो कुछ विशेष मिश्रणों में इसे प्राकृतिक बालू के आंशिक विकल्प के रूप में इस्तेमाल करने की संभावना हो सकती है।
इसके लिए कंक्रीट की मजबूती, कार्यक्षमता, जल अवशोषण और टिकाऊपन का परीक्षण आवश्यक है।
2. सड़क निर्माण में उपयोग
सड़क निर्माण में अलग-अलग स्तरों पर विभिन्न प्रकार की निर्माण सामग्री का उपयोग होता है। कुछ कार्यों में मिट्टी, एग्रीगेट और अन्य सामग्री की जरूरत पड़ती है।
उचित प्रसंस्करण और तकनीकी मानकों के अनुरूप होने पर बॉटम ऐश के कुछ उपयोग सड़क निर्माण से संबंधित कार्यों में भी तलाशे जा सकते हैं।
3. ब्लॉक और निर्माण उत्पादों में संभावना
औद्योगिक राख से कई प्रकार के निर्माण उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं पर काम किया जाता रहा है। बॉटम ऐश की गुणवत्ता उपयुक्त होने पर इससे संबंधित उत्पादों के विकास पर भी विचार किया जा सकता है।
4. औद्योगिक और आधारभूत संरचना परियोजनाएं
औद्योगिक परिसरों, बड़े भवनों और आधारभूत संरचना से जुड़ी परियोजनाओं में भी वैकल्पिक निर्माण सामग्री की आवश्यकता होती है। ऐसी परियोजनाओं में बॉटम ऐश के उपयोग का मूल्यांकन तकनीकी विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार किया जा सकता है।
5. अन्य निर्माण संबंधी कार्य
निर्माण क्षेत्र में कई ऐसे कार्य होते हैं जहां प्राकृतिक संसाधनों के विकल्प तलाशे जा सकते हैं। बॉटम ऐश की गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुरूप होने पर इसके अन्य उपयोगों की संभावनाएं भी विकसित की जा सकती हैं।
इस तरह बॉटम ऐश के उपयोग का दायरा केवल एक प्रकार के निर्माण कार्य तक सीमित नहीं है। लेकिन इसके प्रत्येक उपयोग के लिए अलग-अलग तकनीकी परीक्षण और निर्धारित मानकों का पालन जरूरी है।
कीमत और आपूर्ति व्यवस्था पर भी हुई चर्चा
किसी भी वैकल्पिक निर्माण सामग्री को व्यावसायिक रूप से सफल बनाने के लिए उसकी गुणवत्ता के साथ कीमत भी महत्वपूर्ण होती है। यदि कोई सामग्री तकनीकी रूप से अच्छी है, लेकिन उसकी खरीद और परिवहन की लागत बहुत अधिक है तो निर्माण कंपनियों के लिए उसे अपनाना मुश्किल हो सकता है।
इसी बात को ध्यान में रखते हुए आईआईएम रांची में आयोजित चर्चा में बॉटम ऐश की कीमत और आपूर्ति व्यवस्था पर भी विचार किया गया।
बॉटम ऐश को बिजली संयंत्र से निर्माण स्थल तक पहुंचाने में कई प्रक्रियाएं शामिल होती हैं। इसमें संग्रहण, प्रसंस्करण, भंडारण, लोडिंग, परिवहन और वितरण जैसे चरण शामिल हैं।
इन सभी प्रक्रियाओं की लागत को ध्यान में रखते हुए ही इसकी अंतिम कीमत निर्धारित करना व्यावसायिक दृष्टि से जरूरी होगा।
बैठक में यह समझने का प्रयास किया गया कि बॉटम ऐश के संभावित उपभोक्ता कौन हो सकते हैं और किस प्रकार के उद्योग इसके नियमित खरीदार बन सकते हैं।
इसके अलावा यह भी महत्वपूर्ण है कि सामग्री की आपूर्ति केवल कुछ चुनिंदा परियोजनाओं तक सीमित न रहे, बल्कि जरूरत के अनुसार निर्माण कंपनियों को नियमित रूप से उपलब्ध हो सके।
यदि आपूर्ति व्यवस्था मजबूत होती है तो इससे निर्माण क्षेत्र में बॉटम ऐश के इस्तेमाल को बढ़ावा मिल सकता है।
आईआईएम रांची की परामर्श परियोजना की अहम भूमिका
इस पूरी पहल में आईआईएम रांची की भूमिका केवल बैठक आयोजित करने तक सीमित नहीं है। संस्थान पतरातू विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के लिए बॉटम ऐश के उपयोग और व्यावसायिक संभावनाओं से जुड़ी परामर्श परियोजना पर भी काम कर रहा है।
कार्यक्रम के दौरान नितिन सिंह ने इस परियोजना से जुड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि बॉटम ऐश के व्यापक उपयोग के लिए उसके व्यावहारिक पहलुओं और उद्योगों की आवश्यकताओं को समझना जरूरी है।
