राँची : जिंदगी जिंदाबाद
टीआरएल संकाय, राँची विश्वविद्यालय के विश्वविद्यालय कुँडुख विभाग में 6 जुलाई 2026 को पुस्तक लोकार्पण समारोह का भव्य आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन तथा साहित्यिक परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राँची विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो (डॉ) सरोज शर्मा की गरिमामयी उपस्थिति रही। उन्होंने अपने संबोधन में सभी रचनाकारों एवं उपस्थित साहित्यप्रेमियों को शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि मातृभाषाएँ हमारी सांस्कृतिक पहचान और विरासत की आत्मा हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपनी-अपनी भाषाओं में अधिक से अधिक साहित्य सृजन करना चाहिए, क्योंकि साहित्य ही किसी भाषा की जीवंतता और उसके भविष्य को सुनिश्चित करता है। उन्होंने आगे कहा कि राँची विश्वविद्यालय में नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं की पढ़ाई होना हम सबके लिए गर्व का विषय है। हमारा उद्देश्य केवल भाषाओं को पढ़ाना नहीं, बल्कि उनके समग्र विकास को सुनिश्चित करना है। इसी दिशा में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय में लैंग्वेज लैब स्थापित करने की योजना है, जिससे भाषाओं के अध्ययन, अनुसंधान और तकनीकी विकास को नई गति मिलेगी। हमारा उद्देश्य तभी साकार होगा जब भाषा और साहित्य समाज के जीवन से जुड़ेंगे।
पुस्तक समीक्षा प्रस्तुत करते हुए टीआरएल विभाग के पूर्व समन्वयक सह विभागाध्यक्ष डॉ हरि उरांव ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों का भी संरक्षक होता है। उन्होंने कहा कि लोकार्पित दोनों पुस्तकें अपने विषय-वस्तु और प्रस्तुति की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं तथा नई पीढ़ी को अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी।
संकायाध्यक्ष डॉ अर्चना कुमारी दुबे ने अपने संबोधन में कहा कि जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं में सृजनात्मक लेखन और शोध कार्य लगातार बढ़ रहे हैं, जो अत्यंत सुखद संकेत हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों और शोधार्थियों को साहित्यिक सृजन तथा अकादमिक शोध के प्रति प्रेरित करते हैं।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय कुँड़ुख विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ बन्दे खलखो की निबंध संग्रह “पुना कत्थटूड़” तथा शोधार्थी जगदीश उराँव द्वारा लिखित यात्रा-वृत्तांत “राँची ती भूटान” पुस्तक का विधिवत लोकार्पण किया गया। दोनों पुस्तकों को साहित्य, संस्कृति तथा सामाजिक जीवन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कृतियों के रूप में सराहा गया।
इस अवसर पर समाजशास्त्र विभाग की सहायक प्राध्यापिका डॉ. दीपाली अपराजिता डुंगडुंग, डॉ. कुमारी शशि, डॉ. किरण कुल्लू, डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो, प्रेम कुमार मुर्मू, डॉ. करम सिंह मुण्डा, डॉ. सरस्वती गागराई, डॉ. रीझू नायक, डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. आराधना मुंडू, शकुंतला बेसरा, राजकुमार बास्की, सुजाता टेटे, अबनेजर टेटे, डॉ. मनोज कच्छप, डॉ. दमयंती सिन्कू सहित जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के सभी विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
मातृभाषा में अधिकाधिक साहित्य सृजन से ही भाषाओं का भविष्य होगा समृद्ध : कुलपति