सरल व सादगी पूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे प्रो पिंगुवा : डॉ हरि उराँव
रांची : भारत वर्ष में ‘कोल हो’ भाषा एवं ‘वारङ चिति लिपि’ से रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के हो भाषा के प्रथम प्रोफेसर हिर्ला बलराम पाट पिंगुवा का रांची रिम्स में रविवार रात 11.40 में निधन हो गया। उनके निधन से हो भाषा के साथ ही साथ पूरे झारखंडी समाज मर्माहत हैं। प्रो पिंगुवा रांची कालेज में सन 1973 से उनके लेकर 2001 तक भूगोल विभाग में प्रोफेसर व रीडर के पद पर रहें।
उनके आवास पर विशेष रूप से उपस्थित टी आर एल संकाय के पूर्व समन्वयक डॉ हरि उराँव ने कहा कि प्रो पिंगुवा जी का निधन से हम काफी दुखी हैं। सरल व सादगी पूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे वे। डॉ उराँव ने उनके निधन पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए उनके निधन को ऐसी क्षति बताया है जिसकी पूर्ति संभव नहीं है।
डॉ सरस्वती गागराई ने बताया कि प्रो पिंगुवा ‘वारङ चिति लिपि’ के निर्माता ओत कोल गुरु लाको बोदरा के साथ लम्बे समय तक जुड़े रहें और हो भाषा व साहित्य संरक्षण संवर्द्धन के लिए काम किये। उन्होंने बताया कि वारङ चिति लिपि में हो भाषा के पठन पाठन कराने में अमूल्य योगदान रहा।
टी आर एल संकाय प्राध्यापक डॉ बीरेन्द्र कुमार महतो ने कहा कि आज, हम एक ऐसे व्यक्ति को खो दिये हैं जो न केवल एक कुशल शिक्षक थे, बल्कि एक प्रेरणादायक साहित्यकार व समाजसेवी भी थे। डॉ महतो ने कहा कि उनके ज्ञान, अनुभव और साहित्य के प्रति समर्पण ने हम सभी को प्रभावित किया। उनके निधन से हम सभी दुखी हैं और उनकी कमी हमेशा खलेगी।
गौरतलब हो कि प्रो पिंगवा आदि संस्कृति एवं विज्ञान संस्थान के प्रथम महासचिव के साथ साथ
एक समाज सेवी, समाजविद, भाषाविद, वारङ चिति लिपि विशेषज्ञ, लेखक – कवि, रचनाकार, भूगोलवेत्ता (भूगोलशास्त्री), इतिहासकार आदि थे। वे रांची कालेज में एनसीसी कमांडेंट भी रहे। उन्होंने अपने पीछे चार बेटे, बहू व पोते पोतियों से भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। पार्थिव शरीर के विदाई के मौके पर डॉ जय किशोर मंगल, आशीष बिरुवा, चिंटू दोराय, प्रवीण कुमार गागराई, गीता दोराई, सिकन्दर बोदरा, अर्जुन हेम्ब्रम, मोतीलाल हांसदा, जेपी पिंगुवा के अलावा हो समाज के कई गणमान्य लोग उपस्थित थे।

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