आईआईएम रांची का उद्देश्य इस दिशा में बाजार और उद्योग से जुड़े विभिन्न पक्षों की राय को समझना है। इसके माध्यम से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि बॉटम ऐश के उपयोग को बढ़ाने के लिए किन व्यवस्थाओं की आवश्यकता है।
किसी भी नई सामग्री को बाजार में स्थापित करने के लिए केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं होता। उसके लिए मांग, आपूर्ति, उपभोक्ताओं का भरोसा, कीमत और वितरण व्यवस्था जैसे पहलुओं का भी अध्ययन करना पड़ता है।
यही कारण है कि इस परियोजना में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। उनके अनुभवों के माध्यम से बॉटम ऐश के इस्तेमाल में आने वाली वास्तविक समस्याओं और संभावित समाधानों को समझने का प्रयास किया गया।
उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने रखे अपने सुझाव
बैठक में विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने बॉटम ऐश के उपयोग को लेकर अपने विचार और सवाल रखे। चर्चा में निर्माण कंपनियों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और सरकारी एजेंसियों की भागीदारी महत्वपूर्ण रही।
उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के लिए यह जानना जरूरी है कि बॉटम ऐश की गुणवत्ता कितनी स्थिर रहती है और क्या इसे बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों में इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके अलावा सामग्री की उपलब्धता, परिवहन खर्च और निर्माण प्रक्रिया में इसके इस्तेमाल से जुड़े सवाल भी महत्वपूर्ण हैं।
रेडी मिक्स कंक्रीट (RMC) उद्योग के लिए सामग्री की गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति विशेष महत्व रखती है। इस क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली सामग्री के गुणों में अधिक अंतर होने पर तैयार कंक्रीट की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
इसी तरह बड़े निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट संचालित करने वाली कंपनियों को भी यह सुनिश्चित करना होता है कि इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री निर्धारित तकनीकी मानकों को पूरा करे।
इसलिए बैठक में उद्योग प्रतिनिधियों की भागीदारी को बॉटम ऐश के व्यावसायिक उपयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के बचाव में मिल सकती है मदद
बॉटम ऐश के इस्तेमाल पर चर्चा का एक प्रमुख पहलू पर्यावरण संरक्षण भी है। कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों में बिजली उत्पादन के दौरान बड़ी मात्रा में राख उत्पन्न होती है। इस राख का उचित प्रबंधन करना पर्यावरण की दृष्टि से आवश्यक है।
यदि औद्योगिक राख का उपयोग वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से किया जाए तो इसे बेकार पदार्थ के रूप में जमा करने की जरूरत कम हो सकती है।
इसके साथ ही प्राकृतिक निर्माण सामग्री की मांग का कुछ हिस्सा वैकल्पिक सामग्री से पूरा किया जा सकता है। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाला दबाव कम करने की संभावना बनती है।
विशेष रूप से नदी से प्राप्त प्राकृतिक बालू के अत्यधिक खनन को कम करने के लिए वैकल्पिक निर्माण सामग्री की खोज महत्वपूर्ण है।
हालांकि, बॉटम ऐश का उपयोग अपने आप में पर्यावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित होने की गारंटी नहीं देता। इसके लिए सामग्री की रासायनिक संरचना, संभावित प्रदूषकों, धूल नियंत्रण और सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था जरूरी है।
यदि राख को खुले में असुरक्षित तरीके से रखा जाए या बिना उचित व्यवस्था के परिवहन किया जाए तो धूल और अन्य पर्यावरणीय समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
