दर्शक अमूमन बल्ले के बाराती होते हैं। वे समझते हैं बल्ला इस जलसे का दूल्हा है। वह उन्हें गेंद से ज़्यादा भला लगता है। बड़ी तादाद में मैच देखने उमड़ते हैं तो सोचते हैं रनों की बौछार हो तो भला। घरू टीम स्कोरबोर्ड पर तीन-साढ़े तीन सौ टाँग दे तो पैसा वसूल हो।

लेकिन लो-स्कोरिंग मैच में शुरू के छह-सात ओवरों में ही पता चल जाता है कि इस बार मामला थोड़ा अलग है। खेल आज भी होगा, कशमकश आज भी होगी, पर गेंद और बल्ले में आज बराबरी की ठनने वाली है, बल्ला आज अपनी मनमानी नहीं चलाएगा।

तब दर्शक एक-एक रन को चीयर करते हैं। किसी दुर्लभ चौके पर झूम उठते हैं। अर्धशतक को शतक जितना सम्मान दिया जाता है। गेंद बल्ले पर गति से आती नहीं है। टाइमिंग साथ नहीं देती। गेंद को हवा में उछालकर बल्लेबाज़ गर्व से उसे स्टैंड में जाता निहारता है पर पाता है गेंद तो अभी हरे गलीचे की ही ज़द में है। किसी और पिच पर जो शर्तिया छक्का होता, वह इस पर मिडविकेट या लॉन्ग ऑन पर धरपकड़ भी करवा सकता है। बल्लेबाज़ इसे भाँप जाता है और गेंदबाज़ से तमीज़ से पेश आने लगता है।

साल 2006 में दक्षिण अफ्रीका ने रनों का पीछा करते हुए 50 ओवर में 438 रन बना लिए थे। कहते हैं व​ह एकदिवसीय क्रिकेट इतिहास का महानतम मैच था। नहीं तो! जिस मैच में गेंदबाज़ों की रूई की तरह धुनाई हुई हो, वह महानतम कैसे हो सकता है? क्रिकेट अकेले बल्ले का खेल थोड़े ना है। मुझे 1997 में टोरंटो में हुआ सहारा कप याद आता है, जो लो-स्कोरिंग मैचों का गुलदस्ता था। उसमें 160 रन विनिंग टोटल हुआ करता था। कोई बल्लेबाज़ 30-35 रन बना ले तो मैच-विनर कहलाता था। मजाल है उसमें कोई गेंदबाज़ को उसके सिर के ऊपर से छक्का लगाने की हिमाकत कर पाता।

भारत पहले बल्लेबाज़ी कर रहा है, यह इत्तेला जब लखनऊ के 50 हज़ार दर्शकों- और देश के करोड़ों क्रिकेटप्रेमियों को मिली होगी तो उन्होंने सोचा होगा आज तो रविवार की दावत है। पहले खेलेंगे, बड़ा टोटल करेंगे। लेकिन पिच इसके लिए तैयार नहीं थी। सवा तीन सौ का मनसूबा लेकर आए सोचने लगे अढ़ाई सौ भी बना दें तो मुक़ाबला करेंगे। धैर्यवान धनी सिद्ध हुए। रनों की क़ीमत बढ़ी। गेंदबाज़ का आत्मसम्मान पुन: स्थापित हुआ।

अंत में घरू टीम की ही जीत हुई। दर्शक जीत देखने ही आए थे सो उनकी मनोकामना पूरी हुई। पर जीत थोड़ी फ़र्क़ थी, उसका स्वाद ज़रा जुदा था। एक अलहदा ज़ायका लेकर इस बार वो घर लौटे।

बल्ले की बारात में आए थे, लौटे तो दुलहनिया गेंद के रूप की जीभर प्रशंसा कर रहे थे! सुशोभित

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