इसलिए बॉटम ऐश के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ पर्यावरणीय सुरक्षा के नियमों का पालन भी आवश्यक होगा।
केंद्र सरकार के नियमों में भी राख के उपयोग पर जोर
भारत सरकार ने कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राख के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 31 दिसंबर 2021 की ऐश यूटिलाइजेशन अधिसूचना में फ्लाई ऐश और बॉटम ऐश दोनों को शामिल किया गया है। इसमें राख के उपयोग के विभिन्न क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है।
अधिसूचना में सीमेंट निर्माण, रेडी मिक्स कंक्रीट, सड़क और फ्लाईओवर के एम्बैंकमेंट, ऐश आधारित निर्माण सामग्री, बांध निर्माण, खदानों की भराई और अन्य निर्धारित पर्यावरण अनुकूल उपयोगों को शामिल किया गया है। IndiaCode+1
इन प्रावधानों का उद्देश्य ताप विद्युत संयंत्रों से निकलने वाली राख का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करना और उसके अनियंत्रित निपटान से होने वाली पर्यावरणीय समस्याओं को कम करना है।
हालांकि, अलग-अलग प्रकार की राख के लिए उपयोग की उपयुक्तता और तकनीकी आवश्यकताएं अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी भी निर्माण परियोजना में बॉटम ऐश के उपयोग से पहले संबंधित मानकों का पालन करना आवश्यक है।
केंद्र सरकार की नीतियां और तकनीकी दिशा-निर्देश इस क्षेत्र में उद्योगों और बिजली उत्पादन कंपनियों को एक व्यवस्थित ढांचा उपलब्ध कराते हैं।
पतरातू और आसपास के क्षेत्र के लिए खुल सकते हैं नए अवसर
बॉटम ऐश के व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा मिलने से पतरातू और रामगढ़ क्षेत्र के आसपास आर्थिक गतिविधियों के नए अवसर विकसित हो सकते हैं।
यदि निर्माण कंपनियां इस सामग्री को अपनाती हैं तो उसके संग्रहण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण और परिवहन से संबंधित कार्यों की मांग बढ़ सकती है।
इससे स्थानीय उद्यमियों और छोटे उद्योगों को भी अवसर मिल सकते हैं। विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) इस क्षेत्र में अपनी भागीदारी बढ़ा सकते हैं।
स्थानीय स्तर पर परिवहन और सामग्री आपूर्ति से जुड़े व्यवसायों को भी लाभ मिलने की संभावना है। इसके अलावा नई तकनीकों और प्रसंस्करण सुविधाओं के विकास से रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
हालांकि, इन संभावनाओं को वास्तविक आर्थिक लाभ में बदलने के लिए व्यावसायिक मांग और बाजार की स्थिरता जरूरी होगी।
इसके लिए बिजली संयंत्र, निर्माण कंपनियों और स्थानीय उद्यमियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता होगी।
छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकती है पहल
निर्माण सामग्री का कारोबार केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित नहीं है। इसमें बड़ी संख्या में छोटे और मध्यम उद्यम भी काम करते हैं।
स्थानीय स्तर पर ईंट, ब्लॉक, कंक्रीट उत्पाद, निर्माण सामग्री की आपूर्ति और परिवहन से जुड़े व्यवसाय इस क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
यदि बॉटम ऐश को उचित कीमत और गुणवत्ता के साथ उपलब्ध कराया जाता है तो छोटे उद्यमी भी इसके संभावित उपयोगकर्ता बन सकते हैं।
हालांकि, इसके लिए उन्हें सामग्री के उपयोग से जुड़ी तकनीकी जानकारी और उचित प्रशिक्षण उपलब्ध कराना होगा।
छोटे उद्यमियों को यह भी समझना होगा कि बॉटम ऐश का उपयोग किस प्रकार के उत्पादों में किया जा सकता है और इसके लिए कौन-से उपकरण या प्रसंस्करण सुविधाएं आवश्यक होंगी।
यदि इस दिशा में सही जानकारी और तकनीकी सहायता उपलब्ध होती है तो स्थानीय उद्योगों की भागीदारी बढ़ सकती है।
निर्माण कंपनियों के सामने क्या होंगी चुनौतियां?
बॉटम ऐश को बालू के विकल्प के रूप में स्थापित करने के लिए कई चुनौतियों का समाधान करना होगा।
गुणवत्ता में एकरूपता: अलग-अलग उत्पादन परिस्थितियों में निकलने वाली बॉटम ऐश के गुणों में अंतर हो सकता है। निर्माण कंपनियों को नियमित और समान गुणवत्ता वाली सामग्री चाहिए।
प्रसंस्करण की जरूरत: उपयोग से पहले सामग्री की छंटाई, सफाई, आकार के अनुसार वर्गीकरण और अन्य प्रक्रियाओं की जरूरत पड़ सकती है।
परिवहन खर्च: यदि निर्माण स्थल बिजली संयंत्र से काफी दूर है तो परिवहन लागत बढ़ सकती है। इससे सामग्री की प्रतिस्पर्धात्मक कीमत प्रभावित होगी।
तकनीकी स्वीकार्यता: निर्माण क्षेत्र में नई सामग्री को अपनाने से पहले इंजीनियरों, ठेकेदारों और परियोजना प्रबंधन से जुड़े लोगों को भरोसा होना जरूरी है।
नियमों का पालन: पर्यावरण और निर्माण से जुड़े मानकों के अनुरूप ही बॉटम ऐश का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
बाजार में मांग: उत्पादन और आपूर्ति की व्यवस्था तभी सफल होगी जब निर्माण क्षेत्र में इसकी नियमित मांग विकसित हो।
इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए उद्योगों, शोध संस्थानों और सरकारी एजेंसियों को मिलकर काम करना होगा।
झारखंड के औद्योगिक विकास को मिल सकता है बढ़ावा
झारखंड देश के प्रमुख खनिज और औद्योगिक राज्यों में शामिल है। यहां कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिज संसाधनों की उपलब्धता के कारण ऊर्जा, इस्पात और निर्माण से जुड़े कई उद्योग संचालित होते हैं।
ऐसे में औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाले उप-उत्पादों का बेहतर उपयोग राज्य के आर्थिक और पर्यावरणीय विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
बॉटम ऐश के उपयोग को बढ़ावा मिलने से बिजली उत्पादन और निर्माण उद्योग के बीच एक नया व्यावसायिक संबंध विकसित हो सकता है।
पतरातू क्षेत्र में बिजली उत्पादन से निकलने वाली बॉटम ऐश का उपयोग यदि निर्माण क्षेत्र में बढ़ता है तो इससे स्थानीय स्तर पर सामग्री की आपूर्ति और प्रसंस्करण से जुड़े उद्योगों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
इसके अलावा झारखंड में आधारभूत संरचना के विकास के लिए वैकल्पिक निर्माण सामग्री की उपलब्धता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
इस पहल से राज्य में औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को लेकर नई संभावनाएं विकसित हो सकती हैं।
आगे की रणनीति क्या हो सकती है?
आईआईएम रांची में आयोजित यूजर मीट और फोकस ग्रुप डिस्कशन के बाद इस दिशा में आगे की रणनीति तैयार करने के लिए कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर काम किया जा सकता है।
सबसे पहले बॉटम ऐश के संभावित उपभोक्ताओं की पहचान करना जरूरी होगा। इसके बाद यह पता लगाना होगा कि निर्माण कंपनियों को कितनी मात्रा में सामग्री की आवश्यकता है और उनकी गुणवत्ता संबंधी अपेक्षाएं क्या हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण कदम प्रसंस्करण और आपूर्ति व्यवस्था को मजबूत बनाना होगा। यदि बॉटम ऐश को निर्माण स्थल तक आसानी से और उचित कीमत पर पहुंचाया जा सके तो इसके व्यावसायिक इस्तेमाल की संभावना बढ़ सकती है।
तीसरा कदम निर्माण क्षेत्र में इसके इस्तेमाल को लेकर तकनीकी जागरूकता बढ़ाना होगा। इसके लिए निर्माण कंपनियों, इंजीनियरों, ठेकेदारों और स्थानीय उद्यमियों के साथ प्रशिक्षण तथा जानकारी साझा करने के कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं।
चौथा महत्वपूर्ण पहलू परीक्षण आधारित उपयोग को बढ़ावा देना होगा। शुरुआत में निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप सीमित परियोजनाओं में इसका उपयोग करके परिणामों का मूल्यांकन किया जा सकता है।
इसके बाद प्राप्त अनुभवों के आधार पर इसके व्यावसायिक विस्तार की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
आईआईएम रांची और पीवीयूएनएल की साझेदारी का महत्व
इस पहल में आईआईएम रांची और पीवीयूएनएल के बीच सहयोग महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर पीवीयूएनएल के पास बिजली उत्पादन और बॉटम ऐश से जुड़ा व्यावहारिक अनुभव है, वहीं दूसरी ओर आईआईएम रांची प्रबंधन, बाजार विश्लेषण और व्यावसायिक रणनीति के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखता है।
दोनों संस्थानों के सहयोग से बॉटम ऐश के उपयोग से जुड़े व्यावसायिक अवसरों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।
आईआईएम रांची की परामर्श परियोजना के माध्यम से उद्योगों की आवश्यकताओं और बाजार की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों से प्राप्त सुझाव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इस तरह यह पहल केवल एक बैठक तक सीमित नहीं है, बल्कि औद्योगिक संसाधनों के बेहतर उपयोग और टिकाऊ निर्माण सामग्री के विकास की दिशा में एक प्रयास के रूप में देखी जा सकती है।
देश में बढ़ रही है टिकाऊ निर्माण सामग्री की जरूरत
आज निर्माण क्षेत्र में पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ सामग्री के इस्तेमाल पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। दुनिया भर में निर्माण उद्योग के सामने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और निर्माण लागत को नियंत्रित रखने की चुनौती है।
भारत में भी तेजी से बढ़ते शहरीकरण और आधारभूत संरचना विकास के कारण निर्माण सामग्री की मांग लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है।
ऐसे में निर्माण उद्योग के लिए केवल पारंपरिक संसाधनों पर निर्भर रहना लंबे समय में चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
औद्योगिक उप-उत्पादों का वैज्ञानिक उपयोग इस समस्या के समाधान का एक संभावित रास्ता है। फ्लाई ऐश, बॉटम ऐश और अन्य औद्योगिक अवशेषों से उपयोगी निर्माण सामग्री विकसित करने की दिशा में विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं।
हालांकि, प्रत्येक औद्योगिक उप-उत्पाद का इस्तेमाल उसकी गुणवत्ता और उपयोग के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
झारखंड में बॉटम ऐश के उपयोग को लेकर आईआईएम रांची में हुई चर्चा इसी व्यापक सोच का हिस्सा है। यदि यह पहल सफल होती है तो राज्य में टिकाऊ निर्माण सामग्री के उपयोग को बढ़ावा मिल सकता है।
निष्कर्ष: बालू के विकल्प की दिशा में नई पहल
आईआईएम रांची में आयोजित बॉटम ऐश यूजर मीट एवं फोकस ग्रुप डिस्कशन निर्माण क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है। इस बैठक में उद्योग जगत, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, सरकारी एजेंसियों और निर्माण सामग्री से जुड़े प्रतिनिधियों ने बॉटम ऐश के संभावित उपयोग पर विचार-विमर्श किया।
बैठक का मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक बालू के विकल्प के रूप में बॉटम ऐश की व्यावसायिक उपयोगिता का आकलन करना था। इसमें तकनीकी मानकों, प्रसंस्करण, लागत, आपूर्ति व्यवस्था और उद्योगों की जरूरतों पर चर्चा की गई।
पीवीयूएनएल के सीईओ अशोक कुमार सहगल ने बॉटम ऐश की उपयोगिता और टिकाऊ निर्माण सामग्री के रूप में इसकी संभावनाओं पर प्रकाश डाला। वहीं आईआईएम रांची की परामर्श परियोजना के माध्यम से इसके बाजार और व्यावसायिक पहलुओं को समझने का प्रयास किया जा रहा है।
यदि बॉटम ऐश का उपयोग तकनीकी और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप बढ़ाया जाता है तो इससे प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, औद्योगिक अपशिष्ट के बेहतर प्रबंधन और स्थानीय उद्यमों के विकास में मदद मिल सकती है।
अब इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि उद्योग जगत इसे कितनी स्वीकार्यता देता है और बॉटम ऐश को नियमित रूप से निर्माण कार्यों में इस्तेमाल करने के लिए किस तरह की व्यवस्था विकसित की जाती है।